राजस्थान में अब मीसा बंदियों को मिलेगी पेंशन

  • 4 जनवरी 2014
वसुंधरा राजे

राजस्थान में विभाग बंटवारे के बाद हुई भाजपा सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में कई फ़ैसले लिए गए, लेकिन सबसे चर्चित फ़ैसला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पृष्ठभूमि के नेताओं को खुश करने वाला रहा.

यह फ़ैसला था आपातकाल के दौरान जेलों में बंद रहे सभी नेताओं या उनकी विधवाओं को पेंशन देने का. इस फ़ैसले का सबसे ज्यादा लाभ भाजपा के नेताओं को ही होने वाला है.

अब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश की तरह राजस्थान के उन सभी नेताओं या उनकी विधवाओं को हर महीने पेंशन मिलेगी, जो 26 जून 1975 को आपातकाल लगने से लेकर 1977 के दौरान मेंटीनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) और डिफ़ेंस ऑफ इंडिया रूल्स (डीआईआर) के तहत जेलों में बंद रहे हैं. ऐसे नेताओं में ज़्यादातर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे हैं.

मंत्री भी हक़दार

कुछ वामपंथी नेता भी मीसा और डीआईआर के तहत जेलों में बंद रहे थे. राजस्थान सरकार के पंचायती राज और ग्रामीण विकास मंत्री गुलाबचंद कटारिया तथा पेट्रोलियम मंत्री कैलाश मेघवाल जैसे कुछ मंत्री भी अब नए फ़ैसले के तहत पेंशन पाने के हकदार होंगे. इनके अलावा पेंशन पाने वालों की लंबी फ़ेहरिस्त है.

Image caption वसुंधरा राजे ने मीसा बंदियों को पेंशन देने के चुनावी वादे को कैबिनेट की पहली बैठक में ही निभा दिया.

मंत्रिमंडल की बैठक के बाद चिकित्सा और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने बताया कि हमारी पूर्व सरकार ने मीसा बंदियों की पेंशन योजना लागू की थी, जिसे पिछली कांग्रेस सरकार ने बंद कर दिया था. राज्य मंत्रिमंडल ने योजना बहाली का निर्णय लिया है. हालांकि उन्होंने यह साफ़ नहीं किया कि योजना के तहत कितनी पेंशन दी जाएगी.

पंचायती राज मंत्री गुलाबचंद कटारिया कहते हैं, योजना मध्यप्रदेश के पैटर्न पर लागू हो रही है. इस प्रक्रिया को जल्द तय कर लिया जाएगा. लेकिन अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगा कि यह पेंशन पिछली बार की घोषणा के दिन से लागू की जाएगी या नए सिरे से.

सेनानी का दर्जा

राज्य सरकार के कुछ अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि मध्यप्रदेश की तरह योजना लागू करने की संभावना है, जहां अभी 16000 रुपए की पेंशन मिल रही है. पेंशनधारियों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा भी हासिल है.

राज्य में पिछली भाजपा सरकार के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री के नाते वसुंधरा राजे ने मार्च 2008 को मीसा बंदियों को छह हज़ार रुपए की पेंशन और पांच सौ रुपए की चिकित्सा सहायता देने की घोषणा की थी.

भाजपा सरकार योजना लागू नहीं कर पाई और तभी सरकार बदल गई थी. कांग्रेस सरकार ने इस योजना को बंद कर दिया था. भाजपा सरकार ने जिला स्तर पर स्क्रीनिंग कमेटियां भी बनाईं थीं, मगर कांग्रेस सरकार ने उन्हें भी भंग कर दिया था.

तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल के अनुसार भाजपा सरकार ने जिन 800 लोगों को पेंशन देना तय किया था, उसके पीछे उसका आरएसएस वाला मंतव्य तय था. उनका कहना है कि सूची की जांच के बाद उसमें कई आपाराधिक पृष्ठभूमि के लोग मिले थे. इसीलिए सरकार ने पेंशन योजना रद्द थी थी.

तत्कालीन कांग्रेस सरकार की यह आपत्ति भी थी कि आखिर आपातकाल के दौरान जेलों में बंद रहे नेताओं को आज़ादी के आंदोलन के दौरान बंदी रहे लोगों जैसा सम्मान कैसे दिया जा सकता है.

चुनावी वादा

तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष वसुंधरा राजे ने कांग्रेस सरकार के फ़ैसले का कड़ा विरोध किया था. उनका कहना था, मीसा बंदी किसी भी तरह से स्वतंत्रता सेनानियों से कम नहीं हैं. वसुंधरा राजे ने ऐसे नेताओं की तुलना पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से की थी.

विधानसभा चुनाव से पहले सुराज संकल्प यात्रा के दौरान वसुंधरा राजे ने मीसा बंदियों को पेंशन देने का वादा किया था, जिसे उन्होंने कैबिनेट की इस बैठक में निभा दिया. कांग्रेस सरकार ने जब योजना पर रोक लगाई थी तो लोकतंत्र रक्षा मंच नामक संगठन ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी. वरिष्ठ अधिवक्ता भरत व्यास के मुताबिक़ अभी यह याचिका तय नहीं हुई है.

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