साल 2013 की हिन्दी किताबें, लेखिकाओं की पसंद

हिन्दी लेखिकाएँ, किताबें, 2013

स्त्री-पुरुष का विभेद तो इस श्रृंखला की किसी भी कहानी में नहीं था लेकिन लेखिकाओं पर एक अलग से कहानी करनी ही थी. लेखिकाओं से बातचीत करने में सबसे ख़ास बात यह रही कि उन्होंने दो टूक हाँ या ना बोला.

इसलिए इस कहानी को करने के लिए सबसे कम पापड़ बेलने पड़े. सारे अगर-मगर, किंतु-परंतु से गुज़रते हुए कहानी की यह क़िस्त भी पर्दे पर आ गई है. पढ़िए, साल 2013 में हिन्दी में प्रकाशित उल्लेखनीय किताबों की छठी क़िस्त, लेखिकाओं की पसंद.

अनामिका

Image caption अनामिका, कविता संग्रह- ग़लत पते की चिट्ठी, दूब-धान, बीजाक्षर, कविता में औरत इत्यादि. कहानी संग्रह- प्रतिनायक उपन्यास : दस द्वारे का पिंजरा विमर्श : स्त्रीत्व का मानचित्र, मन माँजने की जरूरत, पानी जो पत्थर पीता है.

नोवा ने अपनी नाव में सभी प्रजातियों का एक-एक जोड़ा बचा रखा था, जिनके दम से प्रलय के बाद भी जीवन का सिलसिला उसी लय-छंद में या उससे अधिक सप्रमाण, सरस, सार्थक ढंग से चलता रहे.

बीबीसी ने मुझसे साल 2013 की श्रेष्ठ कृतियों के बारे में पूछा तो संयोग से कई जोड़ा कृतियाँ फुर्र से उड़कर मेरी स्मृति के जंगले पर आ गई थीं. मंगलेश (नए युग में शत्रु) और यतींद्र (विभास) के काव्य संकलन एक तरफ़, दूसरी तरफ़ सविता सिंह (समय स्वप्न) और सुमन केशरी (मोनालिसा की आँखे) के काव्य संकलन, तीसरी तरफ़ वयोवृद्ध कवि केदारनाथ सिंह (सृष्टि पर पहरा) और लीलाधर जगूड़ी (जितने लोग उतने प्रेम) के परिपक्व संकलन. इन सबमें एक अलग-अलग रंग हमारे काव्य-जगत का आप देखेंगे.

मंगलेश भूमंडलीकरण के बाद के विस्थापित समाज के सजग चित्र अपनी सार्थक प्रश्नवाचक मुद्रा में सामने रखते हैं, तो यतींद्र का संकलन कबीर की कविता से अंतःपाठीय संवाद का अनूठा उदाहरण है. यतींद्र की किताब बहुत बेहतरीन किताब है. बहुत ही ठाठ से लिखा है यतींद्र ने.

सविता सिंह स्त्री फैंटेसी के आलोक में मुक्तिबोध के 'अंधेरे में' से अंतःक्रियात्मक संवाद करती हैं, तो सुमन केशरी आसपास बिखरी विसंगतियों के चुगते हुए बिंब सामने रखती हैं.

केदारनाथ सिंह और लीलाधर जगूड़ी ने परिपक्व दृष्टि से जीवन-जगत का जायज़ा लिया है. उनकी ज्यादातर कविताएँ पढ़ने के बाद यही लगता है, जो किंग लियर में शेक्सपीयर ने कहा था, 'राइपनेस इज़ ऑल.' उनकी कविता सम्यक दृष्टि से बिना आवेग के, निरुद्धिग्न ढंग से सृष्टि पर पहरा (केदार जी के संकलन का नाम) है. इसी तरह जगूड़ी जी के संग्रह का नाम है 'जितने लोग उतने प्रेम'. इन दोनों की कविता में बहुव्यापकता और सांद्र कवि दृष्टि का तानाबाना है.

स्त्री कवियों के कविता संकलन तो आए ही हैं उसके अलावा स्त्रीवादी समीक्षा की एक बहुत व्यंजक किताब मेरी नज़र से गुजरी है. एक दलित कवयित्री हैं, जो बहुत ही दृष्टिसंपन्न हैं, उनकी कविता पर टिप्पणी है. स्त्रीवादी कविता के नए रंग पर, इतनी बेबाक अपनी नए प्रतिमान जाहिर करती हुई टिप्पणियाँ उन्होंने की है. उनका नाम है ओमलता और स्वराज प्रकाशन से आई उनकी किताब का नाम है, 'समकालीन परिदृश्य में स्त्रीवादी कविता.'

गंगा प्रसाद विमल का मानुषखोर (किताब घर) उपन्यास आया है. जिसमें मानुषखोर रूपक का बहुत ही व्यंजक इस्तेमाल है. पहाड़ी प्रदेशों के जनजीवन में किंवदंती चलती है कि एक नरभक्षी जाति रहती है. लेकिन जिसे लोग नरभक्षी कहते हैं वह एक तरह से सूफी है. जो हमारी जातीय स्मृतियाँ होती हैं, ख़ासकर जनजातीय जीवन की स्मृतियाँ हैं उनको लोकगीतों इत्यादि के माध्यम से इस उपन्यास में बहुत ही सजग ढंग से पकड़ा है.

इसी विषयप पर मुद्राराक्षस जी का अर्धवृत्त (वाणी प्रकाशन) नामक उपन्यास आया है. यह बेड़िया जनजाति जो अपराधी जनजाती कही जाती है, उसके आंतरिक जीवन की लय और उसके जो संघर्ष हैं, जो बाज़ार का प्रभाव पड़ा है जंगलों पर, जो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ है उनसे संघर्ष करते हुए आदिवासी कैसे रह रहे हैं इसका बहुत ही दार्शनिक निरूपण भी है, बहुत ही समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी है.

इसके अलावा कृष्ण कुमार की किताब 'चूड़ी बाज़ार में लड़की' पर प्रकाशन वर्ष 2014 लिखा है लेकिन मुझे 31 दिसंबर को ही मिली थी. जैसी कि कृष्ण कुमार जी की शैली है उन्होंने छोटे-छोटे चुभते हुए वाक्यों में बाज़ार के संकट पर स्त्री दृष्टि से बहुत ही ख़ूबसूरत ढंग से विचार किया है. इस किताब को मैं बहुत तल्लीनता से पढ़ रही हूँ. अभी भी यह किताब मेरे तकिए के नीचे पड़ी हुई है, यह मुझसे अलग ही संवाद करती है.

कात्यायनी

Image caption कात्यायनी, कविता संग्रह- चेहरों पर आंच, सात भाइयों के बीच चम्पा, इस पौरुषपूर्ण समय में, जादू नहीं कविता इत्यादि. निबन्ध संग्रह- दुर्ग-द्वार पर दस्तक, कुछ जीवन्त कुछ ज्वलन्त इत्यादि.

मैं बता दूँ कि मैं इस समय यात्रा कर रही हूँ तो सिर्फ़ याददाश्त के आधार पर बोल रही हूँ. इसलिए इन्हें सर्वश्रेष्ठ या प्रातिनिधिक पुस्तकों में नहीं माना जाएगा, इससे भी अच्छी पुस्तकें आई हैं लेकिन मुझे ठीक से याद नहीं कि वह कब आईं. इन पुस्तकों को लेकर मैं आश्वस्त हूँ कि ये साल 2013 में ही आई हैं.

  • जाति और वर्ग- एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण, रंगनायकम्मा, राहुल फाउंडेशन

यह किताब अंग्रेज़ी से अनुदित है. तेलुगु की वरिष्ठ मार्क्सवादी विचारक एवं लेखिका रंगनायकम्मा जाति के प्रश्न को बहुत गंभीर ढंग से एक अलग, मार्क्सवादी नज़रिए से उठाती है. जो लोग भी जाति प्रश्न को गंभीरता से लेते हैं उन्हें इसे ज़रूर पढ़ना चाहिए. इस पुस्तक में रंगनायकम्मा अंबेडकर के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चिंतन की एक आलोचना भी प्रस्तुत करती है.

  • इक्कीसवीं सदी में भारत के मजदूर आंदोलन, (लेखों का संकलन), अरविंद फाउंडेशन

इसमें भूमंडलीकरण-उदारीकरण के दौर में मजदूरों की जो स्थिति बदली है, भारत में इक्कीसवीं सदी में मज़दूर आंदोलन कैसे खड़ा होगा और इन बदली हुई परिस्थितियों को कैसे देखें इस विषय को बहुत गंभीरता से उठाया गया है. यह भी मुझे आज के दौर की बहुत गंभीर पुस्तक लगी.

  • नए युग में शत्रु, मंगलेश डबराल, राजकमल प्रकाशन

मंगलेश वैसे भी मेरे प्रिय कवि रहे हैं. इस संकलन को पूरा तो नहीं लेकिन काफी कविताएँ मैंने पढ़ी हैं. कुल मिलाकर मुझे यह संकलन ठीक लगा.

निर्मला जैन

Image caption निर्मला जैन, आलोचना- रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र, आधुनिक साहित्य : मूल्य और मूल्यांकन, हिंदी आलोचना की बीसवीं सदी, संस्मरण- दिल्ली : शहर दर शहर

साल 2013 में किताबें तो बहुत पढ़ी हैं लेकिन जिन पुस्तकों ने मन पर बहुत प्रभाव छोड़ा उन्हीं का जिक्र कर रही हूँ.

  • भारतीय दलित आंदोलन का इतिहास, मोहनदास नैमिशराय, राजकमल प्रकाशन

नैमिशराय ने पहली बार सामाजिक आंदोलन के रूप में दलितों का इतिहास लिखा है जो चार खंडों में छपा है. हम लोग बार-बार कहते रहे हैं कि दलित साहित्य या दलित आंदोलन का इतिहास लिखने का प्रयास दलित लेखकों को करना चाहिए. इस किताब से बहुत सी बहुमूल्य सामाग्री सामने आई है जिससे दलित आंदोलन को समझने में बहुत मदद मिलेगी.

  • गंगा स्नान करने चलोगे, विश्वानाथ त्रिपाठी, भारतीय ज्ञानपीठ

यह एक तरह का संस्मराणत्मक लेखन है. इस किताब में उन्होंने अपने संपर्क में आने वाले हम उम्र लोगों, कुछ गुरुजनों और कुछ महत्वपूर्ण लेखकों पर लेख लिखे हैं. इसमें उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी, नागार्जुन, फ़िराक़ गोरखपुरी, भीष्म साहनी, नामवर सिंह आदि पर लिखा है. इसमें बहुत ही मार्मिक और सुंदर संस्मरणात्मक लेख हैं.

  • एक क़स्बे के नोट्स, नीलेश रघुवंशी, राजकमल प्रकाशन

यह साल 2012 की किताब है लेकिन मैंने इसे पढ़ा साल 2013 में. यह बहुत ही मार्मिक किताब है. इसमें किसी बड़े शहर या किसी बड़े नायक-नायिका की कथा नहीं है. इसमें एक छोटे से क़स्बे में ढाबा चलाने वाले एक व्यक्ति की आठ लड़कियों की कहानी कही गई है. बिना किसी ऊँचे आदर्श की बात किए बिना, लंबे-लंबे ब्यौरे दिए बिना बड़े ही संक्षेप में कथा कही गई है.

  • पुरुष विमर्श विशेषांक, प्रगतिशील इरावती(अक्तूबर-दिसंबर, 2013 अंक), संपादक सुधा अरोड़ा एवं मधु अरोड़ा, हिमाचल प्रदेश

मैं हमेशा कहती रही हूँ कि ज़रूरी नहीं है कि आप पुस्तकों से ही परिवर्तन करते हैं, या पुस्तकों से ही अपने पाठकों की मनोरचना का निर्माण करते हैं. कभी-कभी पत्रिकाएँ इस दृष्टि से महत्वपूर्ण काम कर जाती हैं. यह बहुत चर्चित पत्रिका नहीं है लेकिन इसका विशेष ज़िक्र इसलिए कर रही हूँ कि इस पत्रिका का ताज़ा अंक पुरुष विमर्श विशेषांक है.

मैं बराबर कहती रही हूँ कि यह एकपक्षीय नहीं है, यह एक मानवीय समस्या है. मैं हमेशा कहती हूँ कि स्त्री विमर्श के नाम पर हमें पुरुष को शत्रु नहीं बनाना चाहिए. ऐसे भी उदारहण हैं जहाँ पुरुषों के साथ अत्याचार होता रहा है. इस अंक में पुरुषों की स्थिति पर लेखिकाओं की कहानियाँ हैं. इनमें सुधा अरोड़ा, मधु अरोड़ा के अलावा उषा प्रियंवदा, वंदना मिश्र, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, अर्चना चतुर्वेदी, पूर्णिमा मौर्या इत्यादि की कहानियाँ हैं.

  • सम्पूर्ण कहानियाँ, मंज़ूर एहतेशाम, राजकमल प्रकाशन

इसकी कहानियाँ तो नई नहीं है लेकिन संकलन के रूप में यह नई किताब है. इसमें उनकी तमाम कहानियाँ हैं. मंज़ूर एहतेशाम अपनी विशेष क़िस्म की भाषा और शैली के लिए जाने जाते हैं. हालाँकि मंज़ूर एहतेशाम अपने उपन्यासों के लिए विशेष तौर पर प्रसिद्ध हुए थे लेकिन ग़ैर-सांप्रदायिक ढंग से मानवीय संबंधों की कहानियाँ लिखने में मंज़ूर एतहेशाम का कोई जवाब नहीं.

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