केजरीवाल की आमद, मोदी के लिए ख़तरे की घंटी?

अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी

दिल्ली विधान सभा चुनाव के परिणाम आने से पहले अगर कोई यह कहता कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने की उनकी कोशिश में 'आप' बाधा पहुंचाएगी तो किसी को इसका यक़ीन नहीं होता.

लेकिन दिल्ली में 'आप' की सरकार बनने के बाद और पार्टी के कुछ चुनावी वादों को पूरा करने की घोषणा के बाद अब कई लोग ये कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के लिए 'आप' सब से बड़ी चुनौती बन कर उभर रही है. दिल्ली चुनाव से पहले अगर मोदी लहर के बारे में बातें की जा रही थीं तो इसके बाद अब 'आप' की लहर महसूस की जा रही है.

(कांग्रेस में बेचैनी)

दिल्ली के बाहर अब कई राज्यों में अब आम लोगों के अलावा 'ख़ास' लोग भी आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं. वी बालाकृष्णन सॉफ्टवेयर कंपनी इनफ़ोसिस के बोर्ड की सदस्यता से अभी हटे ही थे कि उन्होंने 'आप' में शामिल होने का एलान कर दिया. कहा जा रहा है कि कोलकाता से लेकर बैंगलोर तक और गुजरात से हरियाणा तक 'आप' की लहर देखी जा रही है.

'आप' ने यह तो घोषणा की है कि वह आम चुनाव में भाग लेगी लेकिन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी, यह स्पष्ट अब तक नहीं किया है. अनुमान लगाया जा रहा है कि 'आप' कम से कम 300 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगी. अब तक 'आप' का असर शहरी इलाक़ों में देखा जा रहा है और इसके समर्थकों की एक बड़ी संख्या मध्यम वर्ग से आती है जिसके लिए भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा हो सकता है.

मध्य वर्ग

ये वर्ग अब तक भाजपा के मज़बूत क़िलों में से एक रहा है और इसी वर्ग में अब तक मोदी की लहर अधिक दौड़ रही थी. अगर 'आप' ने आम चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए और अगर ऐसा हुआ तो भाजपा के वोट कटेंगे और हो सकता है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की कोशिश नाकाम हो जाए.

(तीखे तीर कर रहे हैं 'आप' का इंतजार)

लेकिन सवाल यह है कि दिल्ली विधान सभा में 'आप' के बढ़िया प्रदर्शन को संसदीय चुनाव में दोहराया जा सकता है? ये काफी हद तक 'आप' के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई और सियासत में गंदगी को दूर करने के नारे पर दिल्ली वालों का मत हासिल किया है.

वो इस लड़ाई को को जारी रखने की कोशिश करेंगे और भ्रष्टाचार विरोधी नारे को अन्य राज्यों में भी लगाने की ज़रुरत को महसूस करेंगे. आजकल भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है जो क्षेत्रीय, धार्मिक और संकीर्ण भावनाओं पर हावी होने में कामयाब हुआ है और मध्यम वर्ग के ध्यान को अपनी तरफ आकर्षित करने में सफल रहा है और यही कारण है कि अब मोदी से अधिक केजरीवाल की चर्चा हो रही है.

चुनावी रणनीति

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई फिलहाल 'आप' का सब से बड़ा हथियार है. ये वोट हासिल करने में 'आप' की मदद कर सकता है.

(मोदीः राहत के बाद बढ़ेगी आफत?)

एक समय था जब इंदिरा गांधी 'ग़रीबी हटाओ' के नारे पर चुनाव जीता करती थीं और भाजपा ने 'हिंदुत्व' के नाम पर सत्ता हासिल की. केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के दस साल के कार्यकाल में कई स्कैंडल सामने आए जिसके कारण आम आदमी भ्रष्टाचार से परेशान हो गया है और इसीलिए भ्रष्टाचार देश में एक बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है.

केजरीवाल ने 'भ्रष्टाचार' और साफ सुथरी राजनीति के मुद्दे को अपनी चुनावी रणनीति का हिस्सा बना लिया है.

इस बात की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि वो आम चुनाव में एक बड़ी ताक़त बन कर उभर सकते हैं और अगर ऐसा हुआ तो ये मोदी के लिए खतरे की घंटी बन सकती है.

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