दिल्ली का जादू क्या देश के सिर पर बोलेगा?

आम आदमी पार्टी, केजरीवाल

आम आदमी पार्टी की दिल्ली की प्रयोगशाला से निकला जादू क्या देश के सिर पर बोलेगा? इस जीत के बाद से यमुना में काफी पानी बह चुका है. वह अपनी सफलता को लोकसभा चुनाव में भी दोहराना चाहती है.

इसके लिए 10 जनवरी से देश भर में ‘मैं भी आम आदमी’ अभियान शुरू होगा. खबरों के मुताबिक पार्टी में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में लोग आगे आ रहे हैं लेकिन भीड़ बढ़ाने के पहले पार्टी को अपनी राजनीतिक धारणाओं को देश के सामने भी रखना होगा.

'आप' के कामकाज की शुरूआत मेट्रो पर सवार होकर शपथ लेने जाने, लालबत्ती संस्कृति को खत्म करने जैसी प्रतीकात्मक बातों से हुई.

जनता पर उसका अच्छा असर भी पड़ा लेकिन सरकार बनने के बाद उसके फैसलों और तौर-तरीकों को लेकर काफी लोगों की नाराज़गी भी उजागर हुई है.

फैसलों पर विवाद

विश्वास मत पर बहस के दौरान कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियों ने सरकार को बिजली-पानी के फैसलों के बाबत निशाना बनाया था. कहा गया कि पानी की कीमत कम होने का लाभ ग़रीबों को कम, पैसे वालों को ज़्यादा मिलेगा.

बिजली की कीमतें प्रशासनिक कुशलता के सहारे कम नहीं हुई हैं, बल्कि सब्सिडी की मदद से कम की जा रही हैं. उधर मीडिया में नए विवाद सामने आने लगे हैं.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके मंत्रियों के मकान और गाड़ियों की व्यवस्था को लेकर मीडिया में सवाल उठाए गए. केजरीवाल ने क्यों पहले उन मकानों में रहने को मंज़ूरी दी और फिर क्यों उन में नहीं जाने का फैसला किया?

ताज़ा मामला है क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती और विधि सचिव के बीच जजों की बैठक बुलाने को लेकर हुआ मतभेद. महिला और बाल विकास मंत्री राखी बिड़ला की कार का शीशा टूटना भी विवाद का वषय बना.

ये सब छोटी बातें हैं, लेकिन इनसे ऐसी सरकार के लिए दिक्कतें पैदा होने लगीं हैं जिसका आधार उसकी 'छवि' है. इधर प्रशांत भूषण के कश्मीर में सेना की तैनाती के बारे में दिए गए बयान ने आग में घी का काम किया है.

आंदोलनकारी खोल से निकलना होगा

‘आप’ के नेतृत्व और कार्यकर्ताओं को राजनीतिक प्रशिक्षण और परिपक्वता की ज़रूरत महसूस की जा रही है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने अपने ताज़ा लेख में ‘आप’ को प्रशंसा की नज़रों से देखने के बाद कहा कि यह पार्टी नीतिगत सवालों से आँख चुरा रही है.

‘आप’ का उभार व्यवस्था के दोषों को उजागर करने के साथ हुआ है. उसके घोषणापत्र में लिखा है, 'हम सत्ता के केंद्रों को ध्वस्त करके राजनीतिक सत्ता सीधे जनता के हाथों में देने जा रहे हैं.' उसने अपने राजनीतिक विचार को महात्मा गांधी के 'हिंद स्वराज' के तर्ज पर 'स्वराज' नाम दिया है.

पार्टी के अनुसार, सरकार बनने के तीन महीने के अंदर ‘स्वराज कानून’ पास किया जाएगा. दिल्ली में 272 म्युनिसिपल वार्ड हैं. हर वार्ड को छोटे-छोटे मोहल्लों में बांटा जाएगा. एक वार्ड में 10 से 15 मोहल्ले हो सकते हैं.

एक मोहल्ले में 500 से 1000 परिवार होंगे. ऐसे एक मोहल्ले में रहने वाले वोटरों की आम सभा को ‘मोहल्ला सभा’ कहा जाएगा. सरकार को यह कानून पास कराने के लिए कांग्रेस के समर्थन की ज़रूरत होगी.

‘आप’ की एमसीडी में उपस्थिति शून्य है, जबकि उसकी योजनाएं तभी लागू हो सकती हैं, जब एमसीडी उसके पास हो. जनता को भागीदार बनाने की योजना लोक-लुभावन है, पर उसे लागू कैसे करेंगे?

एनजीओ संस्कृति

‘आप’ के साथ जुड़ने के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों के लोग सामने आ रहे हैं. कॉरपोरेट जगत की बड़ी हस्तियों के नाम भी इनमें शामिल हैं. बैंकर मीरा सान्याल और इंफोसिस के पूर्व सीएफओ वी बालाकृष्णन आप में शामिल हुए हैं.

लाल बहादुर शास्‍त्री के पोते आदर्श शास्त्री, पूर्व समाजवादी नेता कमाल फारुकी और पूर्व कांग्रेस नेता अलका लांबा भी पार्टी में प्रवेश कर चुके या प्रवेश की तैयारी कर रहे नेताओं में शामिल हैं.

लगता है कि इसमें शामिल होने वाले ज़्यादातर लोग गैर-राजनीतिक, कलाकार, वैज्ञानिक, खिलाड़ी और लेखक-पत्रकार होंगे.

कुछ लोग मानते हैं कि 'आप' एनजीओ संस्कृति की पार्टी है, जो अंततः देश के कॉरपोरेट सेक्टर के हितों की पूर्ति करेगी. फिर भी 'आप' को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि उसने राजनीति को वर्गों, जातियों और धर्मों की व्याख्या से बाहर किया है.

आर्थिक-सामाजिक विचार

लोकसभा चुनाव में उतरने से पहले राष्ट्रीय प्रश्नों पर उसका नज़रिया साफ़ होना चाहिए. पार्टी कहती है कि इन प्रश्नों पर हमने दिल्ली के चुनाव से पहले विचार किया था, पर उन्हें सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं किया था.

पार्टी में विभिन्न विषयों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने अपना योगदान दिया है. नीति बनाने के लिए पार्टी ने बाकायदा ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों की बड़ी टीम बनाई थी जिसने अपना ज़्यादातर काम जुलाई 2013 में ही पूरा कर लिया था.

न्यायिक सुधार की नीति का जो मसौदा तैयार किया गया है उसे बनाने का काम 'आप' के संस्थापकों में शामिल शांति भूषण की अध्यक्षता वाली समिति ने किया है.

रक्षा नीति का काम एडमिरल रामदास के नेतृत्व में पूरा किया गया है. पार्टी जल्द ही अपनी आर्थिक, विदेश और रक्षा नीति की घोषणा करेगी. इसके अलावा शिक्षा पर भी उसने अलग नीति तैयार की है.

वह इन विषयों पर जनता की राय भी लेना चाहती है और जनता अगर आप की नीति में कुछ सुधार के लिए कहती है तो पार्टी इन बड़े विषयों पर अपनी नीति भी बदलेगी.

मोदी के खिलाफ मोर्चा?

आम आदमी पार्टी के उदय के बाद एक धारणा यह बन रही है कि यह राजनीति नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकेगी. कांग्रेस अब इस महीने राहुल गांधी को औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में घोषित करने जा रही है. प्रियंका गांधी भी अब सामने आने वाली हैं.

कांग्रेस की रणनीति है कि पार्टी को बचाना है तो मोदी को रोकना होगा और मोदी को रोकने में ‘आप’ कारगर होगी.

‘आप’ की ओर से आनंद कुमार और प्रशांत भूषण ने मोदी विरोध के वक्तव्य भी दिए हैं. कांग्रेस की रणनीति यह हो सकती है कि एक तरफ से ‘आप’ अपना काम करे और दूसरी तरफ से हम.

‘आप’ का विरोध मुख्यधारा की राजनीति से है. ऐसे में किसी एक दल के साथ जाना ‘आप’ के लिए दिक्कत तलब होगा. वहीं उसे गठबंधन राजनीति के बारे में राय बनानी होगी. लोकसभा चुनाव का अनुभव ज़रूरी नहीं कि दिल्ली जैसा मीठा हो.

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