जो सर्द हवाओं में ठिठुरने को हैं 'मजबूर'

तोड़ी गई झुग्गी बस्ती

दिल्ली में जब सोमवार रात बारिश के बाद ठंडी हवा घरों में बैठे लोगों को भी ठिठुरा रही थी तब मानसरोवर पार्क मेट्रो स्टेशन के पास तोड़ी गई झुग्गी बस्ती के लगभग 500 बच्चों में से अधिकतर के पास सिर ढंकने को तिरपाल भी नहीं था.

इनमें से ढाई सौ बच्चे तीन साल तक के हैं.

इससे पहले सोमवार को तड़के 2.4 डिग्री तापमान में भी ये बच्चे खुले में सोने को मजबूर थे. रेलवे के कर्मचारियों ने शुक्रवार की सुबह रेलवे की ज़मीन पर बनी झुग्गी बस्ती को बिना किसी पूर्वसूचना के तोड़ा था. लगभग 900 लोगों की इस बस्ती में तब अधिकतर लोग सो रहे थे.

अधिकतर लोगों को अपना सामन बचाने का मौका भी नहीं मिला. रीनू नाम की एक महिला की पाँच साल की बच्ची बुलडोज़र के नीचे आते- आते बची.

इन लोगों के बारे में रेलवे अधिकारियों की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

'रुक जाओ बाबू !'

Image caption 70 साल की कलावती की आँखों के आँसू बात करते वक्त उनके चेहरे को भिगोते रहे.

रीनू बताती हैं, "वो बुलडोज़र लेकर आए और सीधे ही झुग्गी पर चढ़ा दिया. मैंने कहा रुक जाओ बाबू, तो रुक भी नहीं रहा था. वो तो मैंने भाग कर अपनी बच्ची को उठा लिया."

इस बस्ती में रहने वाले ज़्यादातर लोग कूड़ा बीनकर, दुकानों पर नींबू-मिर्च लगा कर या फूल बेचकर अपना गुज़ारा करते हैं. अधिकतर लोगों ने बताया कि वह महीने में 1500-2500 रुपए कमा पाते हैं. इतने ही पैसों में पूरे परिवार का गुज़ारा होता है.

चलने फिरने से लाचार लगभग 70 साल की कलावती की आँखों के आँसू बात करते वक्त उनके चेहरे को भिगोते रहे.

दिल्ली के बेघर- सड़कों पर है बसेरा

उन्होंने बताया, "हमारा बहुत नुकसान हो गया बिटिया. बुलडोज़र ने सारा सामान बटोरकर गड्ढे में डाल दिया. पहचान पत्र, राशन कार्ड सब मिट्टी में मिला दिया. हमारा तंबू, बल्ली, बर्तन सब चला गया. एक कौड़ी रुपया भी नहीं बचा जो कुछ ख़रीद लें."

उन्होंने कहा, "एक दाना भी नहीं बचा. हम भूखे- प्यासे मर रहे हैं और अब ठंड की बारिश में भीग कर मरे जाते हैं."

अपनी टूटी हुई झुग्गी को दोबारा बनाने की कोशिश कर रहे अमित का भी यही कहना था कि यह सब अचानक हुआ.

'भाषण देकर चले गए'

Image caption अधिकतर लोग अपनी टूटी झुग्गी को दोबारा बनाने में व्यस्त थे.

उन्होंने बताया, "राजनीतिक दलों के लोग यहाँ पर आए थे और कुछ भाषण देकर चले गए. मदद के नाम पर देकर कुछ नहीं गए. बस कहा कि सब काम हो जाएगा."

सोनिया की बच्ची जब पैदा हुई तब उनकी झुग्गी टूटने जा रही थी. जिस मटमैले शॉल से सोनिया ने अपना तन ढँक रखा था, उसी को बच्ची को ओढ़ा रखा था. सोनिया ने शॉल उठाकर बच्ची को दिखाया. नवजात बच्ची बिना कपड़ों के थी. ठंड की वजह से उसका चेहरा लाल था.

सोनिया ठंडी ज़मीन पर बैठी थीं. बच्ची दूध पी रही थी. यह पूछने पर कि आपने सुबह से क्या खाया है, सोनिया की पीड़ा बाहर आ गई.

उन्होंने कहा, "सुबह से कुछ नहीं खाया. जब से झुग्गी टूटी है बस इसी में लगे हैं. बच्चा हो जाने पर हमारे घर में दो टाइम, तीन टाइम खाना बन जाता था. लेकिन अब कहाँ जाएं किससे कहें?"

उपराज्यपाल नजीब जंग ने झुग्गी तोड़े जाने के अगले ही दिन तुरंत इन लोगों के पुनर्वास किए जाने बात की थी.

सोनिया को सरकार की तरफ़ से तिरपाल मिल गया है लेकिन बहुत से लोगों ने अभी तक कोई सहायता न मिलने की शिकायत की. कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें तिरपाल तो मिल गया है लेकिन वह पानी नहीं रोक पाएगा. कुछ ने कहा कि उन्हें झुग्गी के आकार से छोटा तिरपाल मिला है.

'ज़मीन नहीं घेर रहे थे'

Image caption रवींद्र का कहना है कि जब से प्लॉट या अन्य मुआवज़ा देने का ऐलान हुआ है तब से कुछ अफ़वाहें फैली हैं.

'ह्यूमन पीपल टू पीपल इंडिया' एक ग़ैर सरकारी संगठन है. वर्ष 2010 से यह संगठन इस जगह पर दिल्ली सरकार की तरफ़ से रैन बसेरा चला रहा है. इस में 100 से ज्यादा लोग एक बार में नहीं आ सकते. इस संगठन के सूचना अधिकारी रवींद्र कुमार ने बताया, " ये लोग ज़मीन घेर नहीं रहे थे केवल रह रहे थे. बुलडोज़र वाले आए और अचानक से सब तोड़ दिया. ये भी नहीं सोचा कि इतनी कड़ाके की ठंड में ये कहाँ जाएंगे?"

उन्होंने बताया, "यहाँ पर जो पुराने लोग रह रहे हैं उनके बारे में सारी जानकारी हमारे पास उपलब्ध है. अगर उनके कागज खो गए हैं तो हम उसकी कॉपी निकवाकर इन्हें दे सकते हैं."

साथ ही रवींद्र ने बताया कि यहाँ राजनीतिक दल के कुछ लोग आकर जब प्लॉट या अन्य तरह से मुआवज़ा देने कि घोषणा करके गए हैं तब से कुछ अफ़वाहें फैली हैं. आस पास से और लोग भी आकर यहाँ नई झुग्गियाँ बना रहे हैं.

उन्होंने कहा,"पहले यहाँ लगभग 170 परिवार थे लेकिन अब यहाँ लगभग 300 परिवार हैं."

भारतीय रेलवे के कर्मचारियों ने शुक्रवार की सुबह रेलवे की ज़मीन पर बनी इस बस्ती को बुलडोज़रों और जेसीबी मशीन के साथ "कब्ज़ा मुक्त" करवाया था.

रेलवे के दिल्ली डिविज़न के अधिकारी एके सचान से झुग्गी तोड़े जाने की इस घटना के बारे में बीबीसी ने कई बार संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया.

उनके घर पर फ़ोन करने पर उनके एक कर्मचारी ने फ़ोन उठाया और कहा, "साहब घर पर नहीं हैं. बता कर नहीं जाते हैं."

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