पीएम उम्मीदवारी के क्या हैं दाँव- पेंच?

अरविंद केजरीवाल, राहुल गाँधी, नरेंद्र मोदी

सूर्य उत्तरायण होता है तो पतंगें उड़ती हैं. किस्म-किस्म की. जिसका जितना मन हो, जितनी श्रद्धा हो, जितनी औकात हो, उड़ा ले.

वैसे पतंग कभी भी उड़ाई जा सकती है और उड़ाई जाती है लेकिन सूर्य मकर राशि में जाए तो लोगों को लगता है कि इस बार संक्रांति के साथ क्रांति भी हो जाएगी.

(दलितों को चाहिए 'एस्केप वेलॉसिटी')

आसमान से धुंध साफ़ होती है तो यह संभावना बनती है कि भ्रांति दूर होगी. चरखियों पर चढ़ी धूल साफ़ होगी. मांझे रगड़कर साफ़ किए जाएंगे और आमने-सामने के पेंच होंगे.

उसी में उम्मीद रहती है कि हरी, सफ़ेद, नीली, भगवा, तिरंगी, बहुरंगी कोई कट जाए.

सियासत की पतंगें इस दौरान ऊंचा उड़ती हैं. कुछ पेंच दूर के, कुछ पास के. कुछ विरोधियों के साथ, थोड़े अपनों से भी. अजब-ग़ज़ब पेंच.

ऐसा नज़ारा पिछले डेढ़ दशक में दो ही बार देखने को मिला है. तीसरी बार सब लांग कसे हुए हैं कि पुछट्टा निकल न जाए इस बार.

मोदी और केजरीवाल

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भारतीय जनता पार्टी वाले हड़बड़ी में थे इसलिए अंदरूनी पेंच छह महीने पहले ही हो लिए, उत्तरायण की प्रतीक्षा कौन करता है.

नरेंद्र मोदी मार्का पतंग हवा में ऊंचा लहराने लगी. अब वही अकेली पतंग थी तो वही दिखी सबको. मीडिया वाले कैमरा उसी पर टिकाए हुए थे.

('शायद मुझे भी मार दिया जाए')

दूसरे खेमे में पतंग और मांझा तो दूर लगता था कि सद्दी भी नहीं है. पतंग ख़ुद तैयार नहीं थी. बड़ा उहापोह. सब परेशान कि उड़ाएं तो क्या?

इसी बीच दिसंबर में केजरीवाल की पतंग उड़ी तो कैमरे उधर हो गए. मोदी मार्का पतंग उस अंधड़ में धकिया कर क़रीब-क़रीब किनारे हो गई.

दीगर सूबों की पतंगें और पेंच थे पर अपने-अपने इलाक़े तक महदूद. कोई पेंच इतना लंबा नहीं था कि सीधे लालक़िले पर कटान होती.

यानी कि ले-दे कर छोटे कनकौओं की भीड़ में बड़ी पतंगें तीन ही बचीं. दो उड़ रही थीं, तीसरी को उसके ख़ैरख़्वाह उड़ाने में लगे थे- चरखी मांझा लेकर. पर राहुल मार्का पर सवाल बना रहा और अब भी है.

राष्ट्रपति प्रणाली

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भाजपा वाले ताल ठोक रहे हैं, ललकार रहे हैं कांग्रेस वालों को कि तुम उड़ाओ अपनी, सीधे मुक़ाबले में आकर दिखाओ.

लेकिन कांग्रेसी एक चुक, हज़ार चुप. कुछ को लगता है कि उत्तरायण के तीसरे दिन पतंग उड़ेगी तो कुछ को लगता है कि सीधे पेंच कांग्रेस ने आज तक नहीं लड़ाए, अब क्या लड़ाएगी.

(मोदी और राहुल का विज़न)

सियासी समझ भी यही कहती है. जब अंगूठे और तर्जनी के हल्के से ख़म से उड़ान नियंत्रित की जा सकती हो तो पूरा हाथ निकालकर हवा में लहराने की क्या ज़रूरत.

और फिर यह खेल भी तो हो सकता है भारतीय जनता पार्टी का कि बात आमने-सामने हो जाए, कटान हो और लोग लूट ले जाएं सवा सौ साल पुरानी पतंग, क्योंकि उसका कटना तो सब कई साल पहले से तय माने बैठे हैं.

दरअसल इसका एक पहलू और है. जनभागीदारी वाले लोकतंत्र को व्यक्ति आधारित राष्ट्रपति प्रणाली वाले लोकतंत्र में बदलना, जो भाजपा एक अरसे से चाहती और मांग करती रही है.

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एक ओर नरेंद्र मोदी हैं, दूसरी ओर राहुल गांधी हैं तो बात मुद्दों से खिसककर व्यक्तियों पर केंद्रित हो जाए, तीसरा चेहरा केजरीवाल रहें तो रहें.

प्रधानमंत्री कौन

कांग्रेस का अधिवेशन दिल्ली में इसी 17 जनवरी को है जिसमें तय होनी है कांग्रेस की रणनीति. लेकिन एक दिन पहले हुई बैठक के बाद जनार्दन द्विवेदी ने राहुल को प्रधानमंत्री बनाए जाने की संभावना से इनकार किया लेकिन कहा कि चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा.

पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं की समस्या यह है कि वे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने की बात का सबब समझते हुए भी खुलकर विरोध नहीं कर सकते कि कहीं 10 नंबर में उनके नंबर न कट जाएं.

(राहुल और मोदी में फर्क?)

कुछ को शुबहा है कि राहुल गांधी आ भी जाते तो क्या होता? कहते हैं कि दूर का पेंच ही ठीक है.

जितना असर होना होगा नाम से हो जाएगा, चेहरे की ज़रूरत नहीं है क्योंकि अगर (और यह मामूली अगर नहीं है) कांग्रेस के दिन फिरे तो होगा वही जो सबको पता है. इसलिए 17 जनवरी ख़ामोशी से निकल जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए.

राहुल गांधी ने भी यही इशारा किया था. कहा है कि लोकतंत्र है और इस प्रणाली में "देश की जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से माध्यम से तय करेगी कि प्रधानमंत्री कौन होगा."

इसके बावजूद पतंगें उड़ें तो उड़ें. आख़िरकार सूर्य उत्तरायण हो गया है.

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