विनम्रता कहीं सीखी नहीं जा सकती

आनी छोयिंग डोलमा , नेपाली गायक

क्या है काठमांडू में? पूरा शहर ऊबड़-खाबड़, जहाँ-तहाँ खुदी हुई सड़कें, डीज़ल का ज़हरीला धुआँ उगलती गाड़ियाँ और उस धुएँ से अपना कलेजा बचाने का मुग़ालता पाले, मुँह-नाक मास्क से ढँके काम पर जाते लोग. फिर भी दिमाग़ से उतरता क्यों नहीं है काठमांडू?

दिमाग़ से नहीं उतरते हैं वहाँ के लोग जो हिमालय-सुलभ सरलता और सादगी लिए मुझ जैसे अजनबियों से भी मिलते हैं, तो लगता है बचपन या कॉलेज के दिनों के किसी पुराने मित्र से मुलाक़ात हो रही है.

इस बीत रहे साल, मैं रिपोर्टिंग के सिलसिले में काठमांडू गया, तो जिन लोगों से मेरी मुलाक़ात हुई, उनमें एक पूर्व प्रधानमंत्री, एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गायिका, एक मशहूर म्यूज़िक कंपोज़र, एक नामचीन संपादक और कुलीन-आभिजात्य वर्ग के सदस्य, दसियों छात्र, दसियों पत्रकार, कम से कम दो कैमरामैन, कई पुलिस अधिकारी, तीन या चार ड्राइवर और बेशुमार आम नेपाली नागरिक शामिल थे.

और मेरे लिए अब यह बता पाना मुश्किल है कि इनमें से पूर्व प्रधानमंत्रीज़्यादा विनम्र थे या ड्राइवर या फिर वो मशहूर बौद्ध संन्यासिन आनी छोयिंग डोल्मा जिसे लोग सिंगिंग नन ऑफ़ काठमांडू कहते हैं. या रात को चौराहों पर खड़ी ड्यूटी करने वाली ट्रैफ़िक पुलिस की वो लड़कियाँ जो महँगी से महँगी कार चलाने वाले ख़लीफ़ा को रोककर मुस्कुराते हुए मगर सपाट लहज़े में पूछती हैं,"मापसे हुन्छ हजूर?" यानी कहीं हुज़ूर ने मापसे (मादक पदार्थ सेवन) तो नहीं किया? वरिष्ठ संपादक और मेरे मित्र युवराज घिमिरे ने बताया कि मापसे के आरोप में ऐसे ही पुलिसकर्मियों ने सरकार में एक बहुत प्रभावशाली व्यक्ति को अंदर करवा दिया था.

बरसों से अपने आंतरिक संघर्षों से जूझ रहे नेपाल में पुलिसवालों से लेकर ड्राइवर और पूर्व प्रधानमंत्री और बाग़ी राजनीति के सिरमौर सभी विनम्रता की मिसाल पेश करते हों, ये किसी ट्रेनिंग कोर्स का परिणाम नहीं हो सकता़. क्योंकि विनम्रता किसी कोचिंग इंस्टीट्यूट में नहीं सीखी जा सकती.

ये अहसास मुझे तब भी हुआ जब पिछले दिनों मैंने पाया कि मैं कलकत्ता के प्रिंस कहे जाने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली के दालान में उनके साथ क्रिकेट खेल रहा हूँ. मशहूर कहावत है कि असंभव को संभव करने की कला ही राजनीति है पर मैं कहता हूँ पत्रकारिता में भी कई बार असंभव के संभव हो जाने की गहरी संभावनाएँ छिपी रहती हैं, जैसा कि सौरभ गांगुली के साथ मेरा क्रिकेट खेलना.

मेरे क्रिकेट (अ)ज्ञान पर दफ़्तर के कई साथियों ने अब हँसना भी छोड़ दिया है. पहले वे ये कहकर हँसा करते थे कि राजेश जोशी से पूछ लो कि सचिन तेंदुलकर कितने गोल पर आउट हुए! पेशेगत करिश्मा ही कहा जाए कि मैं सौरभ गांगुली से इंटरव्यू करने पहुँचा और ठीक वैसी ही तैयारी के साथ पहुँचा था, जैसा 1999 में करगिल युद्ध का कवरेज करने दिल्ली से निकला था.

न मैं पेशेवर युद्ध संवाददाता था और न पेशेवर क्रिकेट संवाददाता. मगर पत्रकारिता की ख़ूबी यही है कि आप पेशेवर हों या न हों यह पेशा आपको पेशेवर बना देता है.

पर यहाँ मुद्दा न युद्ध है, न क्रिकेट और न पत्रकारिता. मैं उन लोगों की शालीनता और विनम्रता की बात कर रहा हूँ, जिन्होंने अपने जीवन में नए प्रतिमान बनाए, नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं. ग्लैमर की दुनिया में जगमगाए मगर फिर भी अपने मूल तत्व को नहीं छोड़ा. सौरभ गांगुली चाहते तो आसानी से मना कर सकते थे कि वो इंटरव्यू दे देंगे पर क्रिकेट नहीं खेलेंगे. लेकिन उन्होंने अपनी चिर-परिचित सकुचाहट भरी मुस्कुराहट के साथ बैट थामा और मेरी गेंदें खेलने को तैयार हो गए.

सौरभ गांगुली हों या आनी छोयिंग डोल्मा या कोई अनाम मान बहादुर ड्राइवर- आप उनको इसलिए याद नहीं रखते कि आप उनके परावर्तित प्रकाश में जीवन गुज़ार कर कृतार्थ महसूस करते हैं बल्कि इसलिए कि आप उनमें उस मानवीय ऊष्मा का प्रवाह महसूस करते हैं जिसे आज बहुत से लोग 'आउटडेटेड' मानने लगे हैं.

मैं अपने पेशे का शुक्रगुज़ार हूँ कि वो मुझे सौरभ गांगुली और मान बहादुर को एक साथ याद करने का मौक़ा और समझ देता है.

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