'आप' का असरः कश्मीर में भी बदलाव की बयार

  • 29 दिसंबर 2013
अरविंद केजरीवाल

पूरे देश की तरह जम्मू-कश्मीर में भी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारियां चल रही हैं. लोकसभा चुनावों के बाद राज्य में विधानसभा चुनाव भी होने हैं. इसलिए राज्य के लिए 2014 चुनावी साल है.

मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियां लोगों को लुभाने के लिए जनसभाएं कर रही हैं तो अलगाववादी पार्टियों ने चुनाव बहिष्कार का प्रचार शुरू कर दिया है.

कट्टर अलगाववादी नेता सैयद अली गिलानी ने एक बार फिर लोगों से लोकसभा और राज्यसभा दोनों का चुनाव बहिष्कार करने को कहा है.

लेकिन गिलानी की अपीलों के बावजूद, दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) की आश्चर्यजनक जीत के बाद कश्मीर घाटी के युवा चुनावों पर गंभीरता से चर्चा करने लगे हैं.

साल 1987 में हुए विधानसभा चुनावों, जिनमें नेशनल कॉंफ़्रेंस-कांग्रेस चालाकी से जीत गए थे, को कश्मीर घाटी में आतंकवाद बढ़ने कि लिए ज़िम्मेदार माना गया था. कश्मीर घाटी के लोग, ख़ासतौर पर युवाओं का लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास खो गया और वह अलगाववादियों के बहिष्कार की अपील के साथ हो गए थे.

लेकिन दिल्ली में 'आप'की जीत ने घाटी में तर्कों को बदल दिया है.

उमर को चिंता नहीं

महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव बहिष्कार के लिए प्रचार कर रहे एक अन्य अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने दिल्ली चुनाव परिणामों का स्वागत करने में देर नहीं की.

'आप' की जीत का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव परिणाम इसलिए उत्साहित करने वाले हैं क्योंकि भारत के लोगों ने पारंपरिक धारणाओं वाले राजनीतिक दलों को खारिज कर दिया है.

मीरवाइज़ ने कहा, "पारंपरिक दृष्टिकोण का समय अब पूरा हो रहा है और नई व्यावहारिक तरीके, जो दुनिया की वर्तमान हकीकत के अनुरूप हैं अपनी जगह बना रहे हैं. बदलाव की नई हवा बह रही है और हम उम्मीद करते हैं कि भारत के लोगों की ये सोच और दृष्टिकोण आम आदमी पार्टी के कामों में दिखेगा जो बदलाव के एक प्रतीक के रूप में उभरी है."

अलगाववादी से मुख्य धारा के नेता बने सज्जाद लोन की पार्टी लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.

'आप' की जीत के बाद वह कश्मीर के लोगों को प्रेरित करते हुए कह रहे हैं कि ऐसी कोई वजह नहीं कि क्षेत्र में बह रही बदलाव और सशक्तिकरण की बयार कश्मीर न पहुंचे.

कश्मीरी युवा सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सक्रिय हो गए हैं और चुनाव में भाग लेने और बदलाव की बात करने लगे हैं. कुछ युवाओं ने अरविंद केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की तर्ज पर फ़ेसबुक पर एक अभियान शुरू किया है- "युवा घोषणापत्र 2014—हमारा चुनाव घोषणापत्र—बदलाव हो!"

कई छात्र, सक्रिय कार्यकर्ता और युवा पेशेवर इस गुर्प में शामिल हो गए हैं और लोगों से आग्रह कर रहे हैं कि वह एक समानांतर चुनाव घोषणापत्र बनाने के लिए उन बदलावों के सुझाव दें जो वह चाहते हैं.

दिल्ली में 'आप'के प्रदर्शन से उत्साहित युवा वाहिनी 'आप'का कश्मीर संस्करण बनाने और पारंपरिक राजनीतिक दलों के बरअक्स खड़े होने को तत्पर लगती है.

हालांकि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को कश्मीर पर 'आप'का कोई प्रभाव नहीं दिखता. वह कहते हैं "आप का यहां कोई निशान नहीं है."

'आप'से नज़दीकी की होड़

विपक्षी पीपुल्स डैमोक्रेटिक पार्टी बदलाव के मन को भुनाने की कोशिश में है. हाल ही में पीडीपी के सरंक्षक और पूर्व मुख्यमंत्री, मुफ़्ती मोहम्मद सईद, ने कहा कि 2002 में पीडीपी ने, 'आप'की तरह ही, जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक नई नैतिकता का सूत्रपात किया था.

दिल्ली में 'आप'की जीत के तुरंत बाद जम्मू में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुफ़्ती ने कहा था, "हमने कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार बनाने के लिए करीब एक महीने का समय लिया और तब तक इसका गठन नहीं किया जब तक एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) नहीं बना. इसमें कश्मीर समस्या के समाधान, लोगों की गरिमा की रक्षा और राज्य में विकास के एक नए युग की शुरुआत शामिल था."

हालांकि पीपुल्स कॉंफ्रेंस के सज्जाद लोन और उत्तरी कश्मीर की लंगाते से विधायक अर राशिद मुफ़्ती के 'आप'से जुड़ाव को स्वीकार नहीं करते.

सज्जाद कहते हैं, "1947 से ही, जम्मू और कश्मीर पर अब्दुल्लाओं (मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का परिवार) और मुफ़्तियों (मुफ़्ती मोहम्मद सईद का परिवार) ने राज किया है. वह आम आदमी नहीं हैं, वह वीवीआईपी हैं और उन्हें अब कुछ आराम करने की ज़रूरत है."

अर राशिद ने 2008 में इंजीनियर की अपनी नौकरी छोड़कर कुपवाड़ा के लंगाते से बतौर निर्दलीय विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता था. वह खुद को 'आप'के ज़्यादा नज़दीक पाते हैं.

उन्होंने अपनी पार्टी- अवामी इतिहाद पार्टी- बनाई है और विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं. वह नेशनल कॉंफ़्रेंस अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री डॉ फ़ारूक़ अब्दुल्ला के ख़िलाफ़ श्रीनगर-बड़गाम संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव भी लड़ सकते हैं.

माना जा रहा है कि राशिद 'आप'नेताओं के संपर्क में हैं और अपनी पार्टी शुरू करने से पहले उन्होंने अरविंद केजरीवाल से विस्तार से चर्चा भी की थी.

हालांकि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि कश्मीर पर 'आप'का असर पड़ेगा या नहीं लेकिन उल्लेखनीय बात है कि दिल्ली में 'आप'की जीत ने कश्मीरी युवाओं में चुनाव को लेकर निराशा को कुछ कम किया है. और अगर यह चलन कायम रहता है तो निसंदेह आने वाले दिनों में कश्मीर बदलाव की उम्मीद कर सकता है.

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