रहने को घर नहीं, फिर भी 'हैप्पी न्यू ईयर!'

चेन्नई

नया साल दस्तक दे रहा है. हर जगह, खासकर शहरों में, एक ही सवाल है- कैसे मना रहे हैं आप नया साल? कुछ लोगों ने दोस्तों के साथ रात भर जश्न मनाने की सोची, तो कुछ देश से बाहर जाकर नया साल मना रहे हैं.

लीलाबाई चेन्नई में कई सालों से रह रही हैं. उन्होंने अब तक नए साल के उत्सव के बारे में नहीं सुना था. जीवन के सात दशक जी चुकी लीलाबाई ने पहली बार पटाखे जलते, केक कटते और बंटते देखा है.

वे कहती हैं, “मैं नए साल जैसे किसी उत्सव के बारे में या इसे कैसे मनाया जाता है, नहीं जानती थी. मगर फुलझड़ियां फूटते, रोशनी बिखेरते जब देखा तो बहुत अच्छा लगा.”

चेन्नई में बेघर लोगों के लिए बनी बस्ती में रहती हैं लीलाबाई. यह बस्ती उन लोगों का आसरा है जिनका न कोई घर-परिवार है और न ठौर-ठिकाना.

इस बार जश्न मनाने की बारी इन बेघरों की थी.

चेन्नई कॉरपोरेशन और बेघरों का आश्रम चलाने वाली गैरसरकारी संस्था आईसीडब्ल्यूओ ने फ़ैसला लिया कि बेघर लोग भी नए साल का जश्न मनाएंगे.

केक और बड़ा खाते हुए 72 साल के परमन नए साल के जश्न को दूर खड़े निर्लिप्त भाव से देख रहे थे.

अपनी कोहनी दिखाते हुए परमन कहते हैं, "जब मेरी कोहनी टूटी, तभी ट्रक ड्राइवर की नौकरी छूट गई थी. फिर मैं घर छोड़ भीख मांगने वालों के गुट में शामिल हो गया. वे लोग मुझे यहां छोड़ गए ताकि मुझे रहने और सोने का ठिकाना मिल जाए.”

11,000 से ज्यादा बेघर

'होमलेस शेल्टर इनिशिएटिव ऑफ चेन्नई कॉरपोरेशन' के शहरी समन्वयक क्लीमेंट डेविड बताते हैं कि आधिकारिक तौर पर चेन्नई में 11,000 बेघर लोग हैं. पूरे शहर में यह आंकड़ा 15,000 भी हो सकता है.

पिछले कुछ महीनों से चेन्नई कॉरपोरेशन ग़ैरसरकारी संगठनों के सहयोग से बेघरों के लिए आश्रम बनाने का अभियान चला रहा है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा बेघरों को आसरा मिल सके.

सुप्रीम कोर्ट ने जब से राज्य सरकार को फुटपाथ पर रहने वालों के लिए आश्रय सुनिश्चित करने का आदेश दिया है, तब से यह कवायद तेज़ हो गई है.

क्लीमेंट बताते हैं, “हम बेघर लोगों को आश्रय की उपलब्ध सुविधाओं के बारे में बताते हैं. लेकिन हम उन्हें इन आश्रमों में रहने के लिए मजबूर नहीं करते. फ़ुटपाथ पर रहने वाले अधिकांश लोग यहां आना नहीं चाहते. वे जिस इलाके में रहते हैं वहां रोज़ी-रोटी कमाने का कोई न कोई साधन होता है. यहां आने से वह छूट जाता है. यहां रहने वालों में ज़्यादातर वो हैं, जो अब इतने बूढ़े हो चुके हैं कि कोई काम नहीं कर सकते. उत्तरी मद्रास का यह आश्रम उनका आशियाना है.”

बेघरों को आशियाना देने वाली यह संस्था आश्रम में रहने वालों को उनके परिवार से मिलाने की भी कोशिश करती है. मगर दस में से एक कोशिश ही कामयाब हो पाती है.

बेनाम और बेआवाज़

आश्रम के एक कोने में एक बुज़ुर्ग कुछ कह रहे हैं. उन्हें यहां बेहद दयनीय हालत में ज़िला स्वास्थ्य केंद्र के ज़रिए लाया गया. उन्हें कोई नहीं पहचानता.

आश्रम के अधिकारी उनका पता ढूंढ़ने की कोशिश में हैं. नए साल के मस्ती भरे माहौल और जश्न ने उनमें भी जोश भर दिया है.

दूसरे कमरे में 83 साल की बूढ़ी आरोगिम्मा है. उन्हें यहां उनकी बेटी छोड़ गई हैं. ठंडे फर्श पर चेहरा आधा ढके वे चुपचाप बैठी हैं.

जैसे ही पास वाले कमरे से संगीत और ठहाकों की आवाजें उन तक पहुंचती हैं, उनके पैर थिरकने लगे हैं. कमज़ोर शरीर और ज़्यादा उम्र के बावजूद वे जश्न का आनंद लेने में पीछे नहीं.

आरोगिम्मा की देखभाल करने वाली सरस्वती कहती हैं, ''यहां के अधिकांश लोगों को नहीं पता कि नया साल क्या है. जश्न और मस्ती से उनका परिचय कराने की यह कोशिश है. इसके अलावा यह आश्रम उन्हें इसका अहसास कराता है कि उनके पास भी नहाने, सोने और गरिमापूर्ण तरीके से रहने का एक ठिकाना है.''

संगीत, नृत्य और फिर कटा केक

कुछ उत्साही वॉलंटियर एक माइक लेकर संगीत की धुन पर थिरक रहे हैं. साथ ही बुज़ुर्गों को उनके साथ थिरकने को बुला रहे हैं. बूढ़े भी ताल से ताल मिलाने की कोशिश कर रहे हैं.

फिर एक केक लाया जाता है. सभी इसे साथ-साथ काटते हैं. आश्रम को दान देने वाले कारोबारी सुरेश बताते हैं, ''यह अलग दुनिया है. उस दुनिया में लोग अपने जश्न में डूबे हैं और यहां ये लोग कितनी बुरी दशा में रह रहे हैं. इन्हें इनके बच्चों ने ही त्याग दिया है. यह ऐसे लोगों के लिए कुछ करने का अवसर है.''

तीन बेटियों की मां समुंदी बताती हैं, ''बेटियों की शादी करने के बाद पति की मौत हो गई. मैं लगभग फ़ुटपाथ पर आ गई. अब तो मुझे यह भी पता नहीं कि मेरी बेटियां कहां हैं.''

नए साल की पार्टी में समुंदी नाचने और गाने में सबसे आगे रहीं. बस अफ़सोस यह था कि नजर कमज़ोर होने के कारण वे पटाखों का मज़ा नहीं ले पाईं.

जिनका पता है फ़ुटपाथ

क्लीमेंट कहते हैं कि यह विडंबना है कि इनमें से अधिकांश के पास राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र हैं.

वे कहते हैं, ''इसमें उन्होंने उस दुकान या गली का पता लिखा है, जहां वे सोते हैं. जो प्लास्टिक के चादरों से बने तंबू में रहते हैं, उन्होंने उसी को अपना पता बताया है."

पारमन कहते हैं, ''मेरे परिवार ने वर्षों से मेरी सुध नहीं ली. उनसे मिलने की कोई उम्मीद भी बाकी नहीं रही. अब यही मेरा जीवन है. जहां तक नया साल मनाने की बात है, तो सारी दुनिया इसे मनाती है और हम भी मना रहे हैं.''

इस जश्न की खास बात यह रही कि यह एक ऐसा जमावड़ा था, जो कभी ख़त्म नहीं हो सकता. चाहे उत्सव मने, न मने इस पार्टी के अधिकांश लोगों को यहीं साथ-साथ रहना है.

जिनके पास कोई दूसरा घर नहीं, उनके जीवन को ऐसे कुछ छोटे छोटे पल रौशन करते हैं. घर का, अपनेपन का, साथ का एहसास देते हैं.

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