कहानी मौत के मुंह से ज़िंदगी को छीन लेने की

  • 21 जनवरी 2014
कश्मीर प्रिंसेस प्लेन में एम.सी दीक्षित सह-पायलट थे.

सीने तक लंबी सफेद दाढ़ी वाले एक इंसान ने 58 साल पहले मौत के मुंह से ज़िंदगी छीन ली थी.

ये व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि एमसी दीक्षित हैं जो एयर इंडिया के दुर्घटनाग्रस्त विमान 'कश्मीर प्रिंसेस' के तीन बचे हुए लोगों में एक हैं.

साल 1955 में 11 अप्रैल को दक्षिण चीन सागर के ऊपर विमान बम विस्फ़ोट के बाद सागर में गिर गया था और इसमें 16 लोग मारे गए.

चीन की आधिकारिक न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक़ 2004 में चीन ने 'कश्मीर प्रिन्सेस' से जुड़ी राजनयिक फ़ाइलों से गोपनीयता का पर्दा उठाया जिससे पता चला कि चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चोऊ एनलाइ ही इस हमले का निशाना थे.

लेकिन वे विमान पर नहीं चढ़े थे. उनकी यात्रा की योजना गुप्त रखी गई और वो 14 अप्रैल तक चीन में ही रहे.

कश्मीर प्रिंसेस प्लेन हादसा

कॉफ़ी की चुस्की लेते हुए एमसी दीक्षित को उस दौर तक पहुँचने में थोड़ा समय लगा. 97 साल की उम्र में भी दीक्षित की याददाश्त अच्छी है, वे काफ़ी सतर्क हैं और पायलट ट्रेनिंग के दौरान बताई गईं छोटी-छोटी बातें उन्हें आज भी याद हैं.

दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने के समय वो वकील थे. भारतीय वायुसेना में बतौर फ़ाइटर पायलट भर्ती हुए और 1947 में भारत को ब्रिटेन से आज़ादी मिलने पर उन्होंने एक निजी एयर लाइंस में नौकरी कर ली जो बाद में एयर इंडिया बनी. बांडूंग की उड़ान सह-पायलट के रूप में उनकी आख़िरी उड़ान थी. इसके बाद उन्हें कप्तान बनाया जाना था.

वो बताते हैं, "जहाँ तक मुझे याद है हमने 11 अप्रैल 1955 के हांगकांग से 0425 जीएमटी पर उड़ान भरी. हमें उड़ते हुए करीब पाँच घंटे हो चुके थे, 0925 जीएमटी पर हमें विस्फ़ोट की आवाज़ सुनाई दी. जब तक हमें पता चलता कि क्या हुआ है तीसरे नंबर के इंज़न के पीछे लगी आग का धुआं केबिन में पहुंचने लगा."

उन्होंने आगे कहा, "हमने तीन आपातकालीन संदेश भेजकर नतूना द्वीप के ऊपर अपनी मौजूदगी का पता बता दिया और पाया कि रेडियो बंद हो चुका था."

"कुछ और नहीं मांगूंगा"

मैं ख़ुद को ये पूछने से नहीं रोक पाई कि उस समय उनकी मनःस्थिति कैसी थी.

उन्होंने कहा, "नहीं, उस समय दिमाग सोचता नहीं है."

उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा, "हाँ, मैंने सांस रोक रखी थी और मुझे लगा कि सतह तक पहुँचने के लिए मुझे इसे रोक कर रखना होगा. अगर ऐसा नहीं किया तो मौत निश्चित है और तब मैंने प्रार्थना शुरू की पूरी आस्था के साथ."

कश्मीर प्रिंसेस प्लेन में 1955 में दक्षिण चीन सागर के ऊपर विस्फ़ोट हो गया था.

उन्होंने बताया, "मैंने ईश्वर से कहा कि बस इस बार सतह पर पहुँचने तक मुझे सांस रोक कर रखने दो. मैंने वादा किया कि मैं जि़न्दगी में कुछ और नहीं मांगूंगा. ऐसा लगा कि सतह का रास्ता कभी खत्म नहीं होगा पर मैं वहाँ तक पहुंच ही गया."

मछुआरों का शुक्रिया

उन्होंने कहा, "मुझे ग्राउंड मैनटेनेंस इंज़ीनियर अनन्त कारनिक और एक नैवीगेटर जगदीश पाठक थोड़ी दूर पर तैरते दिखे. हम 12 घंटे तक लगातार तैरते रहे. अच्छी बात ये थी कि पानी ज़्यादा ठंडा नहीं था. लेकिन सुबह तक हम थक चुके थे और ये चमत्कार ही था कि सुबह होते ही हमें ज़मीन दिखाई देने लगी. हमें लगा अब हम सुरक्षित हैं."

कुछ इंडोनेशियाई मछुआरों की उन पर नज़र पड़ी, जिन्होंने उन्हें बचाया और खाना, पानी और कपड़े दिए. उन्होंने ही करीब मौजूद एक जहाज़ को संदेश भेजा.

उन्होंने कहा,"आख़िरकार एक ब्रिटिश फ्रिगेट ने हमें वहाँ से निकाला और हांगकांग ले गया जहाँ से हमें सिंगापुर के अस्पताल में भेजा गया. इसके बाद हमारे परिवार वालों को हमारे बचने की जानकारी दी गई."

"पापा खिलौने लेकर लौटेंगे"

तो परिवार की क्या प्रतिक्रिया थी? मैं ये जानने को उत्सुक थी.

दीक्षित मुस्कुराए, ‘‘जब हमारे परिवार को दुर्घटना की जानकारी दी गई तो दो लोग थे जिनको ये विश्वास था कि मेरी मृत्यु नहीं हुई है. एक तो मेरा बेटा था जिसने कहा कि मेरे पापा ने वादा किया था कि वो खिलौने लेकर लौटेंगे और वो झूठ नहीं बोलते. और दूसरे मेरे दादा, जो बहुत अच्छे ज्योतिषी थे. उनकी गणना के मुताबिक़ मेरी उम्र बहुत लंबी थी. तो जब उन्हें पता लगा कि मैं ज़िंदा हूँ तो दादा जी बोले, मैंने पहले ही कहा था.’’

दीक्षित ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा कोई माँग पूरी करने की इच्छा पर कहा, "मैं उन इंडोनेशियाई मछुआरों को धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन्होंने खुले दिल से हमारी मदद की. नेहरू ने इंडोनेशिया में भारतीय दूतावास को आदेश दिया कि वो सरकार की ओर से इंडोनेशियाई मछुआरों का सम्मान करे."

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एमसी दीक्षित की माँग पर इंडोनेशियाई मछुआरों को सम्मानित करने का आदेश दिया.

मैं उनके सामने बैठी हैरानी से पूरी कहानी सुन रही थी. मैंने उनसे पूछा कि क्या उस घटना ने उनके जीवन पर कोई प्रभाव डाला?

वो कहते हैं, “मेरा संबंध एक धार्मिक परिवार से है और ईश्वर में हमेश मेरा विश्वास रहा है. इस घटना ने मेरे विश्वास और मज़बूत कर दिया. इसके बाद ईश्वर से मैंने कुछ नहीं मांगा. मुझे उससे अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा तोहफ़ा मिला –मेरी जिंदगी वापस मिली.”

वो कहते हैं, “आज मैं लगभग 97 वर्ष का हूं, लेकिन मेरे जीवन में ऐसा कुछ नहीं है जो मैं बदलना चाहूं. मेरे लिए ये बेहतरीन तोहफ़ा है जो मुझे मिला.”

उस दिन विदा लेते वक़्त मैं भी उनके विश्वास और उनकी आस्था का एक अंश लेकर लौटी.

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