नरेंद्र मोदी ने 2002 के गुजरात दंगों पर चुप्पी तोड़ी

गुजरात के गुलबर्ग सोसायटी मामले में एसआईटी की रिपोर्ट के ख़िलाफ़ अदालत में ज़किया जाफ़री की याचिका ख़ारिज होने को राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट मिल गई है.

अदालत के फ़ैसले के बाद मोदी ने इस फैसले पर अपने ब्लॉग पर प्रतिक्रिया जाहिर की. मोदी ने इस ब्लॉग में ज़िक्र किया है कि गुजरात के दंगों ने उन्हें काफ़ी दुख पहुँचाया.

वह ये भी कहते हैं कि 'अब जबकि गलत सूचना के बादल छँट गए हैं, मैं अब उम्मीद करता हूं कि असली नरेंद्र मोदी को समझने और उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे लोग खुद को सशक्त महसूस करेंगे'.

उनके इस ब्लॉग पर सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा है, "भाजपा और मोदी की मानसिकता के बारे में किसी को कोई शक नहीं है. दंगे उन्हीं की निगरानी में हुए थे. ये 2014 के दंगों से पहले मोदी की छवि सुधारने की कोशिश है."

बीबीसी हिंदी ने अपने पाठकों के लिए मोदी की इस प्रतिक्रिया को हिंदी में अनुवाद किया है. पढ़िए क्या लिखा है मोदी ने-

प्यारे बहनों और भाइयों,

प्रकृति का नियम है कि हमेशा सच की जीत होती है - सत्यमेव जयते.

हमारी न्यायपालिका के फ़ैसले के बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरे लिए पूरे देश के साथ अपनी भावनाएँ और सोच को साझा करना ज़रूरी है.

अंत शुरुआत के दिनों की यादें वापस लेकर आता है. वर्ष 2001 में भीषण भूकंप ने गुजरात को मौत के अंधेरों, बर्बादी और बेबसी की ओर ढकेल दिया था. कई सौ लोग मारे गए थे. लाखों लोग बेघर हो गए थे. लोगों से उनकी जीविका का साधन छिन गया था. ऐसे दिनों में जब लोग अकल्पनीय दुखों को बरदाश्त कर रहे थे, मुझे मरहम लगाने और ज़िंदगियों के पुनरोत्थान की ज़िम्मेदारी दी गई.

और हमने पूरा जी-जान लगाकर खुद को इस चुनौती से निपटने के लिए इसमें झोंक दिया.

सिर्फ़ पाँच महीनों के बाद साल 2002 में, बिना सोच-विचार की हिंसा ने हमें एक और अप्रत्याशित आघात पहुंचाया.

कई परिवार असहाय हो गए. सालों की मेहनत से तैयार जायदाद बर्बाद हो गई. प्राकृतिक आपदा की चुनौतियों के बाद अपने पाँवों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे गुजरात के लिए ये एक घातक चोट थी क्योंकि गुजरात ध्वस्त हो चुका था.

मैं अंदर तक हिल गया था. ऐसी क्रूरता देखने के बाद मुझे भीतर एक ख़ालीपन सा महसूस हुआ. इस ख़ालीपन को दुख, शोक, दर्द, आपदा, पीड़ा जैसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता था.

एक तरफ़ भूकंप के पीड़ितों का दर्द था तो दूसरी ओर दंगे के पीड़ितों का दर्द. इस भीषण परिस्थिति से निर्णायक तौर पर निपटने के लिए मुझे ऊपर वाले की दी हुई सारी शक्ति को शांति, इंसाफ़ और लोगों की पुनर्बहाली में लगानी थी.

ऐसे मौके पर मुझे अपने भीतर उमड़ रहे दर्द को दबा देना था.

ऐसे चुनौतीपूर्ण वक्त में मैंने अपने धर्मग्रंथों में दर्ज विवेक का स्मरण किया, जिनमें कहा गया था कि सत्ता में रहने वाले लोगों को अपने दर्द को बांटने का अधिकार नहीं होता.

उन्हें इस दर्द को अकेले ही बर्दाश्त करना होता है. मैंने भी यही किया. दरअसल जब मैं उन दर्द भरे दिनों को याद करता हूँ, मैं भगवान से दिल से एक ही प्रार्थना करता हूं कि किसी भी व्यक्ति, समाज, राज्य और देश की ज़िंदगी में ऐसे क्रूर, दूर्भाग्यपूर्ण दिन कभी न आएं.

मैं पहली बार उस ख़ौफ़नाक अग्निपरीक्षा को आपके साथ बांट रहा हूं जो मैंने निजी तौर पर उन दिनों महसूस किए.

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हालांकि इन भावनाओं के आधार पर मैंने गुजरात के लोगों से गोधरा ट्रेन हादसे के दिन भी अपील की थी. मैंने उनसे शांति और सौहार्दपूर्ण वातावरण की अपील की थी ताकि निर्दोष लोगों के जीवन को नुकसान न पहुंचे.

मैंने फ़रवरी-मार्च 2002 में मीडिया के साथ अपनी वार्ताओं के दौरान भी इन्हीं बातों को दोहराया था. मैंने उनसे बातचीत के दौरान कहा था कि सरकार की ये राजनीतिक और नौतिक ज़िम्मेदारी है कि शांति को बरकरार रखा जाए, लोगों को न्याय मिले और हिंसक गतिविधियों में शामिल सभी लोगों को सज़ा मिले.

आपने मेरी इन भावनाओं को सदभावना अनशन के दौरान भी सुना होगा जहां मैंने ज़ोर दिया था कि किसी भी सभ्य समाज को ऐसे निंदनीय कृत्य शोभा नहीं देते और इन घटनाओं से मुझे बहुत दर्द हुआ है.

दरअसल, मैंने हमेशा विकास और एकता की भावना पर ज़ोर दिया है. मेरे “पांच करोड़ गुजराती भाईयों और बहनों” के सिद्धांत का चारों ओर इस्तेमाल हुआ है.

लेकिन जैसे ये सब दर्द काफ़ी नहीं था कि मुझे मेरे प्यारे गुजराती भाइयों और बहनों की मौत और उनकी परेशानियां का ज़िम्मेदार ठहराया गया.

क्या आप महसूस कर सकते हैं कि जिन घटनाओं ने आपको अंदर ही अंदर बुरी तरह से तोड़ दिया हो, उन्हीं के लिए ज़िम्मेदार ठहराए जाने पर आप किस सदमे से गुज़रेंगे?

उन्होंने सालों तक ये हमले जारी रखे और हमला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मुझे ज़्यादा दर्द इस बात से हुआ कि अपने संकीर्ण निजी और राजनीतिक फायदों के कारण मेरे ऊपर हमला करने की होड़ में इन लोगों ने मेरे पूरे राज्य और देश को बदनाम किया.

उन्होंने उन घावों को दोबारा कुरेदा जिन्हें हम भरने की कोशिश कर रहे थे. इससे उन्हीं लोगों को न्याय मिलने में देरी हुई जिसके लिए वे लोग लड़ रहे थे. उन्हें ये महसूस नहीं हुआ कि वह उन लोगों को और दर्द दे रहे हैं जो ढेर सारा दर्द भुगत चुके हैं.

इस बीच गुजरात अपना रास्ता तय कर चुका था. हमने हिंसा से ऊपर उठकर शांति को चुना. हमने भेदभाव से बढ़कर एकता को चुना. हमने नफ़रत से बढ़कर भाईचारे को चुना. ये आसान नहीं था लेकिन हम ऐसा करने के लिए कृतसंकल्प थे. अस्थिरता और डर के दौर के बाद मेरा गुजरात शांति, एकता और सदभावना की मूर्ति में बदल गया है.

मैं संतुष्ट और आश्वस्त हूं और इसके लिए मैं हर गुजराती को श्रेय देना चाहूंगा.

देश में जितने भी दंगे पहले हुए हैं, उनके मुकाबले गुजरात सरकार ने हिंसा से निपटने के लिए सबसे तेज़ी से और निर्णायक तौर पर कार्रवाई की. कल का फ़ैसला उस प्रक्रिया का अंत है जिसका सुप्रीम कोर्ट ने नज़दीकी और गहराई से निरीक्षण किया. गुजरात में 12 साल की इस अग्निपरीक्षा का आखिरकार अंत हुआ. मैं ख़ुद को आज़ाद और शांत महसूस कर रहा हूं.

मैं उन लोगों का शुक्रगुज़ार हूं जो इस मुश्किल वक्त में मेरे साथ खड़े रहे. उन्होंने झूठ और धोखे के दिखावे की दीवार के दूसरी ओर देखा. अब जबकि गलत सूचना के बादल छँट गए हैं, मैं अब उम्मीद करता हूं कि असली नरेंद्र मोदी को समझने और उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे लोग खुद को सशक्त महसूस करेंगे.

जिन लोगों को दूसरों के दुखों को बनाए रखने से खुशी मिलती है वो शायद अपने हमले जारी रखेंगे. मैं उनसे रुकने की उम्मीद भी नहीं करता हूं. लेकिन उनसे पूरी विनम्रता से निवेदन करूंगा कि वे कम से कम गुजरात के छह करोड़ लोगों को बदनाम करने का गैर-जिम्मेदाराना काम बंद कर दें.

इस दुख और दर्द की यात्रा से उबरने के बाद मैं भगवान से प्रार्थना करूंगा कि मेरे हृदय में कोई कड़वाहट न आए. मैं इस फ़ैसले को निजी जीत और हार के तौर पर नहीं देखता. लेकिन मैं अपने सभी दोस्तों और प्रतिद्वंद्वियों से गुज़ारिश करूंगा कि वे भी ऐसा ही करें.

आदरणीय सुप्रीम कोर्ट के 2011 के इसी मामले से जुड़े फ़ैसले के बाद मैंने भी यही सिद्धांत अपनाया था. मैंने सदभावना के लिए 37 दिनों तक अनशन किया ताकि फ़ैसले को सकारात्मक तौर पर देश को जोड़ने और समाज में सदभावना लाने के कार्य में इस्तेमाल किया जा सके.

मैं आश्वस्त हूं कि किसी भी समाज, राज्य और देश का भविष्य भाईचारे से है. इसी बुनियाद पर विकास और संपन्नता के महल का निर्माण किया जा सकता है. इसलिए मैं सभी से अनुरोध करूंगा कि वे सभी के चेहरों पर मुस्कुराहट लाने के लिए मिलजुलकर काम करें.

एक बार फिर सत्यमेव जयते

वंदे मातरम्.

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