बिहार ने दिखाई राह, ओडिशा ने निकाला रास्ता

धान की पैदावार, बिहार

तक़रीबन हर साल की तरह ख़बरों से भरपूर साल 2013 में मेरे हिस्से 'आउटस्टेशन' के दो ही 'असाइन्मेन्ट' आए या कुछ मायनों में कह सकते हैं कि इन्हें मैंने चुना.

जब संपादक महोदय ने मुझसे बिहार के नालंदा जाकर धान और आलू के रिकॉर्ड फ़सल के दावे को देखने-परखने और उस पर ख़बर बनाने को कहा, तो मैंने पलक झपकते बैग पैक कर लिया, क्योंकि मामला व्यक्तिगत भी था.

आप बिहार का नाम डकैती-चोरी, इम्तिहान में नक़ल, टूटी सड़कें, खैनी के शौक, मुंगेर में बनने वाले कट्टा-बंदूक़ों, कालाज़ार, सैलाब, ग़ुरबत, पिछड़ेपन, लालू और साधू वग़ैरह के अलावा कब सुनते हैं!

सच तो यह है कि बिहार निवासी इसे ख़ुद भी तस्लीम करने को तैयार नहीं थे. वैसे ही जैसे आम आदमी पार्टी, सरकार बनाएं या न बनाएं, पर जनमत संग्रह के मामले में हो रहा था.

ज़ाहिर है डालडा की आदत वालों को घी कहां से पचे!

बीबीसी और मुझ पर भी सरकार की प्रोपेगंडा मशीन बनने का इल्ज़ाम लगाया गया.

लेकिन सवाल इस बात का नहीं था कि दरवेशपुरा गांव के सुमंत कुमार ने अपने खेत में प्रति हेक्टयर 22.4 टन धान उगाकर विश्व रिकॉर्ड तोड़ा था या नहीं. सवाल यह है कि क्या धान की फ़सल में बढ़ोतरी हुई या नहीं.

सुमंत कुमार के ही नहीं, इस इलाक़े के कई नौजवानों के खेतों में कृषि की सिस्टम ऑफ़ राइस इंटिफ़िकेशन पद्धति को अपनाने से पैदावार में कई गुना इज़ाफ़ा हुआ था.

नालंदा से वापस आकर ब्रितानी अख़बार गार्डियन के पर्यावरण संपादक जॉन विडाल ने लिखा कि ऐसे समय में जब दुनिया भर में सात में से एक शख्स भूख की मार झेल रहा है ये उम्मीद की एक नई किरण है और पैदावार में इज़ाफ़ा ग़रीबी मिटाने की कोशिश में एक बड़ा क़दम होगा.

ओडिशा के नियामगिरी जाकर यह देखने को मिला कि पश्चिमी शिक्षा में हाथ तंग रखने वाले, निहत्थे, ग़रीब आदिवासी किस तरह अपनी कमज़ोरियों से घबराए बिना एक नामी अंतरराष्ट्रीय खनन कंपनी, वेदांता से ‘अपने सच’ की हिफ़ाज़त के लिए लड़ रहे हैं.

यूं तो वहां जाने के बाद शायद ही कोई सब्ज़ लहलहाते खेतों, फ़लक तक पेड़ों से पटी पहाड़ियों, उनके दरमियान कल-कलकर गिरते झरनों और बहते नालों से इश्क करने से ख़ुद को रोक पाए, लेकिन यह वहां के आदिवासियों की आस्था है, जो आपको अपना ईमान तक फिर से टटोलने के लिए मजबूर कर देती है.

आप जिस ईमान को शियाओं, अहमदियाओं और काफ़िरों का क़त्ल कर ताज़ा करने की कोशिश में हैं, जिस भक्ति को आप किसी की मस्जिद गिराकर साबित करते हैं– डोंगरिया, झरनिया और कुटिया कोंध आदिवासियों का नियामगिरी, देव मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च की क़ैद से आज़ाद है.

इसलिए जब डोंगरिया कोंध के सरदार लदो सिकाका ने मुझसे कहा कि सरकार अगर हमारे ज्ञान को फैलाएगी तो बहुत भला होगा तो भला मैं इससे कैसे इनकार कर सकता था!

दक्षिणी पश्चिमी ओडिशा के दो ज़िलों, रायगढ़ा और कालाहांडी, में जारी यह लड़ाई इसलिए भी अहम है क्योंकि वेदांता की खनन परियोजना से प्रभावित हो आदिवासियों ने माओवादियों को अब तक अपनी लड़ाई से बिल्कुल अलग रखा है.

वैसे इसके लिए क्षेत्र में कार्यरत भालाचंद्र साडंगी जैसे लोग भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने प्रचार से ज़्यादा ध्यान अपने मूल काम को दिया है और यह बहुत हद तक इस लड़ाई के हथियारबंद संघर्ष में तब्दील होने से बचे रहने की बड़ी वजह है.

हिन्दुस्तान और सूबाई हुक़ूमत को इस बात के मद्देनज़र जल्द से जल्द इस मसले का स्थायी हल ढूंढना चाहिए.

मुझे नहीं मालूम कि आने वाले दिनों में ये पहाड़ियां, झरने, यहां के खुले वातावरण को अपनी ख़ूबसूरती से चार चांद लगाने वाली आदिवासी महिलाएं सब यूं ही रहेंगे या नहीं.

या फिर डेविड और गोलिएथ– एक मज़बूत और कमज़ोर व्यक्ति-की लड़ाई का क्या अंजाम होगा?

ये डोंगरिया, कुटिया और झरनिया आदिवासियों को भी शायद नहीं मालूम! लेकिन क्या जीत और हार की परवाह किए बिना अपने हक़ के लिए लड़ना अहम नहीं है?

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