सुचित्रा सेन वाया दिलीप कुमार

  • 17 जनवरी 2014
सुचित्रा
Image caption अभिनेत्री सुचित्रा सेन इस समय बीमार हैं और उनकी हालत गंभीर है.

मैं फ़िल्म के उस दौर में बड़ा हुआ, जो फ़िल्मों का सबसे ख़राब दौर कहा जाता है, लेकिन मेरी पसंद मेरे दोस्तों के मुताबिक़ बहुत ही क्लासिकी रही है और मेरे सौंदर्यबोध के बहुत से मित्र क़ायल और घायल रहे हैं.

फ़िल्म देखने की मेरी कहानी भी बड़ी अजीब है क्योंकि मैंने सारी फ़िल्में दिलीप कुमार के हवाले से देखी और इन्हीं हवालों के ज़रिए मेरी मुलाक़ात हुई हिंदी सिनेमा के बड़े नामों से.

अगर दिलीप कुमार की फ़िल्म 'शक्ति' न होती, तो शायद मैं अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार से वाक़िफ़ न हो पाता. अगर 'मशाल' न आती तो शायद अनिल कपूर के अभिनय की सलाहियत न जान पाता.

जिस ज़माने में मेरी उम्र के बच्चे जितेंद्र और धर्मेंद्र के आख़िरी दौर की फ़िल्में देख रहे थे, मैं दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद की फ़िल्में तलाश रहा था.

और यही वह वक़्त था, जब मुझे दिलीप कुमार की फ़िल्म 'देवदास' देखने का मौक़ा मिला. फ़िल्म में जब मेरा परिचय पारो के किरदार से हुआ, तो बस सुचित्रा सेन को बिना पलक झपकाए देखता रहा.

लगा गोया वीनस या सुंदरता की देवी साक्षात परदे पर मौजूद हो. पनघट का वह सीन मेरी आंखों में अमर हो गया, जब पहली बार पारो मेरी आंखों के सामने आती है.

फ़िल्म देखने का सिलसिला जारी रहा. ज़ाहिर है कभी छिपकर, कभी भाई साहब से बताकर.

इमेज कॉपीरइट Getty
Image caption सुचित्रा सेन ने हिंदी में पहली फ़िल्म 'देवदास' दिलीप कुमार के साथ की थी.

फिर वहीदा रहमान को फ़िल्म 'दिल दिया दर्द लिया' में देखा जो सौंदर्य की दूसरी मूरत नज़र आईं. फ़िल्म 'तराना' में मधुबाला को देखा और फिर दिलीप कुमार के ही हवाले से मैंने दूसरी अदाकाराओं को जाना.

मगर, जो बला की कशिश, ताज़गी और जादू कर देने वाली अदाकारी का पैमाना सुचित्रा सेन ने खड़ा किया, वह हिंदी सिनेमा की किसी दूसरी अभिनेत्री में मुझे देखने को नहीं मिला.

क्लासिक फ़िल्में

सुचित्रा सेन ने हिंदी में नाममात्र की फ़िल्में कीं और सभी मैंने देखी हैं. वह बांग्ला फ़िल्मों की कलाकार रही हैं. मगर शायद अदाकारी किसी ज़ुबान की मोहताज नहीं होती.

हिंदी का लहजा न होने के बावजूद उन्हें जिन हिंदी फ़िल्मों में काम करने का मौक़ा मिला, उन्हें उन्होंने क्लासिक बना दिया है.

दिलीप कुमार के हवाले से मैं दूसरी बार फिर सुचित्रा अदाकारी का कायल बना. और यह फ़िल्म थी 'मुसाफ़िर'. लोगों को यह फ़िल्म बेशक पसंद न आई हो, मगर उसे 1957 की तीसरी बेहतरीन फ़िल्म का पुरस्कार मिला था.

मैं जो अब तक दिलीप कुमार के हवाले से फ़िल्म देखा करता था, उसने सुचित्रा सेन के हवाले से संजीव कुमार को देखा. यह किसी सितमज़रीफ़ी से कम नहीं. आप समझ ही गए होंगे कि फ़िल्म का नाम था 'आँधी'.

Image caption अपनी ख़ूबसूरती से सुचित्रा ने हिंदी सिनेमा में भी अलग पहचान बनाई.

इस फ़िल्म में उन्होंने जो अभिनय किया तो किसी को नहीं लगा कि वह इंदिरा गांधी नहीं हैं.

यह फ़िल्म हालांकि उनके अंतिम दौर की फ़िल्म थी, पर वह इसमें भी अपने रोल के साथ इंसाफ़ कर गईं थीं. उनका लहज़ा यहां ज़रा ज़्यादा खटकता है पर मेरे लिए वह लहज़ा भी क़ाबिले क़बूल है.

उनकी अन्य फ़िल्मों में 'चम्पा कली' और 'सरहद' भी शामिल है.

अमिट छाप

देव आंनद को मैंने दिलीप कुमार के साथ ही 'इंसानियत' में देखा था. जब हमारे शहर के सिनेमा हाल में देव आनंद की फ़िल्म 'बंबई का बाबू' लगी, तो मैं भला उसे कैसे छोड़ सकता था. इस फ़िल्म के गीत से तो पहले से ही वाकिफ़ था.

एक बार फिर सुचित्रा सेन को देखने का मौक़ा मिल रहा था और दिल देव आनंद हुआ जा रहा था यानी... दीवाना मस्ताना हुआ दिल मेरा.

फ़िल्म 'ममता' में धर्मेंद्र के साथ और फ़िल्म के यादगार गीत सुचित्रा सेन को हिंदी सिनेमा में अमर करने को काफ़ी हैं - रहें न रहें हम महका करेंगे, बन के कली बन के सबा, बाग़े-वफ़ा में.

हिंदी में सुचित्रा सेन ने सिर्फ़ सात फ़िल्में की हैं और शायद ही कोई फ़िल्म हो, जिसमें उनकी छाप मौजूद न हो - 'देवदास' से 'आंधी' तक उनका सफ़र हिंदी सिनेमा के लिए एक अनमोल धरोहर की तरह है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार