गुलबर्गः 'बीवी की याद में ताजमहल बनाऊँगा'

गुलबर्ग सोसायटी

नफरत की आग में झुलसी हुई गुलबर्ग सोसायटी की काली दीवारें 2002 के दंगों की भयानक तस्वीरों को कैद किए बैठी हैं. यकीन करना मुश्किल होता है कि सन्नाटे में खड़ी इन दीवारों ने कभी हँसती-खेलती ज़िन्दगी की किलकारियां सुनीं थीं या कभी मदद के लिए पुकारते लोगों की चीखें सुनी थीं.

टूटे-फूटे और मकड़ी के जालों से घिरे इन पुराने झरोखों से झांकें तो खाली कमरों में जली हुई खुशियों की राख आज भी दिखाई देगी.

शायद यही वजह है की जहां आज नए अहमदाबाद में मकानों के लिए होड़ लगी है वहीं गुलबर्ग सोसायटी के 29 आलीशान बंगले 11 साल बाद भी ज़िन्दगी देखने को तरस रहे हैं.

घेरे में गुलबर्ग

अहमदाबाद में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में केस की सुनवाई से कुछ घंटों पहले गहमा-गहमी का माहौल था और इधर गुलबर्ग सोसायटी खामोश खड़ी थी. तीन नालियों से गंदा पानी बाहर रास्ते पर बह रहा था. बाहर गली में बदबू फैली हुई थी.

एक नया फोटोग्राफर वीरान पड़ चुके गुलबर्ग की तस्वीरें खींचने के लिए एंगल तलाश रहा था. और बाहर जिंदगी की गहमा-गहमी जारी थी.

सोसायटी के पास के लगभग सभी दुकानों में टीवी पर लोग या तो फ़िल्म देख रहे थे या स्टॉक मार्केट का अपडेट पता कर रहे थे. मानो किसी को इस बात से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता कि ज़किया की याचिका पर क्या फ़ैसला आएगा.

अहमदाबाद के चमनपुरा इलाके के उच्च मध्यवर्गीय मुसलमानों की ये सोसायटी हमेशा से अलग रही है. यहां तक कि 80 और 90 के दशक के दौरान हुए सांप्रदायिक दंगों में भी चमनपुरा और गुलबर्ग की गलियां हमेशा शांत ही रहीं.

यहां के बाशिंदे भी मानते हैं कि उनके इलाके में बाहर चल रहे किसी सांप्रदायिक तनाव का असर नहीं देखा गया. गुलबर्ग हादसे में ज़िंदा बच गए लोग इसका कारण बताते हैं कि उन्होंने दंगों के दौरान भी अपनी सोसायटी नहीं छोड़ी.

चुप्पी छाई है

रफ़ीक मंसूरी ने गुलबर्ग दंगे में अपनी पांच महीने की गर्भवती पत्नी और परिवार के कई सदस्यों को खो दिया. वह कहते हैं, “मैं 2002 के दंगों के दौरान 31 साल का था. हमने गुलबर्ग में कभी सांप्रदायिक तनाव का माहौल नहीं देखा था. हमारी सोसायटी के मुसलमान पड़ोस के हिंदुओं के साथ दीवाली और होली मनाते थे. और हिंदू ईद के दिन हमारे घर आते थे.”

मंसूरी तब सोसायटी के बंगले में रहते थे. अब उसे उन्होंने अपना गोदाम बना लिया है.

वह कहते हैं, “दंगों के दौरान हिंदू बहुल इलाकों में रहने वाले कई मुसलमानों ने वह इलाका छोड़ दिया था. मगर हमें गुलबर्ग से बाहर जाने का कभी ख्याल नहीं आया. सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारी सोसायटी में दंगे हो जाएंगे.”

अब जब अदालत ने मामले में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी, गुलबर्ग और उसके इर्द-गिर्द जीवन पहले की तरह सामान्य है.

सोसायटी के नजदीक के किसी दुकानदार से आप केस और हत्या के बारे में पूछिए, वे मुंह फेर लेंगे. और नजदीक से गुजर रहा आदमी कहेगा कि वह अभी-अभी इस इलाके में आया है इसलिए उसे मामले की कोई जानकारी नहीं है.

कोई गुलबर्ग पर बात नहीं करना चाहता. सोसायटी इन सबसे ऐसी उदासीन नज़र आती है कि गुलबर्ग के टूटे गेट पर किसी पहरेदार के मौजूद नहीं होने के बावजूद भी आपको पत्रकारों और फोटोग्राफरों के अलावा एक परिंदा भी पर मारता नहीं दिखाई देगा.

‘ताजमहल बनाऊंगा’

70 साल के कसम मंसूरी गुलबर्ग सोसायटी में रहने वाले इकलौते बाशिंदे हैं. सभी सोसायटी छोड़ कर चले गए मगर गुलबर्ग में बचा रह गया यह आखिरी इंसान.

मंसूरी याद करते हैं, “मैं और मेरी बीवी चाहते थे कि अपने पोते-पोतियों को यहां बढ़ता हुआ देखें. हम कड़ी मेहनत कर उन्हें वह सब देना चाहते थे जिसे हम नहीं पा सके. वह रजाई सिलती थी और मैं ट्रक ड्राइवर का काम करता था. लेकिन हमारा सपना पूरा होने के पहले ही दंगों में खाक हो गया. उसके साथ घर भी जलकर भस्म हो गया. मगर फर्नीचर के जले हुए टुकड़ों में उन पलों की यादें आज भी जगमगाती हैं जो हमने साथ जिए थे.”

मंसूरी ने अपने घर के बाहर पत्नी की तस्वीर लगा रखी है. उनके दोनों बेटे- सलीम और रफीक, साथ नहीं रहते. सोसायटी के नजदीक की दुकान में वे रजाई बनाने का काम करते हैं. इसके लिए सारे ज़रूरी सामान का स्टॉक बच्चों ने एक कमरे में रखा हुआ है.

वह कहते हैं, “लोग आज भी यहां अपने घरों में रहने से डरते हैं. मगर मैं अपना घर छोड़ नहीं सकता. इसके एक कमरे में मैं अपनी पत्नी के साथ रहता था. यहाँ रहता हूँ तो उसकी मौजूदगी का अहसास होता है. मैं मुआवज़े का इंतज़ार कर रहा हूँ. रकम मिलते ही मैं इस घर को तोड़कर पत्नी जुबिनिसा की याद में ताजमहल बनाऊँगा."

पर दंगों के दाग किस तरह धुलेंगे ?

अहमदाबाद में 2001 में आए विनाशकारी तूफान में लोग ईश्वर का नाम जपते हुए अपने प्रियजनों का हाथ पकड़े जान बचाने के लिए भाग रहे थे. और एक साल बाद गलियों में उसी ईश्वर का नाम जपते हुए कुछ सत्ता लोभी लोगों की हत्या कर रहे थे.

तब और अब, अहमदाबाद को कई नए चेहरे मिले. मगर अधिकतर अहमदाबादवासियों को नफरत की उस जंग से कोई मतलब नहीं था.

उन्हें लगता है कि 2002 के दंगों ने अहमदाबाद नाम के खूबसूरत फूल से गुलबर्ग (पंखुड़ी) को तोड़कर अलग कर दिया है. अब समय बताएगा कि छानबीन और अदालती जांच, दंगे के कुछ अभियुक्तों को हत्या के आरोप से बरी करती हैं या नहीं.

नरेंद्र मोदी को तो क्लीन चिट मिल गया मगर इस बात के कोई आसार नहीं दिखते कि अहमदाबाद दंगों के दाग किस तरह धुलेंगे और कब अहमदाबाद का गुलबर्ग फिर से खिल उठेगा?

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