'लगा कि भगवान बड़ा कारसाज़ है...'

कुंभ मेला इलाहाबाद

बात जनवरी की है, जब मैं कुंभनगरी इलाहाबाद में था. मौक़ा महाकुंभ का था. मकर संक्रांति के दिन करोड़ों लोग सूर्य को अर्घ्य देने के लिए संगम तट पर मौजूद थे.

गंगा और यमुना के मिलनस्थल पर दूरदराज़ गाँव-देहात से आए लोगों का विशाल जनसमुद्र.

परंपरा, धर्म और अध्यात्म का ऐसा अभूतपूर्व संगम, जो बार-बार देखने को नहीं मिलता.

रात में संगम तट पर बसा पूरा का पूरा शहर रोशनी से ऐसे नहाया रहता था मानो करोड़ों तारे एकसाथ ज़मीं पर उतर आए हों.

इस दौरान मैंने सैकड़ों लोगों से बात की, इन आम लोगों में एक ही बात आम थी कि यहाँ जाति का बंधन नहीं था. ये राजनीति से दूर थे और अयोध्या में राममंदिर निर्माण में भी उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी.

ये लोग न किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता थे और न वर्ग-विशेष के. इसका मतलब समाज के उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के साथ-साथ चाहे अमीर हो या ग़रीब एकसाथ एक सुर में गंगा मैय्या की जय के नारे लगाते थे.

विदेशियों के लिए तो यह आश्चर्य भरा मेला था, पर इस मेले के पीछे उन तमाम मुसलमानों की भी मेहनत थी, जो रामनामी दुपट्टा बनाते हैं, आने वाले हिंदुओं की ज़रूरतें पूरी करने के लिए दुक़ानें सजाते हैं, पूजा के लिए फूल-माला बेचते हैं.

भले ही मुसलमान हों, पर इनकी रोज़ी-रोटी हिंदुओं से ही आती है. यहाँ धर्म मज़हब की कोई कड़वाहट नहीं, कोई दीवार नहीं.

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इस मायने में कुंभ भारत की ओर से दुनिया के लिए एक उदाहरण है, जहाँ सामाजिक समरसता है, मेले का महाप्रबंधन है और इनके पीछे धर्म की दीवारें तोड़ता कारोबार है.

जहाँ एक ओर कुंभ फ़ैशन स्टेटमेंट नहीं है, पर हरिद्वार से गंगाजल लेकर शिवालयों पर चढ़ाने जाते कांवड़िए अब एक फ़ैशन बन चुका है. यहाँ श्रद्धा कम छुट्टी ज़्यादा नज़र आती है.

बम भोले के नाम पर सैकड़ों किलोमीटर की पैदल दूरी तय कर कंधों पर कांवड़ लाते लोग एक दूसरे को नाम से नहीं बल्कि भोले के नाम से पुकारते हैं. यहाँ भी जाति की दीवारें नहीं हैं. अमीर-ग़रीब दोनों एक ही कतार में शामिल होते हैं पर तेज़ डीजे की धुनों पर थिरकते अधिकांश कांवड़़िए रात होते-होते नशे की आगोश में समा जाते हैं.

हालांकि सारे कांवड़ियों पर ये बातें लागू नहीं होतीं, पर जो नशे में होते हैं अक्सर सड़कों पर हुड़दंग मचाते आगे बढ़ते हैं. धर्म की मर्यादा तार-तार करते हुए.

ये अनुभव ज़रा अजीब सा है, पर धर्म की ताक़त से इनकार कतई नहीं किया जा सकता.

धर्म और आस्था की ताकत तो मुझे अमृतसर में भी नज़र आई, जब ऑपरेशन ब्लू स्टार में मारे गए कथित चरमपंथी जरनैल सिंह भिंडरांवाला और उनके सहयोगियों की याद में स्वर्ण मंदिर परिसर के भीतर गुरुद्वारा बनाया गया.

भिंडरांवाला की स्मृति में बने इस गुरुद्वारे से यह बहस भी तेज़ हो गई कि जिन लोगों को भारत सरकार आतंकवादी कहती है, उन्हें शहीद का दर्जा कैसे दिया जा सकता है. ऑपरेशन ब्लू स्टार में जो सैनिक मारे गए थे, क्यों वो शहीद नहीं थे और कहीं यह फिर से पंजाब में अलगाववाद के दौर की सुगबुगाहट तो नहीं है.

पर इन सबके बीच, अमृतसर में आप जरनैल सिंह भिंडरांवाला के ख़िलाफ़ कुछ कहने का साहस नहीं जुटा सकते.

अब बात उत्तराखंड में हुई त्रासदी की, अमरनाथ में जो तबाही हुई, उसमें जो मारे गए उनके बारे में लोगों ने यही कहा कि ऊपर वाले की मर्ज़ी थी और जो बच गए उन्हें भी बचाने वाला ऊपर वाला ही था.

भारत-नेपाल सीमा पर धारचुला और नेपाल के धारचुला की त्रासदी एक जैसी ही थी.

केदारनाथ से अलग हटकर इन इलाक़ों में मौतें तो नहीं हुईं, पर तबाही भरपूर हुई. कुछ गाँव तो ऐसे थे, जिनके नामोनिशान तक मिट गए थे और जो लोग बच निकलने में कामयाब हुए, उन्हें राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी.

राहत शिविरों में रह रहे लोगों ने जब अपनी कहानियां मुझे सुनाईं, तो बस मेरे मुंह से यही निकला कि भगवान बड़ा कारसाज़ है...

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