'डर लगता है, दसवीं के बाद घर वाले नहीं मानेंगे'

झारखंड की बाल पत्रकार श्वेता

गांव की लड़की श्वेता ने कम उम्र में शादी करने से साफ़ मना कर दिया है. उन्होंने घर वालों से कहा कि गांव में वह कम उम्र की किसी लड़की की शादी नहीं होने देंगी.

इस मुहिम में वह जुटी भी हैं. लेकिन श्वेता की आंखों में फ़िक्र भी है. वह कहती हैं, "लगता है कि दसवीं की पढ़ाई के बाद घर वाले नहीं मानेंगे." वजह है ग़रीबी और घर वालों पर समाज के ताने.

(रेत पर फिसलती है गरीबों की जिंदगी)

आदिवासी गांव का बच्चा शंकर टोप्पो बाल श्रम के ख़िलाफ़ कहता है, "बच्चों को मज़दूरी से बाहर निकालकर स्कूलों में नाम लिखाना ही मेरी पहचान है."

ठेठ गंवई बच्ची सीमा कविता लिखती है, "मां तूने इस फूल को किस भूल की सजा दी/जन्म से पहले ही मौत बेवजह दी."

ये हैं झारखंड के दूरदराज़ सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बाल पत्रकार. अधिकतर बाल पत्रकार आदिवासी समुदाय के हैं. इनमें कई ख़ुद को और गांव समाज को बदलने की मुहिम में जुटे हैं.

बाल विवाह, बाल श्रम

बच्चों के अधिकारों के लिए काम कर रही अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ़ राज्य के छह ज़िलों के 210 सरकारी स्कूलों में बाल पत्रकार कार्यक्रम चला रही है. पांच हज़ार से अधिक स्कूली बच्चों को इस कार्यक्रम से जोड़ा गया है. इस कार्यक्रम के ज़रिए बच्चों को उनके अधिकार बताए जाते हैं.

कुपोषण और एनीमिया की रोकथाम एवं स्वच्छता के सवाल पर भी उन्हें सजग किया जाता है. स्कूलों में बाल पत्रकारों का चयन लिखित और मौखिक जांच के आधार पर किया जाता है.

(बच्चों को नसीब है गुलामी)

हम श्वेता से मिलने झारखंड की राजधानी रांची से 35 किलोमीटर दूर उनके स्कूल पहुंचे. पता चला कि वह स्कूल नहीं आईं हैं. तब उनके गांव मनातू गए. वहाँ एक छोटी सी लड़की ने बताया, "देखिए जंगल से लकड़ी का गट्ठर लेकर वह लौट रही हैं."

कुछ ही देर में पसीने से तर-ब-तर श्वेता सामने थीं. उन्होंने लकड़ी का गट्ठर ज़मीन पर गिराया और उसी पर बैठ गईं.

वह बताने लगीं, "हफ़्ते भर के जलावन का इंतज़ाम करना था, सो स्कूल नहीं गई." अभी वह नौवीं कक्षा में पढ़ती हैं.

पिता झगरू करमाली और मां मंगरी देवी मज़दूरी करने घर से बाहर गए थे. श्वेता कहती हैं कि वह बाल पत्रकार न बनती तो शायद कब की ब्याह दी जाती.

मैट्रिक के बाद

अब इन बातों पर गांव के लोगों को समझाएं तो बड़े-बुज़ुर्ग झिड़कते हैं, "जा-जा, मास्टरनी बनी है."

रातू प्रखंड के लाल भोंडा गांव की रहने वाली सोनी कुमारी पूछती है, "गांवों में कम उम्र में बेटियों की शादी क्यों कर दी जाती है?"

सोनी के पिता नहीं हैं. मां कोको देवी मज़दूरी करती हैं. उनकी भी शादी तय कर दी गई थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया.

(बच्चों के दूध की राशनिंग)

वह कहती हैं, "बाल पत्रकार बनकर यह सीखा है कि शादी करने के बजाय अपने पैरों पर खड़ा होना ज़रूरी है."

सोनी कॉलेज की पढ़ाई भी करना चाहती हैं लेकिन ग़रीबी आड़े आ रही है. उनका सवाल है कि मैट्रिक की पढ़ाई के बाद उनके घर वाले आगे की पढ़ाई नहीं कराएं, तो कौन उनकी मदद करेगा.

सोनी के स्कूल के प्रधानाध्यापक परिवेश सिंह कहते हैं कि कई बाल पत्रकार गांवों का माहौल बदलने में जुटे हैं. सोनी की आर्थिक तंगहाली देखते हुए उनकी फ़ीस माफ़ कर दी गई है.

मनातू मध्य विद्यालय में आठवीं कक्षा के छात्र लखन मुंडा बाल पत्रकार हैं. लखन बताते हैं कि उनके स्कूल में आठवीं तक पढ़ाई होती है और सिर्फ चार ही शिक्षक हैं.

गांव के मुखिया शिवचरण करमाली से मिलकर उन्हें सब कुछ बताया है. अभी तक बात नहीं बनी है.

सोचा है कि डाक से मुख्यमंत्री के नाम पत्र ही भेज दूंगा. कई बाल पत्रकार स्थानीय प्रखंड विकास पदाधिकारी से भी मिलते रहते हैं.

बाल विवाह के खिलाफ

रांची जिले के आरा मध्य विद्यालय के आदिवासी छात्र शंकर टोप्पो बाल पत्रकारों का नेतृत्व करते हैं.

वो बताते हैं कि उनके गांव के बाहा, बिरजू, आकाश और अनूप बाल मज़दूर थे. चारों बच्चों को उन्होंने स्कूल में दाख़िला दिलाया. कुछ और बच्चों को मज़दूरी से हटाने की कोशिश में वो लगे हैं.

(क्या लौटेगी मुस्कान?)

शंकर के मुताबिक़ गांव के लोगों को समझाने-बुझाने पर डांट-फटकार भी मिलती है, लेकिन वो इसकी परवाह नहीं करते.

स्कूल की प्रधानाध्यापिका ए हेरेंज कहती हैं कि ये बाल पत्रकार अपने अधिकारों के बारे में बच्चों को समझाते हैं. लिहाज़ा स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति अच्छी होने लगी है.

सुदूर गांवों के बाल पत्रकार क्षेत्र भ्रमण पर भी जाते हैं. एक दूसरे के साथ अपने अनुभव भी साझा करते हैं.

बाल पत्रकार रीता ने कहा, "आपने सरस्वती दीदी के बारे में सुना है? वे बाल पत्रकारों की रोल मॉडल हैं."

सरस्वती गुमला ज़िले की रूकी गांव की रहने वाली हैं. परिवार वालों ने एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ उनकी शादी तय कर दी, तो उन्होंने बाल विवाह के ख़िलाफ़ वहां के उपायुक्त को पत्र लिखा.

तब यह मामला बाल कल्याण परिषद के पास पहुंचा. 18 वर्ष से कम उम्र होने की वजह से सरस्वती की शादी पर रोक लगा दी गई.

जमशेदपुर के एक गांव की बाल पत्रकार सीमा मछुवा पूछती हैं कि जीने का अधिकार समान फिर बेटा-बेटी में अंतर क्यों.

बाल मज़दूरी

छठी की छात्रा आरती कहती हैं, "गांवों में नशाख़ोरी बहुत है. रूढ़िवादिता और जनजागरूकता की कमी गांवों के विकास में बाधक है. इसे ठीक करना ज़रूरी है."

वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2010-11 की रिपोर्ट बताती है कि 51.8 फ़ीसदी महिलाएं जिनकी उम्र अभी 20 से 24 वर्ष है, उनकी शादी 18 साल से पहले कर दी गई.

(मजबूर माँः बच्चे बेचे या गोद दिए?)

एनएसएसओ के मुताबिक़ राज्य में 2.1 लाख बच्चे मज़दूरी से जुड़े हैं.

वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2011 के मुताबिक़ राज्य के गढ़वा ज़िले में सबसे अधिक 6.9 फ़ीसदी, गोड्डा में 6.8, पाकुड़ में छह फ़ीसदी बच्चे बाल श्रम से जुड़े हैं.

देश भर में आयरन की कमी से जूझ रही सबसे ज़्यादा महिलाएं (15 से 49 वर्ष के बीच ) झारखंड में है. यह आंकड़ा क़रीब सत्तर फ़ीसदी है.

महिला सशक्तीकरण

यूनिसेफ़ के झारखंड प्रमुख जॉब जाकिरया कहते हैं कि इन्हीं हालात को बदलने में आदिवासी गांवों में बाल पत्रकारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई हैं.

इस कार्यक्रम के ज़रिए सुदूर गांव की लड़कियां महिला सशक्तीकरण पर ज़ोर देने लगी हैं. यह कार्यक्रम गांवों के बच्चों को विचार, भावना प्रकट करने का अवसर भी देता है.

क्या पूरे राज्य में बाल पत्रकार कार्यक्रम चलाने की योजना है? इस सवाल पर वह कहते हैं राज्य सरकार दिलचस्पी दिखाए, तभी यह संभव है.

यूनिसेफ़ की प्रचार प्रसार विभाग की प्रधान मोइरा दावा सुदूर गांवों के बाल पत्रकारों की लिखी कविताएं, कहानियां और चित्रकारी दिखाते हुए कहती हैं, "है ना ये कमाल के. बाल अधिकारों के प्रति भी वे सजग हो रहे हैं. हम इस प्रयास में लगे हैं कि गांवों के बाल पत्रकारों को राज्य और देश के कुछ सेलिब्रिटी पत्रकारों से मिलवाएं."

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