चुनाव में ही क्यों याद आते हैं मुसलमान?

  • 27 दिसंबर 2013
मध्य प्रदेश में मतदान के लिए क़तार में खड़ी महिलाएं.

गुज़रे साल में पत्रकारिता के अपने अनुभवों को लिखना दरअसल ज़िंदगी के अनुभवों को लिखना है.

मेरा मानना है कि पत्रकारिता के ज़रिए भले ही हम सिर्फ़ किसी कहानी के पीछे भागते हों और कहानी फ़ाइल करने के बाद उसे भूल जाते हों, लेकिन सच्चाई ये है कि हम उन अनुभवों को कभी नहीं भूलते.

वे तमाम चीज़ें, हमारी सोच और समझ का हिस्सा बन जाती हैं, ये अलग बात है कि कहानी करते समय हमें उन बातों का अहसास नहीं होता है.

आप चाहे किसी हत्या, बलात्कार की घटना के बारे में रिपोर्टिंग करें या किसी प्राकृतिक आपदा या चरमपंथी घटना के बारे में रिपोर्टिंग करें सबकी अपनी अहमियत है. और ये तमाम चीज़ें आपके जीवन पर अपना असर छोड़ती हैं.

इस साल मुझे दिल्ली से तो कई मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने का मौक़ा मिला, लेकिन दिल्ली से बाहर सिर्फ़ दो बार जा सका.

हाल ही में ख़त्म हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान मुझे मध्य प्रदेश जाने का मौक़ा मिला.

41 साल की उम्र और क़रीब 10 साल की पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि भारत में धार्मिक पर्व के अलावा पूरे देश में अगर कोई चीज़ लोगों को प्रभावित करती है तो वो है क्रिकेट और चुनाव.

मैं दिल्ली से सड़क रास्ते से मध्य प्रदेश गया था. पूरे राज्य का दौरा तो संभव नहीं हो सका लेकिन फिर भी ग्वालियर की तरफ़ से घुसते हुए और रीवा तक जाने का मौक़ा मिला.

भारत में चुनाव के दौरान चाय की दुकानों और गांवों की चौपाल पर लोगों से बात करने का जो मज़ा है, उसे शब्दों में बांध पाना कम से कम मेरे लिए बहुत मुश्किल है. लगता है कि भारत में हर कोई चुनाव के बारे में न केवल राय रखता है, बल्कि बहुत हद तक विशेषज्ञ भी है.

अब इसे प्रजातंत्र की जड़ें मज़बूत होने की मिसाल कहूं या भारत में बेकार लोगों की भारी संख्या, इसका फ़ैसला आप पर छोड़ता हूं.

यहां यह कहना भी ज़रूरी है कि चाहे लाख सैटेलाइट न्यूज़ चैनल आ जाएं पर भारत के अंदरूनी इलाक़ों में बीबीसी की जितनी इज़्ज़त लोग करते हैं, उससे ख़ुशी तो बहुत होती है लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी का भी अहसास होने लगता है कि लोग आपसे कितनी उम्मीदें रखते हैं.

हम सब ख़बरें करते समय अपने श्रोताओं, पाठकों और दर्शकों की भावनाओं का कितना ख़्याल रख पाते हैं इसका फ़ैसला तो वही लोग करेंगे, लेकिन उनकी मुहब्बत और उम्मीदों से यक़ीन होने लगता है कि पत्रकारिता सिर्फ़ सच बाहर लाना ही नहीं बल्कि बाज़ दफ़ा लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाते हुए कुछ कड़वी सच्चाइयों को भी उजागर करना होता है.

चुनावों के अलावा इसी से जुड़े एक और मुद्दे पर मुझे दिल्ली से बाहर जाने का मौक़ा मिला. मुझे जानना था कि आने वाले लोकसभा चुनावों के बारे में मुस्लिम मतदाता क्या सोच रहे हैं.

इस सिलसिले में मैं दारुल उलूम देवबंद और अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी पहुंचा. दारूल उलूम देवबंद भारत में इस्लामी शिक्षा के प्रमुख केंद्रों में से एक है, जिसे 1860 के दशक में बनाया गया था.

अलीगढ़ में सर सैयद अहमद ख़ान ने भारतीय मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा देने के लिए वर्ष 1875 में एक कॉलेज की बुनियाद रखी थी, जो आज एएमयू है.

इसी कहानी के सिलसिले में आम मुसलमानों के अलावा मुसलमानों पर नज़र रखने वाले कई लोगों से बात करने का मौक़ा मिला. मुसलमान क्या सोचते हैं मौजूदा यूपीए सरकार के बारे में या फिर भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की आशंका से वे डरे हुए तो नहीं हैं, इन सब पर विस्तार से चर्चा उन कहानियों में हुई है, इसलिए यहां उन पर बात करने का मौक़ा नहीं है, पर एक बात का ज़िक्र शायद ज़रूरी है.

इस दौरान ज़्यादातर आम मुसलमानों ने मुझसे एक ही शिकायत की. सबने यही पूछा कि चुनाव आते ही तमाम राजनीतिक पार्टियों और मीडिया को मुसलमानों की याद क्यों आने लगती है? ज़ाहिर है इसका कोई बहुत सटीक जवाब तो मेरे पास भी नहीं है.

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