जयपुर में उम्मीदों की सड़कों पर ज़िंदगी की कारें

चांद बेगम, टैक्सी, महिला

वक्त की कँटीली-पथरीली सड़कों पर नंगे-पांव चलने वाली 32 साल की चाँद ने अपने हौसलों से अँधेरे में उम्मीदों की नई मंज़िल पा ली है.

जयपुर के ट्रांसपोर्ट नगर स्थित आमागढ़ की कच्ची बस्ती की जिन चाँद बेगम को कभी साइकिल चलानी भी नहीं आई, वो अब राजस्थान की राजधानी जयपुर की भीड़-भाड़ भरी सड़कों पर बड़ी कुशलता से कार दौड़ाती हैं. उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस मिल चुका है और उनके सामने कार चालक की नौकरी के कई ऑफर हैं.

(हम गुनहगार औरतें...)

नए साल में वह एक प्रोफेशनल कार चालक के रूप में अपनी नई ज़िंदगी शुरू करने जा रही हैं. चार साल पहले चार बच्चों की मां चांद के पति की मौत जिन हालात में हुई थी, उसके बाद जिंदगी कर्ज़ और नाउम्मीदगी के अँधेरों से भर गई.

लेकिन उन्होंने एक दिन जब सुना कि जयपुर में एक ग़ैर सरकारी संगठन, आज़ाद फ़ाउंडेशन, ग़रीब और बेहसहारा महिलाओं को न केवल कार चलाने का प्रशिक्षण दे रहा है बल्कि एक प्रोफेशनल ड्राइवर की नौकरी दिलाने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है, तो उन्हें यह बहुत रोमांचकारी लगा.

नई तरह की जिंदगी

आजाद फाउंडेशन की प्रोग्राम डायरेक्टर अनीता माथुर बताती हैं, "पहला बैच 13 युवा महिलाओं का है, जो जनवरी 2014 के पहले हफ्ते में अपना प्रशिक्षण पूरा कर लेगा. अब सखा कंसल्टिंग विंग्स प्राइवेट लिमिटेड इन प्रशिक्षित युवतियों को कार ड्राइवर की नौकरी दिलाने का काम करेगी. लेकिन इन्हें कमर्शियल लाइसेंस के लिए तीन साल का इंतजार करना होगा."

चांद कहती हैं, "मैं दिन में आस-पास के बच्चों को उर्दू पढ़ाती और रात भर मंदबुद्धि बच्चों के एक हॉस्टल की चौकीदारी करती थी."

चांद कहने लगीं, "मैं दूसरी शादी नहीं करना चाहती थी क्योंकि मुझे अपने बच्चों को बेहतर तालीम देनी थी. मैंने जून में प्रशिक्षण लेना शुरू किया और अब कार चलाना सीख गई हूं. अब हमें एक संस्था नौकरी भी दिलवाने जा रही है."

(किराये के मकान के लिए भटकती औरतें)

यह कहानी सिर्फ चांद की ही नहीं है. अंजुम सिद्दीकी, मधु पवार, मीनू, मोना, अंजना, दर्शना, अर्चना जैसी और भी बहुत-सी महिलाएं हैं, जो ज़िंदगी के ज़ख़्मों से पीड़ित थीं. लेकिन उम्मीदों के सफ़र की नई राहें तलाश रही हैं. अभावों से भरी लहूलुहान ज़िंदगी को एक नई राह मिल रही है.

हेमलता एक अकेली माँ हैं. बचपन में ही उनकी शादी हो गई थी. तीन साल की एक बच्ची की इस मां को पति ने छोड़ दिया. वह रात भर नाच-गाकर कमाती लेकिन उनके इस काम की वजह से एक तो समाज में इज्जत नहीं थी, दूसरे पुरुष भी तरह-तरह की बातें बनाते थे. उन्हें ठीक से साइकिल भी चलानी नहीं आती थी.

आर्थिक संकट

पहले उन्होंने अपने भाई की साइकिल चलानी सीखी, क्योंकि हर रोज़ बस या ऑटो से प्रशिक्षण केंद्र तक आने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे. वह वैशाली नगर के एक इलाक़े से क़रीब 15 किमी दूर साइकिल चलाकर आती थी. उनकी तीन साल की बेटी भी साइकिल पर साथ होती थी.

(बेबस औरतें, बेखबर बच्चे...)

हेमलता अपनी कहानी बताते-बताते रो पड़ती हैं और कहती हैं, "मैंने यहां सिर्फ कार चलाना ही नहीं, बल्कि ज़िंदगी को ही चलाना सीख लिया है. हमें यहां अंग्रेज़ी बोलना, पढ़े-लिखे लोगों से शालीनता से बात करना, कपड़े पहनना, स्वास्थ्य का ख़याल रखना, कारों की तकनीकी जानकारी और उन्हें ठीक करना जैसे तौर-तरीके भी सिखाए गए हैं."

चार बच्चों की मां अंजुम सिद्दीकी के पति यूएई चले गए तो उनके लिए आर्थिक संकट खड़ा हो गया. न तो मां-बाप और न ही सास-ससुर ने उनका साथ दिया. उन्होंने बर्तन माँजे, झाड़ू-पोछा किया, चूड़ियाँ बेचीं, फिर भी गालियां खाईं. उन्होंने कार चलाना सीखा है और अब उसे उम्मीद है कि उसे नए साल में कार चलाने का काम मिल जाएगा.

ड्राइविंग लाइसेंस

सवाई माधोपुर ज़िले के आदिवासी गांव नया पड़ाना की मोना वर्मा के पति ने दूसरी शादी कर ली तो उसके लिए जीवन जीना ही मुश्किल हो गया. वह मां-बाप के घर आ गई और झाड़ू-बर्तन का काम करने लगी. वह सिरदर्द और डिप्रेशन की शिकार थी और एक दिन दवा लेने जयपुर आई तो जैसे जीवन के दर्द की ही दवा मिल गई.

(मुझे जी लेने दे हर लम्हा...)

अस्पताल के बाहर लगी एक स्टाल पर वह उत्सकुतावश पहुंचीं तो उन्हें ड्राइविंग का प्रस्ताव मिला, जिसे उन्होंने उसी वक्त स्वीकार कर लिया. मोना बताती है, "मैंने गांव जाकर ज़िक्र किया तो आस-पड़ोस में सब जगह विरोध हो गया कि एक लड़की कैसे कार चलाना सीख सकती है. उसे तो झाड़ू-पोंछा ही करना चाहिए. ज्यादा से ज्यादा कुछ सीखना ही हो तो ब्यूटी-पार्लर का काम सीख ले!"

वो कहती हैं, "लेकिन मेरी मां ने कहा कि जयपुर में तेरी बुआ रहती है. वहां छह महीने ठहर जाना और कार चलाना सीखकर ही लौटना. अब मैं न केवल कार चलाती हूं बल्कि मुझे सिरदर्द और डिप्रेशन से भी मुक्ति मिल गई है."

जयपुर के परिवहन अधिकारियों ने उन्हें वाहन चालक का लाइसेंस देने से मना कर दिया क्योंकि उनके पास सवाई माधोपुर के एक गांव का पता था. वह अकेली ही एक दिन सवाई माधोपुर पहुंचीं और अपना लाइसेंस भी लेकर आ गई.

मोना ने बताया, "मैंने परिवहन विभाग के अधिकारियों को कार चलाकर भी दिखाया और उसे बैक घुमाकर आठ बनाकर भी दिखाया."

अनीता माथुर बताती हैं, "साल 2015 में इस संस्थान में प्रशिक्षित महिला कार चालकों के जरिए हम सखा कैब्स की शुरुआत करने जा रहे हैं. सखा कैब्स महिलाओं के लिए महिलाओं के द्वारा की सोच पर आधारित है लेकिन इसे कोई परिवार भी मंगवा सकता है. इसके बाद जयपुर में कोई भी महिला किसी भी समय कैब मंगवा सकती है."

कोटपुतली की सपना हो या शास्त्रीनगर की दर्शना, न केवल ये कार चलाने में पिछले छह माह में पारंगत हो चुकी हैं बल्कि जीवन जीने की एक नई संस्कृति भी इन्हें मिल गई है.

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