डरे हुए हैं माछिल मुठभेड़ पीड़ितों के परिवार

भारतीय कश्मीर में सैनिक
Image caption सेना की जाँच में छह लोगों को मुठभेड़ के लिए ज़िम्मेदार माना गया

माछिल फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में मारे गए तीन युवकों के परिजनों का कहना है कि उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं. परिवारों को डर है कि युवकों की मौत की साज़िश रचने वाले उनसे बदला ले सकते हैं.

मारे गए तीन युवकों में से एक शहज़ाद अहमद के भाई शौकत अहमद कहते हैं, "इसी साल जुलाई में हमे सेना की अदालत के सामने पेश होना पड़ा. हमने पुलिस की मदद ली. तीन स्थानीय लोगों ने सेना की मदद से साज़िश रचकर ईनाम के लिए हमारे बच्चों की जान ले ली."

साल 2010 में भारत प्रशासित कश्मीर के तीन स्थानीय युवकों की हत्या कर उन्हें पाकिस्तानी घुसपैठियाँ बताकर पेश किया गया था.

उस समय इस फ़र्ज़ी मुठभेड़ के ख़िलाफ़ जम्मू और कश्मीर में व्यापक प्रदर्शन हुए थे. इस मामले में सेना ने अपने ही छह अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोर्ट मार्शल के आदेश दिए हैं. एक कर्नल, एक मेजर और चार अन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया जल्द ही शुरू होगी.

अप्रैल 2010 में हुई माछिल मुठभेड़ में सेना पर तीन स्थानीय युवकों की हत्या का आरोप था. इस मुठभेड़ के मामले में स्थानीय पुलिस ने भी जुलाई 2010 में 11 सैन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की थी.

29 अप्रैल 2010 की रात को मोहम्मद शफ़ी, शहज़ाद अहमद और रियाज़ अहमद की हत्या कर दी गई थी. परिजनों की शिकायत पर स्थानीय पुलिस ने 27 अप्रैल को ही तीनों युवकों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की थी.

एक विश्वसनीय सैन्य सूत्र के मुताबिक़, "पुलिस जाँच में मुठभेड़ के फ़र्ज़ी साबित होने के बाद सेना ने अपनी अदालती जाँच शुरू की थी, जिसमें पाया गया कि छह सैनिकों ने अपनी सीमाओं को लाँघा. उनमें दो अधिकारी शामिल थे. अब इन सैनिकों की नौकरी जा सकती है और इन्हें जेल हो सकती है."

हालांकि श्रीनगर में सेना की 15वीं वाहिनी के प्रवक्ता कर्नल एनएन जोशी ने कहा है कि सेना मुख्यालय को ऐसे किसी आदेश के बारे में जानकारी नहीं है.

मानवाधिकार उल्लंघन के मामले

इस मामले की पुलिस जाँच में पहले ही साबित हो चुका है कि कुछ सैन्य अधिकारियों ने प्रोन्नति और मेडल पाने के लिए तीन कश्मीरी मज़दूरों को अग़वा किया और फिर उन्हें पाकिस्तानी चरमपंथी बताकर फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार दिया.

इन युवकों के परिजनों ने पुलिस को बताया था कि सेना के लिए काम कर रहा एक स्थानीय व्यक्ति इन युवकों को सेना में नौकरी का लालच देकर अपने साथ ले गया था. वहाँ से उन्हें नियंत्रण रेखा के नज़दीक स्थित माछिल गाँव में ले जाकर मार दिया गया था.

पुलिस जाँच में एक कर्नल और दो मेजरों समेत कुल 11 लोगों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में अभियुक्त बनाया गया था लेकिन सेना की आंतरिक जाँच में सिर्फ़ छह लोगों को ही मुठभेड़ के लिए ज़िम्मेदार माना गया.

कश्मीर में तैनात एक शीर्ष सैन्य कमांडर का कहना है कि पिछले बीस सालों में सामने आए मानवाधिकार उल्लंघन की 1524 शिकायतों में से सिर्फ़ 42 को ही सही पाया गया है. हालाँकि स्थानीय मानवाधिकार संगठन सेना के इन दावों को भ्रामक क़रार देते हैं.

शौकत का कहना है कि कश्मीरी साज़िशकर्ताओं के रिश्तेदार उन्हें धमकियाँ दे रहे हैं.

मानवाधिकार संगठनों के स्थानीय गठबंधन जेकेसीसीएस की ओर से जारी बयान में कहा गया, "तथ्य यह है कि पिछले 23 सालों में भारत के गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय द्वारा सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम के तहत सेना के ख़िलाफ़ आम अदालतों में मामले न चलाने की अनुमति देने से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि सैन्य बल अपराध करते रहेंगे, उनके ख़िलाफ़ अदालती कार्रवाई नहीं होगी और असाधारण मामलों में आंतरिक कोर्ट मार्शल करके ख़ानापूर्ती कर ली जाएगी. इससे न पारदर्शिता आएगी और न ही ज़िम्मेदारी"

जून 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कश्मीर यात्रा से पहले हुई इस मुठभेड़ में आरोपों का सामना कर रहे मेजर उपेंद्र को निलंबित कर दिया गया था जबकि कर्नल को कमांड से हटा दिया गया था.

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