नामदेव ढसाल: 'विद्रोही परंपरा के सबसे बड़े कवि थे'

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मशहूर मराठी कवि नामदेव ढसाल सिर्फ़ महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर के एक नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और कवि थे. नामदेव ढसाल विद्रोही परंपरा के सबसे बड़े कवि थे.

वह उस वक़्त महाराष्ट्र में दलित साहित्य की आवाज़ बने जब दलित समाज अपना नेतृत्व खोज रहा था. दलित पैंथर आंदोलन के माध्यम से उन्होंने दलित समाज की तीन पीढ़ियों को जागृत करने का काम किया.

जातीय वर्चस्वाद के ख़िलाफ़ वह ज़िंदगी भर लड़ते रहे. दलित पैंथर के नेता के रूप में वह सामाजिक न्याय के लिए जीवन भर संघर्षरत रहे.

एक समतामूलक समाज की स्थापना की अपनी मुहिम में वह सभी वर्ग, समाज के लोगों को इकट्ठा करने में यक़ीन रखते थे.

वह अपने आप को सिर्फ़ दलितों का नेता मानने के बजाए एक विचारधारा का नेता मानते थे. उनके चाहने वाले और दोस्त सारी पार्टियों में हैं. उनकी लोकप्रियता महाराष्ट्र के बाहर भी काफ़ी थी.

मेरे पहले नाटक जुलुवा को देख कर वह रो पड़े थे. नाटक ख़त्म होने के बाद वह मुझसे मिले और कहा, ''जो कोशिश हम 30-35 सालों से कर रहे हैं उस कोशिश को तुम्हारे एक नाटक ने तीन-चार क़दम आगे बढ़ा दिया है''. उसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा.

उन्होंने मेरे सारे नाटक देखे. उनके साथ बहुत गहरा रिश्ता बन गया था. बाद में तो मैं उनके जीवन का हिस्सा बन गया था. वह देर रात तक कभी मेरे घर पर आ जाते थे और उनका एक अधिकार था मेरे ऊपर.

विद्रोही कवि

महाराष्ट्र के कवियों में सबसे विद्रोही कवि के रूप में नामदेव ढसाल को माना जाता है. साहित्य में जिस वक़्त समाज के सबसे वंचित तबक़े के लिए कोई स्थान नहीं था, उस वक़्त उन्होंने उस तबक़े की वेदना को साहित्य में जगह दी.

नामदेव ढसाल की रचनाओं में आप को दलित समस्याएं सिर्फ़ नारे के रूप में ही नहीं मिलेंगी. उन्होंने दलित साहित्य को कलात्मक पक्ष भी प्रदान किया. यह उनकी दलित आंदोलन के साथ-साथ साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है.

महाराष्ट्र में आधुनिक कवि के रूप में सबसे बड़ा नाम नारायण सु्र्वे का आता है और उनके बाद नामदेव ढसाल का नाम आता है. उन्होंने मराठी कविताओं का पूरा रंग-रूप ही बदल दिया था. उन्होंने कविता को अभिजात्य भाषा शैली से निकाल कर आम बोलचाल की भाषा में ढाल दिया.

उनका सबसे बड़ा योगदान कविता के क्षेत्र में था कि उन्होंने कविता को कविता ना रखकर संवाद का रूप दिया. धर्म और जाति की बेड़ियों से समाज को निकालने के लिए नामदेव बहुत चिंतित रहते थे. नामदेव के शुरुआती जीवन में कार्ल मार्क्स का उन पर प्रभाव था बाद में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का प्रभाव उन पर रहा.

पिछले कई सालों से मुंबई में वो अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव का आयोजन कर रहे थे जिसमें देश विदेश के साहित्यकार आते थे. मराठी कविताओँ के अलावा अन्य भाषाओं में भी उनका क़द काफ़ी ऊंचा था. उनकी कविताओं का अनुवाद 26 भाषाओं में हुआ था. हिंदी में भी वो काफ़ी लोकप्रिय थे.

उनके व्यक्तित्व की एक सबसे बड़ी ख़ूबी थी कि वो बहुत ही सहज स्वभाव के थे. उनके जाने के साथ ही हमने एक बहुत बड़ा नेतृत्व और बहुत बड़ा विद्रोह खो दिया है. मुझे नहीं लगता कि महाराष्ट्र में दोबारा कोई नामदेव ढसाल पैदा होंगे.

(रंगनाथ सिंह से बातचीत पर आधारित)

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