क्यों क़ीमती होते हैं आईवीएफ से जन्मे बच्चे?

वे महिलाएं जिन्होंने प्रजनन संबंधी समस्या का इलाज कराया है उनका कहना है कि उन्हें इस दौरान भारी मानसिक व भावनात्मक पीड़ा से होकर गुज़रना पड़ा है.

ज़्यादातर मामलों में दंपतियों को आईवीएफ तकनीक के कई चरणों से होकर गुजरना पड़ता है जो काफी खर्चीला और पीड़ादायी होता है. इसके अलावा इसमें सफलता की कोई गारंटी नहीं होती है.

इसीलिए इलाज के मार्फत मिला गर्भधारण हर उस व्यक्ति के लिए बहुत ही कीमती होता है जो इस प्रक्रिया का अंग होता है.

पिछले महीने प्रकाशित प्लाईमाउथ विश्वविद्यालय के अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि की गई है. डॉ. यानी हैनोक ने 160 इजराईली आब्स्टिट्रिशन और स्त्रीरोग विशेषज्ञों से पूछा कि क्या वे गर्भधारण में गंभीर स्थिति आने पर परीक्षण सुझाएंगे?

उन्होंने पाया कि डॉक्टर सामान्य गर्भधारण की अपेक्षा आईवीएफ मामले में परीक्षण के लिए सुझाव देने के लिए तीन गुना ज्यादा सतर्क होंगे.

2005 में मिंकॉफ और बर्कोविट्ज एक अमरीकी जनरल में 'दि मिथ ऑफ प्रीसियस बेबी' नाम से एक लेख प्रकाशित किया था.

इसमें कहा गया था कि ज़्यादातर गर्भवती महिलाओं की उम्र 40 से अधिक होने की वजह से सर्जरी के ज़रिए प्रसूति का प्रचलन काफी ज़्यादा हुआ है.

आईवीएफ गर्भधारण के मामलों में देखा गया है कि स्वास्थ्यकर्मियों में इससे कम ही सरोकार होता है.

इंग्लैंड के इनफर्टिलिटी नेटवर्क की सूज़न सीनन कहती हैं कि व्यवस्था ही ऐसी है कि इन महिलाओं को नीचा देखना पड़ता है.

''जब भी ऐसी महिलाएं अपने चिकित्सक को यह बताती हैं कि आईवीएफ प्रेगेनेंसी है, तब वो इसे एक दूसरा केस मानकर ही चलते हैं.''

सूज़न के अनुसार, ऐसी महिलाओं को भावनात्मक सहारे की ज़्यादा जरूरत होती है और सामाजिक और अन्य कारणों से उन्हें उचित मदद नहीं मिल पाती है.

अक्सर महिलाएं अपनी आईवीएफ प्रेगनेंसी को छुपा ले जाती हैं जबकि इनकी दिक्कते काफी जटिल होती हैं.

हॉल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर जूली जोमीन कहती हैं कि शोध के अनुसार आईवीएफ तकनीक से गर्भवती हुईं महिलाओं में व्यग्रता और चिंता ज्यादा होती है.

ऐसी स्थिति का मतलब होता है कि उन्हें चिकित्सकीय मदद की अधिक ज़रूरत है.

ऑक्सफोर्ड फर्टिलिटी यूनिट के मेडिकल डायरेक्टर टिम चाइल्ड के अनुसार, सामान्य तरीके से गर्भवती महिलाओं में बेचैनी और चिंता हो सकती है लेकिन आईवीएफ महिलाओं को ज़्यादा मदद की ज़रूरत होती है.

यहां तक कि संतान होने के बाद भी महिलाएं इतनी संवेदनशील हो जाती हैं कि वे बच्चे को छोड़ना नहीं चाहतीं. उनमें संतान खो देने का हमेशा भय बना रहता है.

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