गुलबर्ग सोसायटी दंगे: कब, क्या हुआ?

  • 26 दिसंबर 2013
गुलबर्ग सोसायटी में हुई आगजनी और हमले में 69 लोग मारे गए थे

साल 2002 में गुजरात में हुए दंगों के दौरान कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफ़री अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी में 28 फ़रवरी को मारे गए थे.

दंगों से बचने के लिए कई मुसलमानों ने गुलबर्ग सोसायटी में रह रहे एहसान जाफ़री के घर पर इस उम्मीद में शरण ली थी कि पूर्व सांसद होने के कारण वे शायद वहां बच जाएं.

लेकिन दंगाइयों ने गुलबर्ग सोसायटी को घेर लिया और कई लोगों को ज़िंदा जला दिया. इस दंगे में एहसान जाफ़री समेत कुल 69 लोग मारे गए थे.

एहसान जाफ़री की विधवा ज़किया जाफ़री ने आरोप लगाया था कि उनके पति एहसान जाफ़री ने पुलिस और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सभी को संपर्क करने की कोशिश की थी लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की.

ज़किया जाफ़री ने जून 2006 में गुजरात पुलिस के महानिदेशक से अपील की थी कि नरेंद्र मोदी समेत कुल 63 लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की जाए.

ज़किया का आरोप है कि मोदी समेत उन सभी लोगों ने दंगों के दौरान पीड़ितों को जानबूझकर बचाने की कोशिश नहीं की.

पुलिस महानिदेशक ने जब उनकी अपील ठुकरा दी तब ज़किया ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.

लेकिन नवंबर 2007 में हाईकोर्ट ने भी उनकी अपील ख़ारिज कर दी.

सुप्रीम कोर्ट की दख़ल

उसके बाद मार्च 2008 में ज़किया जाफ़री और ग़ैर-सरकारी संगठन 'सिटिज़ेन्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस' संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोर्ट की मदद करने के लिए जाने माने वकील प्रशांत भूषण को एमाइकस क्यूरी नियुक्त किया.

अप्रैल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों की जांच के लिए पहले से गठित एसआईटी को इस मामले की जांच के आदेश दिए.

ज़किया जाफ़री ने नरेंद्र मोदी पर इस घटना को जानबूझकर न रोकने का आरोप लगाया था

एसआईटी ने 2010 की शुरुआत में नरेंद्र मोदी को पूछताछ के लिए बुलाया और मई 2010 में सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी.

इस बीच अक्तूबर 2010 में प्रशांत भूषण इस केस से अलग हो गए जिसके बाद अदालत ने राजू रामचंद्रन को एमाइकस क्यूरी नियुक्त किया. राजू रामचंद्रन ने जनवरी 2011 में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी.

मार्च 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को इस मामले में और जांच करने के निर्देश दिए क्योंकि अदालत के अनुसार एसआईटी ने जो सबूत पेश किए थे और जो नतीजे निकाले थे उन दोनों में तालमेल नहीं था.

मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एमाइकस क्यूरी को गवाहों और एसआईटी के अफ़सरों से मिलने के आदेश दिए.

जुलाई 2011 में राजू रामचंद्रन ने एक बार फिर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी.

सितंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने मोदी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश तो नहीं दिया लेकिन ये कहा कि एसआईटी निचली अदालत में अपनी रिपोर्ट पेश करे.

ज़किया जाफ़री और नरेंद्र मोदी दोनों ने इसे अपनी-अपनी जीत की तरह देखा. नरेंद्र मोदी ने इसे अपने लिए क्लीन चिट क़रार दिया तो ज़किया ने इसे एक क़ानूनी-प्रक्रिया की तरह देखा.

बहरहाल फ़रवरी 2012 में एसआईटी ने अहमदाबाद की निचली अदालत में अपनी रिपोर्ट सौंप दी.

क्लीन चिट

मीडिया में सूत्रों के हवाले से ख़बरें आने लगीं कि एसआईटी ने नरेंद्र मोदी को ये कहते हुए क्लीन चिट दे दी है कि एसआईटी के पास मोदी के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं.

ज़किया जाफ़री ने निचली अदालत से एसआईटी की रिपोर्ट मांगी थी.

आठ फरवरी 2012 को एसआईटी ने मामला बंद करने की रिपोर्ट सौंपी थी जिसके ख़िलाफ़ ज़किया जाफ़री ने 15 अप्रैल, 2013 में याचिका दायर की थी.

अदालत ने 15 फ़रवरी को एसआईटी को रिपोर्ट की एक प्रति एक महीने के अंदर ज़किया जाफ़री को सौंपने के निर्देश दिए.

ज़किया जाफ़री की याचिका पर उनके वकीलों और एसआईटी के वकील की जिरह मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट बीजे गणात्रा के सामने पांच महीने तक चली.

जिरह पूरी होने के बाद जाफ़री के वकील ने 18 सितंबर को अदालत को लिखित हलफ़नामा दिया था जबकि एसआईटी ने अपना लिखित हलफनामा 30 सितंबर को दिया था.

पहले मजिस्ट्रेट 28 अक्टूबर को फैसला सुनाने वाले थे लेकिन बाद में इसके लिए 26 दिसंबर की तारीख़ रखी गई.

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