मोबाइल इंडियन: ये कहाँ आ गये हम?

  • 2 जनवरी 2014
मोबाइल इंडियन, mobile indian

पिछले क़रीब डेढ़ दशक में भारत में मोबाइल फ़ोन ने बहुत लम्बा सफ़र तय किया है. और इस छोटे से औज़ार के साथ भारत ने भी. इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आपके इनबॉक्स में कितनी सारी नववर्ष की शुभकामनाएँ हैं और इस बार नये साल के ग्रीटिंग कार्ड का आपने कितना आदान प्रदान किया.

मेरे कस्बाई बचपन तक (अस्सी के दशक में) टेलीफ़ोन की लाइन एक बड़ी उपलब्धि थी और लोग पड़ोसियों के नम्बर भी पीपी नम्बर कहकर इस हिदायत के साथ दे देते थे कि बहुत अर्जेंट हो तब यहाँ फ़ोन कर लेना. ट्रंक कॉल लगाने के लिए थोड़ा क़िस्मत भी चाहिए होती थी.

अब मोबाइल हर कहीं हैं और जितनी इस देश की आबादी है, उससे कहीं ज़्यादा मोबाइल फ़ोन के हैंडसेट बिक चुके हैं. दुनिया में सबसे सस्ते फ़ोन कॉल्स यहाँ हैं और उन्होंने अपनी तरह से समाज और बाज़ार दोनों को पुनर्भाषित किया है. चाहे वह मिस्ड कॉल से दस्तक देकर सामाजिक-राजनैतिक बदलाव करना हो या एसएमएस के ज़रिए एक चिंगारी को जनजागरूकता अभियान में बदलने का.

हममें से बहुतों को अंदाज़ा नहीं होगा पर एक औसत हिंदुस्तानी यूज़र दिन में करीब डेढ़ घंटा (एक अध्ययन के मुताबिक़ क़रीब 82 मिनट) अपने मोबाइल पर बातचीत से अलग दूसरी गतिविधियों पर लगाता है. यानी एक साल में आधे माह से थोड़ा ज़्यादा.

मोबाइल पर 82 मिनट

क्या होता है इन 82 मिनटों में? क्या कुछ नहीं होता है इन 82 मिनटों में? बहुत मुमकिन है कि आप इस शब्द को अपने मोबाइल पर पढ़ते वक़्त ठिठकें और सोचने लगे कि साल में आधा महीना क्या बहुत ज़्यादा हैं? हालाँकि हमारे और मोबाइल के बीच घनिष्टता का ये दायरा कम तो नहीं ही होने वाला.

हर किसी के लिए मोबाइल फ़ोन की अपनी उपयोगिता है और अपना सम्बंध है. हमारी सामाजिकता, हमारी सामुदायिकता, हमारी स्थानीयता, हमारी रोजीरोटी, हमारा मनोरंजन, हमारी प्रतिबद्धताएँ, हमारी याददाश्त, हमारे नोट्स, हमारा सोशल मीडिया, हमारे रिश्ते, हमारी अपनी पहचान बहुत हद तक मोबाइल फ़ोन ने बदली है. आसान की है और आज़ाद भी.

सिर्फ शहरों में ही नहीं, गाँवों में भी उनकी अहमियत बहुत है. मसलन हरियाणा का एक किसान अपने देसी जुगाड़ से घर बैठे बिजली का ट्यूबवेल का स्विच मोबाइल की घंटी मारकर चालू कर लेता है. और मंडी में फ़सल भेजने से पहले ही बाज़ार का भाव भी.

छत्तीसगढ़ के बैगा आदिवासी फ़ोन के ज़रिए जंगलात महकमे के एक अफ़सर से ज़मीन के पट्टों के बदले रिश्वत देने की बात एक मंच पर दर्ज करवाते हैं और उन्हें उनके पैसे वापस मिल जाते हैं. मोबाइल फ़ोन, कनेक्टिविटी, नेटवर्क और उनके अनूठे इस्तेमाल से हमारी दुनिया बदली हैं, और करोड़ों ज़िंदगियाँ भी.

इंटरनेट

जो ब्रॉडबैंड केबल से इंटरनेट कछुआ रफ़्तार से हिंदुस्तान में फैल रहा था, वह खरगोश की तरह मोबाइल पर सवारी कर रहा है और दुनिया के सबसे बड़े बाज़ार की तरह उभर रहा है. हाल तक वह महानगरों में केंद्रित था अब वह इंडिया से भारत की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहा है.

स्मार्टफ़ोन, टैबलेट और इंटरनेट लैस फ़ीचरफोन हमारी कहानियों को और बदल रहे हैं. पीसी कम्प्यूटर काफ़ी तेज़ी से पिछड़ रहे हैं इन मोबाइल पर इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों से. बहुत सी मोबाइल ऐप (एपलिकेशन्स) हैं जो सिर्फ मोबाइल के लिए बनी हैं और वे डेस्कटॉप पीसी की तरफ़ देख भी नहीं रहीं.

इस पूरी प्रक्रिया में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं का एक बड़ा संसार खुल रहा है, जिसके हम सब भागीदार भी हैं और साक्षी भी.

मोबाइल भारत को कैसे बदल रहा है, और ख़ुद को किस तरह बदल रहा है भारत की पेचीदगियों के बीच? बीबीसी हिंदी की यह पड़ताल इस महत्वपूर्ण बदलाव को समझने के लिए है और रेखांकित करने के लिए भी. एक माह चलने वाली श्रृंखला, 'मोबाइल इंडियन' में साझा करिए आपके सवाल और सरोकार हमारे साथ.

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