कश्मीर की वादियों का 'भांड' दिल्ली में

  • 11 जनवरी 2014

42 साल के बशीर अहमद भगत जब तीसरी कक्षा में थे, तब से अपने बाप-दादा की तरह कश्मीरी लोकनाट्य 'भांड पाथेर' करते आए हैं.

भारत प्रशासित कश्मीर के अनंतनाग के एक गांव के बशीर तब दरगाह या शादी-ब्याह में अपना जौहर दिखाते थे, पर आज भारत के बड़े नाट्य महोत्सवों में शिरकत करते हैं.

वो कहते हैं, “हमारा हुनर बहुत अच्छा है. चरमपंथ की वजह से सब दब गए थे, अब मौक़ा भी मिल रहा है और प्रशिक्षण भी, तो हम इस स्तर का काम कर रहे हैं जो दुनिया को दिखाने लायक है. हम किसी भी प्रतियोगिता में अच्छी टक्कर दे सकते हैं.”

बशीर भारत रंग महोत्सव में बहुचर्चित अभिनेता और निर्देशक एम के रैना के नाटक ‘गोसाईं पाथेर’ में अभिनय कर रहे हैं. यह नाटक कश्मीर के अलग-अलग धर्म और शैव परंपराओं पर आधारित है.

पर बशीर का सफ़र बहुत मुश्किलों भरा रहा है, 1990 के दशक में 'भांड पाथेर' करने वाले उनके कई सहयोगियों को कहा गया कि उनका काम ‘मज़हब के ख़िलाफ़’ है.

बशीर बताते हैं, “हमें जान से मारने की धमकी दी जाती थी, तो किसी ने मज़दूरी की, लकड़ी का काम सीखा, चिनाई की, चटाई बनाई, हमारा दिल भांड पाथेर में ही था, पर वो कर नहीं पाते थे.”

राजनीति, समाज पर तंज़

एम के रैना बताते हैं कि 'भांड पाथेर' नाट्य कला का बहुत आलोचनात्मक रूप है, जिसमें कहानी कहते हुए व्यंग्य और तंज़ का इस्तेमाल कर समाज, राजनीति इत्यादि पर टिप्पणियां की जाती है.

'भांड पाथेर' की विलुप्त होती कला को एक नई दिशा देने के लिए रैना ने वित्तीय सहायता से 'कश्मीर भगत' नाम के थिएटर ग्रुप को दोबारा संजोया और भगत समुदाय के भांड कलाकारों को प्रशिक्षण दिया.

रैना कहते हैं, ''इनके सरोकार शहरी युवा से बिल्कुल अलग हैं. इसलिए इनके साथ 'भांड पाथेर' की कहानियों पर ही काम करना शुरू किया और फिर साथ-साथ आधुनिक कहानियां जैसे किंग लीयर को इनके परिप्रेक्ष्य में ढालकर बनाया.''

अब यह ग्रुप अपने नाटक दिल्ली, पुणे समेत कई बड़े शहरों में ले जा रहा है.

संसाधनों की कमी

भारत रंग महोत्सव में गोसांई पाथेर के अलावा 'भांड पाथेर' कला के ही दो और मंचन भी हो रहे हैं. कश्मीर में लोकनाट्य शैली 'भांड पाथेर' सदियों से चली आ रही है.

कश्मीर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. अज़ीज़ हजनी बताते हैं कि क़रीब 30 वर्ष पहले तक भांड कलाकार पेशेवर तरी़क़े से काम कर अपनी जीविका इसी से चलाते थे.

वे बताते हैं कि गांवों में भांड अपना काम दिखाते थे, तो लोग बदले में उन्हें शॉलें, कंबल, खेतों की उपज या खाने का सामान देते थे. अब दौर बदल गया है.

डॉ. अज़ीज़ के मुताबिक, ''समय के साथ इन कलाकारों को लगने लगा कि गांव-गांव जाकर ऐसे मंचन करना मानो हल्का काम है. साथ ही वादी में चरमपंथ का ऐसा माहौल बना कि खुले में नाटक कर पाना मुमकिन नहीं रहा.''

पिछले सालों में 'भांड पाथेर' को आधुनिक नाट्यकला से जोड़ने की तरफ़ कई लोगों ने काम किया, लेकिन अब भी संसाधनों की कमी बार-बार आड़े आती है.

डॉ. अज़ीज़ बताते हैं कि स्थानीय सरकारी संस्थान 'अकादमी फॉर आर्ट कल्चर एन्ड स्कॉलरशिप' के काम के अलावा भांड कलाकारों को सरकार ने कुछ स्कॉलरशिप्स ज़रूर दी हैं, पर यह सब नाकाफ़ी हैं. शहरों में भी थिएटर के सामने अभी बहुत चुनौतियां हैं.

‘द कंट्री विदाउट अ पोस्ट ऑफ़िस’

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण लेते हुए मुज़म्मिल हयात भवानी ने भारत प्रशासित कश्मीर की राजनीतिक और सामाजिक उथलपुथल पर ‘द कंट्री विदाउट अ पोस्ट ऑफ़िस’ नाम के नाटक का निर्देशन किया.

मुज़म्मिल अब श्रीनगर में एकता स्कूल ऑफ़ ड्रामा के साथ काम कर रहे हैं. यहां नाट्यकला का प्रशिक्षण भी दिया जाता है और नाटकों का मंचन करने के लिए ड्रामा ग्रुप भी है.

इस संस्थान की शुरुआत तो 1988 में हुई, लेकिन इसका काम भी चरमपंथ के दौर में रुक गया और अब साल 2004 से ही दोबारा शुरू हो पाया.

मुज़म्मिल कहते हैं, “कश्मीर में युवाओं को पता ही नहीं है कि थिएटर के ज़रिए क्या कहा जा सकता है, कैसे अपनी बात सामने रखी जा सकती है, न ही यहां वैसे प्रशिक्षण के संसाधन उपलब्ध हैं.”

श्रीनगर में नाटकों के मंचन के लिए एक ही ऑडिटोरियम है- टैगोर हॉल, लेकिन यह भी पिछले छह साल से मरम्मत के काम के चलते बंद है.

मुज़म्मिल बताते हैं कि कॉलेजों में काम करने की इच्छा से उन्होंने शिक्षा विभाग और कई प्राध्यापकों को चिट्ठियां लिखीं, पर बहुत प्रोत्साहित करने वाले जवाब नहीं मिले. इस वजह से वे कुछ ही कॉलेजों में अपना काम ले जा सके हैं.

एनएसडी छात्रों के साथ उन्होंने ‘द कंट्री विदाउट अ पोस्ट ऑफ़िस’ का निर्देशन किया था. अब उन्हें इंतज़ार है टैगोर हॉल के खुलने का, ताकि वे इस नाटक का श्रीनगर में भी मंचन कर सकें.

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