'यहाँ कम आज्ञाकारी लोगों को सम्मान मिलता है'

संजीव बिखचंदानी, रेखांकन-अनीता बालचंद्रन

संजीव बिखचंदानी इंफ़ो एज कंपनी(नौकरी डॉटकॉम) के संस्थापक और एग्ज़ीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट हैं. संजीव को उनके साझीदार हितेश ओबरॉय के साथ संयुक्त रूप से वर्ष 2008 में ''अर्नेस्ट एंड यंग आंत्रप्रैन्योर' का खिताब मिला था.

साल 2008 ही में उन्हें डेटाक्वेस्ट पाथब्रेकर पुरस्कार और टीचर्स अचीवमेंट अवार्ड भी जीता. पहली पीढ़ी के कारोबारी शृंखला की आख़िरी कड़ी में संजीव की कहानी उन्हीं की जुबानी.

पढ़ें- 'आप तितली हैं तो उड़िए, मैंने यही किया'

मेरे पिता एक डॉक्टर हैं और माँ गृहिणी. वह दोनों देश के बंटवारे के बाद अपने अपने परिवारों के साथ पाकिस्तान के सिंध प्रदेश से भारत आए थे.

मेरे पिता को आगरा मेडिकल कॉलेज से अपनी मेडिकल की पढ़ाई आगे ज़ारी रखने के लिए सरकारी छात्रवृति मिल गई.

कॉलेज ख़त्म करने के बाद उन्होंने एक और सुरक्षित कदम उठाया और सरकारी मुलाज़िम हो गए.

स्कूल में दाखिला

मेरे माँ पिताजी ने मेरे भाई और फिर मेरा दाखिला सेंट कोलम्बस स्कूल में करवा दिया.

इस स्कूल में केवल लड़के पढ़ते थे. यह स्कूल अपने अनुशासन के लिए जाना जाता था. यहाँ अनुशासन बनाए रखने के लिए शारीरिक दंड भी दिया जाता था. अनुशासन के अलावा स्कूल में आदर्शों, व्यक्तित्व निर्माण और सच्चाई का पाठ पढ़ाया जाता था.

यदि आप नक़ल करते पकड़े गए तो आपकी शामत थी. शामत यानी छड़ी से पिटाई. पढ़ाई के लिहाज़ से कोलम्बस उस समय देश का सबसे बेहतरीन स्कूल था.

जब आप एक स्कूली बच्चे होते हैं तो आपके बहुत से ख़्वाब होते हैं. एक दिन आपको कोई फ़िल्मी सितारा भाता है, तो दूसरे दिन सुनील गावस्कर आपका आदर्श बन जाता है.

'इस देश को ज़रूरत है लंबी दौड़ के घोड़ों की'

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था. मेरा कोई एक आदर्श नहीं था.

मैं अपने भाई को अपना आदर्श मानता था क्योंकि वो हमेशा कक्षा में प्रथम आता था. मुझे हमेशा उसका उदाहरण देकर उसके नक़्शे-कदम पर चलने की सलाह दी जाती थी.

पढ़ाई का महत्व

पढ़ाई मेरे लिए भी सबसे महत्वपूर्ण थी लेकिन उतनी नहीं जितनी होनी चाहिए थी. जब भी मैं मन लगा कर पढ़ाई करता मेरा प्रदर्शन अच्छा होता लेकिन बहुत बार मैं पढ़ाई में मन ही नहीं लगाता था. मैं अपने भाई का बहुत सम्मान करता था क्योंकि वो बिल्कुल सीधे और सही रास्ते पर था जबकि मेरा ध्यान अक्सर इधर-उधर भटका रहता था. मेरी मन खेलों में लगा रहता.

मैंने अपने व्यक्तिगत लक्ष्य हासिल करने के लिए तो हमेशा कमरतोड़ मेहनत की लेकिन कक्षा में प्रथम आने के लिए कभी नहीं. यदि मेरे मन के अंदर से किसी चीज़ को करने की इच्छा नहीं होती थी तो मैं वो चीज़ नहीं करता था. मैं कभी कोई काम सिर्फ इसलिए नहीं कर सकता था क्योंकि उसे करने पर मेरी प्रशंसा होने वाली थी.

'अच्छा काम सिद्धांतों से होता है व्यस्तता से नहीं'

मैंने आईआईटी में स्थान पाने के लिए बेहद मेहनत की क्योंकि उस समय मेरा लक्ष्य वो था लेकिन मैंने वहाँ दाखिला नहीं लिया. आईआईटी के बजाय मैंने सेंट स्टीफ़ेन्स कॉलेज में दाखिला लिया.

मैंने तय किया कि मैं इंजीनियर नहीं बनना चाहता. मुझे एमबीए करना था. इसलिए मुझे लगा कि पांच साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई में बर्बाद करने के बजाय मुझे तीन साल अर्थशास्त्र पढ़ना चाहिए.

कार्ल मार्क्स का सिद्धांत

मुझे अर्थशास्त्र बेहद पसंद था. उसमें मुझे किसी उबाऊ पाठ्यक्रम को रटने की ज़रूरत नहीं थी. साथ ही लंबे-लंबे. व्याख्यापूर्ण उत्तर लिखने की भी ज़रूरत नहीं थी. मुझे आर्थिक व्यवस्था की कक्षा पसंद नहीं थी. उसमें अर्थशास्त्र पढ़ने का मतलब था कार्ल मार्क्स के सिद्धांत, साम्यवाद और लंबी-लंबी व्याख्याएं. मुझे संक्षिप्त और स्पष्ट होना पसंद है.

आर्थिक व्यवस्था की कक्षा में जितना लम्बा उत्तर उतने ज़्यादा अंक. आपको पांच-पांच पन्नों के उत्तर अति आलंकारिक अंग्रेजी भाषा में लिखने होते थे. मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी. मुझे लगता था कि यह सरासर समय की बर्बादी है.

स्टीफ़ेन्स कॉलेज के तीन साल मेरे लिए ताउम्र के लिए दोस्त बनाने, आत्म-चिंतन करने और फुरसत के साल थे क्योंकि यह संस्थान आपके ऊपर उतना दबाव नहीं बनाता.

ये तीन साल हमारे लिए हमारे लिए यह सोचने वाले साल थे कि हम अपने जीवन में क्या करना चाहते हैं. पहले मैं उन तीन सालों को मुड़ कर देखता था तो सोचता था कि मैंने उन तीन सालों में क्या किया और जो किया उससे क्या पाया. लेकिन आज दस साल बाद मैं महसूस करता हूँ कि उस तीन सालों में मिला वो समय वाकई में ज़रूरी था.

ख़ुद पर भरोसे ने बनाया तक़दीर का शहंशाह

स्नातक के बाद मुझे आईआईएम (भारतीय प्रबंधन संस्थान) में दाख़िला मिल गया था लेकिन उसके साथ ही लिंटास एडवर्टाइज़िंग एजेंसी में नौकरी भी.

मैंने लिंटास में काम करने का फैसला किया. लिंटास में मेरे साथ काम करने वाले लोग बहुत बढ़िया थे. मैं बेहद ऊंचे दर्जे के विद्वान-जानकारों के साथ काम कर रहा था. मुझे उनसे सीखने को बहुत कुछ मिल रहा था.

मेरे अनुबंध के मुताबिक़ मुझे सप्ताह में पांच दिन काम करना होता था लेकिन मैं छह-साढ़े छह दिन काम करता था. जब मैंने नौकरी डॉटकॉम की शुरुआत की तो मैं जानता था कि मुझे अपनी कंपनी में लिंटास जैसा ही काम का माहौल तैयार करना है.

अपना काम

लिंटास में काम करने के बाद मैंने आई आईआईएम, अहमदाबाद में दाख़िला ले लिया. वहाँ बहुत से स्वछंद और बेलगाम विचारों वाले लोग थे. हममें से ज़्यादातर साधारण मैनेजर की नौकरियां नहीं करना चाहते थे और ऐसी नौकरियों को हमने इंटरव्यू के दौरान ही मना कर दिया.

ऐसा लगता है कि आज भारत के बेहतरीन बिज़नेस स्कूल जिसमें आईआईएम-ए भी शामिल है, कक्षा में विविधता की अवधारणा को नज़रअंदाज़ करते जा रहे हैं. यह अच्छा नहीं है क्योंकि यदि आप विविधता ख़त्म कर देते हैं तो आप एक ही सांचे में ढले एक जैसे नमूने तैयार करते हैं और इन एक से नमूनों की भीड़ में उद्यमशीलता मिलना मुश्किल है.

मूल रूप से मैं एक स्वतंत्र विचारों वाला व्यक्ति हूँ. आप यह कह सकते हैं कि नौकरी डॉटकॉम में कम आज्ञाकारी लोगों को सम्मान दिया जाता है. हम सहनशीलता और अलग विचारों के सम्मान पर ज़ोर देने वाली कार्य संस्कृति को बढ़ावा देते हैं.

उद्यमशीलता और व्यापार की भावना को बचाए रखने की कवायद असल में प्रबंधन शृंखला में ऊपर से शुरू होती है. सबसे पहले आप सही किस्म के लोगों को काम पर रखें.

जब आपके पास ऐसे जो चार लोग आ जाएं तो यह ज़रूरी है कि उनकी ज़रूरतों को समझा जाए और उनकी उम्मीदों पर खरा उतरा जाए. ऐसा करके आप उन्हें सशक्त बनाते हैं.

और आख़िर में इस बात को सुनिश्चित करें कि आपके पास कंपनी का मुनाफ़ा सही तरह से इन सभी हकदारों में बांटने की योजना हो. यही लोग है जो आपके संस्थान को आगे ले जाएंगे इसलिए यह सुनिश्चित करें कि सभी को अपने काम और मेहनत के मुताबिक वाजिब हक़ मिले.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार