भारतः आदिवासी अधिकार विकास पर असर डालेगा?

  • 11 जनवरी 2014

हरी भरी पहाड़ी पर धूल से भरी नारंगी रंग की विशाल चेन का आना जाना एक विहंगम दृश्य है.

यह दृश्य है हाल ही में हुए भारत के सबसे तीखे संघर्ष वाले क्षेत्र, नियमगिरी का. और ऊंचाई पर एल्यूमीनियम अयस्क तक पहुंचने की पहली कोशिश में ही इस विशालकाय मशीन को अचनाक बंद करना पड़ गया.

नियमगिरी के सबसे ऊंची पहाड़ी पर खड़ा लोहे का ढांचा एक संकेत हैं जिसे आप अपने नज़रिये से व्याख्यायित कर सकते हैं- एक परियोजना की असामयिक मृत्यु के रूप में या एक देश द्वारा ख़ुद को अलग-थलग कर लेने के रूप में.

इन पहाड़ियों में रहने वाले डोंगरिया कोंध आदिवासी समुदाय ने जब पिछले साल भारतीय-ब्रितानी खनन कंपनी वेदांता के ख़िलाफ़ अयस्क निकालने का बहुमत से विरोध किया तो अभियान चलाने वालों ने इसे आदिवासी अधिकारों की जीत के रूप में लिया.

सर्वाइवल इंटरनेशनल ने हॉलीवुड ब्लाकबस्टर 'अवतार' के आदिवासी चरित्रों से तुलना करते हुए, दावा किया कि ये 'असली' अवतार क़बीले हैं.

हालांकि वेदांता के लिए और भारतीय उद्योग जगत के लिए यह एक झटका था. उन्हें भय है कि पहले से ही हिचकोले खा रहे देश के विकास पर विपरीत असर पड़ेगा.

यहां तक कि आदिवासी गांवों में रायशुमारी जारी थी इसी दौरान दो अन्य बड़ी औद्योगिक कंपनियों ने नियमगिरी जैसी ही समस्याओं का आरोप लगा कर अरबों डॉलर के निवेश क़रार को रद्द कर दिया.

एक साल होने को हैं लेकिन स्थिती वैसी ही बनी हुई है. तोहमत, अविश्वास और दोहरे मानदंड के आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है.

ओडिशा के अधिकारी के अनुसार, ''यह पूरा गड़बड़झाला है.''

हालांकि डोंगरिया कोंध भी ख़ुश नहीं हैं. उन्हें डर है कि खनन कंपनी और उसके समर्थन में खड़ी सरकार उस पहाड़ी में खनन का कोई न कोई तरीक़ा निकालने की अभी भी कोशिश कर रहे हैं, जो उनके लिए पूज्यनीय है.

वे उस नई सड़क की ओर इशारा करते हैं जिसे उनके विरोध के बावजूद, प्रशासन जंगल काटकर तैयार कर रहा है.

कुछ महीने पहले तक एक गांव सारकोपारी तक केवल पैदल ही जाया जा सकता था, बीबीसी की टीम वहां चार पहिया वाहन में पहुंची.

पिछले साल की रायशुमारी में यह गांव भी शामिल था.

एक आदिवासी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया, ''सरकार हमें नियंत्रित करना चाह रही है.''

''माओवादियों को छिपाने का वे हम पर आरोप लगाते हैं. कभी कभी पुलिस यहां आती है हमारी पिटाई करती है.''

लेकिन तमाम दबावों के बावजूद वे अपने तरीक़े से जीने पर दृढ़ हैं.

जंगली पत्तों में खाना रख कर अपने बच्चों को देने जा रही एक महिला ने कहा, ''नियमगिरी जंगल हमें सबकुछ देता है, पेड़ से लेकर दवा औषधि तक.''

बहुत रमणीय दृश्यावली के बावजूद यहां का जीवन बहुत ही कठिन है.

पहाड़ियों पर रहने वाले डोंगरिया कोंध आदिवासियों की औसत आयु 40 है जो कि भारतीय जीवन प्रत्याशा से काफ़ी कम है.

एक व्यक्ति जिससे हमने बात की, उसने बताया कि उसके पांच बच्चे बहुत कम उम्र में ही मर गए.

वेदांता कंपनी भी हार नहीं मान रही है. शायद इस वजह से कि उसे क़रीब 60 अरब रुपये प्रतिवर्ष का नुक़सान हो रहा है.

पहाड़ी की तलहटी में फैली रिफ़ायनरी में वीरानी सी छायी हुई है. इसकी चिमनी से धुआं तभी निकलता है जब आयातित अयस्क यहां पहुंचता है.

सुप्रीमकोर्ट द्वारा निर्देशित रायशुमारी में मात खाने के बावजूद वेदांता इस बात पर अड़ा हुआ है कि राज्य सरकार के साथ 10 वर्ष के लिए हुआ क़रार अभी भी 1500 लाख टन बाक्साइट अयस्क के लिए वैध है.

वेदांता के चीफ़ आपरेटिंग ऑफ़िसर मुकेश कुमार कहते हैं, ''सरकार में उनका पूरा विश्वास है.'' उनका कहना है कि खनिज प्रधान इस राज्य में अन्य जगहों तक पहुंच हासिल करने की कंपनी की योजना है.''

अन्य जगहों पर विवादित रिकॉर्ड वाली ब्रितानी कंपनी वेदांता के पक्ष में बहुत कम ही लोग हैं.

कंपनी स्वीकार करती है कि उससे ग़लतियां हुई हैं. ओडिशा के अन्य आदिवासी रिहाइश वाले इलाक़ों में खनन हो रहा है तो नियमगिरी क्यों अलग मामला है.

कुमार कहते हैं कि विडंबना है कि वेदांता यहां केवल इसलिए आई कि 20 वर्ष पहले आस पास के कालाहांडी इलाक़े में भुखमरी और अकाल पर पूरे देश भर में हंगामा मचने के बाद सरकार पर विकास का दबाव बढ़ गया था.

''नहीं तो हम बेहतर आधारभूत संरचना वाली किसी और जगह को चुनते.''

पी साईनाथ की किताब 'इवरीबडी लव्स ए गुड ड्राट' में अकाल पीड़ितों की कहानियों- हताश महिलाएं अपने बच्चों को बेच रही हैं- ने पूरे देश और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का ध्यान आकर्षित किया.

यह और विडंबना है कि उनके पुत्र राहुल, जोकि अगले चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार हैं, डोगंरिया कोंध मुद्दे पर चैंपियन बनने के लिए ठीक उलट काम करेंगे जो उनके पिता ने विकास के लिए किया था.

रिफ़ायनरी से नीचे आने वाली सड़क के पास आदिवासी लोगों की बस्ती है, हालांकि उनके सामने अस्तित्व का ही संकट है.

रिफ़ायनरी के निर्माण के कारण उन्हें विस्थापित होना पड़ा और बदले में उन्हें घर, नौकरी और बच्चों के लिए स्कूल मिला.

रिफ़ायनरी में सुपरवाइज़र के पद पर कार्यरत राजू कहते हैं, ''यदि यह प्लांट बंद हो जाएगा तो हमारे पास कुछ नहीं बचेगा.''

यहां तक कि नियमगिरी के पहाड़ी गांवों में बदलाव की बयार है. कई लोग अपने बच्चों को पढ़ने के लिए बाहरी स्कूलों में भेज रहे हैं, जहां वो हॉस्टल में रहते हैं.

कुछ लोग सौर पैनल और अन्य आधुनिक सुविधाएं लगा रहे हैं.

खनन के समर्थों का कहना है कि इससे कहीं अधिक लाभ होगा. कई लोग सर्वाइवल जैसे विदेशी ग़ैर सरकारी संगठनों को इस विवाद में घी डालने के लिए दोषी मानते हैं- जो पाखंडपूर्ण तरीक़े से भारत में विकास का विरोध करते हैं जबकि पश्चिम इसका फ़ायदा उठा रहा है.

ओडिशा के एक अधिकारी के अनुसार, ''इससे यह संकेत जा रहा है कि निवेश के लिहाज़ से भारत सुरक्षित नहीं है. ''

हालांकि इस समस्या के मूल में अविश्वास ज्यादा है.

वेदांता के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले नियमगिरी प्रोटेक्ट कमेटी के अध्यक्ष कुमती मांझी कहते हैं, ''सरकार ने आदिवासी समुदाय के लिए अभी तक क्या किया?''

आदिवासी समुदाय को लेकर भारत का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है. प्रशासन इस तरह पेश आता है जैसे आदिवासियों का अस्तित्व ही न हो, यहां तक जहां वे रहते हैं वहां तक मीडिया की पहुंच को बाधित भी करने की कोशिश करता है.

सरकोपारी निवासी माडोबा कहते हैं, ''ये पहाड़ियां हमारी पहचान हैं.''

''यदि यहां खनन होता है तो नियमगिरी जंगल नष्ट हो जाएगा और हमारी हालत कुत्तों जैसी हो जाएगी.''

आदिवासी समुदाय को इस बात का विश्वास दिलाना कि उनके हित सुरक्षित रखे जाएंगे, शायद इस समस्या की कुंजी है.

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