'घरेलू बजट में हो नाटक की जगह'

  • 9 जनवरी 2014
भारत रंग महोत्स्व (नाटक - पंपा भारत)

दिल्ली में इस सप्ताह शुरू हुए भारत रंग महोत्स्व में छह देशों से और भारत के 17 राज्यों से नाटकों का मंचन हो रहा है. इस सालाना समारोह को आयोजित करनेवाले राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक से बात की बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य ने.

नाटक को हमेशा एक विरोध का स्वतंत्र ज़रिया माना गया है, इस व़क्त जब भारत के तेज़ी से विकसित होते एक हिस्से ने उसी देश के एक बहुत बड़े हिस्से को पीछे छोड़ दिया है, तब ये आवाज़ इतनी ख़ामोश क्यों दिखती है?

इस सवाल से पहले ये सोचना होगा कि नाटक देखने का प्रतिशत कितना है और कितना रहा है. महराष्ट्र में मराठी भाषी जनता का चार प्रतिशत ही नाटक देखता है, कुछ ऐसा ही हाल बंगाल का है.

हिन्दी भाषी भूभाग में कितने ही प्रदेश आते हैं, लेकिन वहां नाटक देखनेवालों का प्रतिशत शून्य दश्मलव एक भी नहीं होगा. तो नाटक था कब किसी के जीवन का हिस्सा?

नाटक देखनेवाले मेरे ख़्याल से हमेशा बहुत कम रहे हैं और बल्कि अब शायद धीरे-धीरे बढ़ ही रहे हैं. जब तक परिवारों के महीने के बजट में नाटक देखने के लिए 200 रुपए अलग नहीं रखे जाएंगे, रंगमंच किसी की ज़िन्दगी का हिस्सा नहीं बनेगा.

(पूरा साक्षात्कार सुनने के लिए क्लिक करें)

मराठी नाट्य रंगमंच के जाना-पहचाना नाम, वामन केन्द्रे ने कुछ ही महीने पहले नेश्नल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक का पद संभाला है.

पर ये बढ़त उच्च मध्यम वर्गीय या बड़े शहरों के मनोरंजन के स्रोत के रूप में क्यों है, ऐसा क्यों हैं कि आम लोगों के मुद्दों को उठाने वाली ये कला उन्हीं से दूर हो रही है?

ये थिएटर के सामने एक बड़ी चुनौती है, कि उसका नाटकीय रूप इतना ज़बरदस्त हो कि वो टीवी, सिनेमा से बिल्कुल अलग अपनी कला को लोगों के सामने परोसे.

साथ ही नाट्यकर्मियों की भी ज़रूरत है. जब दिल्ली में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा की शुरुआत हुई थी, उसके बाद से मनोरंजन का स्तर बहुत बदल गया है और उसी के मुताबिक़ ट्रेनिंग की ज़रूरत है.

हमने केन्द्र सरकार से दरख़्वास्त की है कि हर राज्य में और हर भाषा में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा जैसे प्रशिक्षण संस्थान खुलने ज़रूरी हैं.

पर उच्च स्तरीय शिक्षा ही क्यों, विदेश में स्कूल और कॉलेजों में नाटक का प्रशिक्षण सामाजिक विकास की दृष्टि से दिया जाता है, भारत में क्या बच्चों और युवाओं के साथ नाट्य कला में पर्याप्त काम किया जा रहा है?

नहीं, मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता. हम बार-बार ये मांग कर रहे हैं कि ख़ास तौर पर स्कूलों में नाट्य प्रशिक्षण देना अनिवार्य किया जाना चाहिए.

जिन देशों में इसे संजीदगी से किया गया, वहां के युवा वर्ग की सामाजिक सरोकारों की ओर सजगता ज़्यादा है. उनके बहुत सशक्त, गहराई से सोचनेवाले और संवेदनशील नागरिक बनने की संभावना भी ज़्यादा है.

कई लोगों का मानना है कि वर्तमान दौर में अच्छे और गहरे स्तर के नए नाटकों का गहरा अभाव है, विजय तेंदुल्कर और ब्रेख़्त जैसे नाटककारों के बाद अब सतही और उथले नाटक देखने को मिल रहे हैं, क्या आप इसे भी प्रशिक्षण की कमी मानेंगे?

मोहन राकेश और सुरेन्द्र वर्मा जैसे कुछ अपवाद छोड़कर, मुझे लगता है कि इस देश में महाराष्ट्र, बंगाल और कुछ हद तक कर्नाटक के अलावा नाटक नहीं लिखे जा रहे. ये एक गहरी सच्चाई है.

किसी भी देश के अच्छे रंगकर्म की नींव अच्छे नाटककार होते हैं, जिनका भारत में इस वक़्त गहरा अभाव है. इसीलिए हम इस दिशा में पहल करनेवाले हैं और अगले सत्र से हम अपने पाठ्यक्रम में नाट्य लेखन का स्वतंत्र कोर्स शुरू करनेवाले हैं और पूरे देश में वर्कशॉप्स करने की योजना है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार