दो देशों से सम्मान तीन जगह से डॉक्ट्रेट

सैयदना बुरहानुद्दीन इमेज कॉपीरइट AFP

दाऊदी बोहरा समुदाय के धर्मगुरु डॉक्टर सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन बोहरा समाज के 52वें धर्मगुरु थे और वे इस पद पर सबसे ज़्यादा समय तक रहने वाले एकमात्र धर्मगुरु थे.

डॉक्टर बुरहानुद्दीन 1961 में अपने पिता के मृत्यु के बाद धर्मगुरु बने थे. डॉक्टर सैयदना ने दुनिया भर में फैले बोहरा समाज के लोगों को साथ लाने का काम किया और समाज उत्थान की दिशा में कदम उठाए.

सैयदना को जॉर्डन सरकार की तरफ़ से सर्वोच्च सम्मान स्टार ऑफ़ जॉर्डन और मिस्र सरकार की तरफ़ से ऑर्डर ऑफ़ द नाइल के ख़िताब से नवाज़ा गया था. सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें काहिरा के अल अज़हर विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और कराची विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की मानद उपाधियां दी थीं.

पूरी दुनिया में फैले दस लाख बोहरा लोगों पर उनका असर था. उन्हें ‘अका मौला’ भी कहा जाता था. अपने मानने वालों के लिये डॉक्टर सैयदना देवदूत से कम नहीं माने जाते थे. उनके व्यक्तित्व के कई आयाम थे. वे ऐसे धर्मगुरु थे, जो परंपरागत धर्मज्ञान को बदलते समाज के मुताबिक़ और बिना उसका मूल अर्थ बदले लोगों को समझाते थे.

बोहरा समाज की प्रथा के मुताबिक़ हर किसी को संप्रदाय से जुड़ाव की शपथ लेनी होती है, जिसे ‘मिसाक’ कहा जाता है. इसी शपथ की वजह से दुनिया भर में बोहरा समाज एक परिवार की तरह हो चुका है.

सामाजिक योगदान

Image caption सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन का मुंबई में निधन हो गया.

अपने 53 साल के कार्यकाल में डॉक्टर सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन ने कई सामाजिक संस्थाओं को जन्म दिया. मुंबई के मरीन लाइंस में बना अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस सैफ़ी अस्पताल इसकी मिसाल है. सैफ़ी बुरहानी अपलिफ़्टमेंट ट्रस्ट की नींव भी डॉक्टर सैयदना ने ही डाली थी.

सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन ने अपने कार्यकाल में अल जमीयतुस सैफ़िया अरबी अकादमी के कामकाज की भी देखरेख की जहां बोहरा पुरुषों और महिलाओं के लिए धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के साथ साथ आधुनिक शिक्षा पर ज़ोर दिया जाता है.

उन्होंने बोहरा छात्रों को भारत में छात्रवृत्ति देना भी शुरू किया और इसके लिए मुंबई में एक ट्रस्ट की स्थापना की.

समाज को ऊपर उठाने में व्यापार का कितना महत्व है, इस बात को सैयदना ने काफ़ी समय पहले ही समझ लिया था. उनके कार्यकाल में बोहरा समाज ने कारोबारी दुनिया में अपना मुकाम बनाया. इस्लाम में ब्याज लेना-देना हराम माना जाता है, इस वजह से डॉक्टर सैयदना ने कारोबार के लिए एक ख़ास कोष खड़ा किया, जिसके ज़रिए बोहरा समाज के लोगों को व्यापार शुरू करने के लिये बिना ब्याज के कर्ज़ दिया जाता है.

आधुनिक शिक्षा

Image caption सैयदना बुरहानुद्दीन ने कई शैक्षणिक और सामाजिक संस्थाओं की नींव डाली.

उन्होंने कई ऐसे कारोबारी केंद्र बनाए, जिनके ज़रिए शैक्षणिक संस्थाओं, अस्पतालों और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए काम शुरू किया गया.

उनकी कोशिश रही कि बोहरा समाज धर्म के प्रति निष्ठावान तो रहे मगर इसमें किसी चरमपंथ को जगह नहीं थी. नतीजा यह हुआ कि बोहरा समाज महाराष्ट्र ही नहीं देश भर में व्यापार में काफ़ी आगे माना जाता है.

डॉक्टर सैयदना मोहम्मद बुरहानउद्दीन का एक योगदान प्राचीन स्थानों के संवर्धन के लिए भी था. दुनिया भर में कई पुराने धर्मस्थलों का पुनर्निर्माण बोहरा समुदाय की तरफ़ से कराया गया. इनमें काहिरा की अल अनवर मस्जिद भी शामिल है.

सैयदना बुरहानुद्दीन ने कई इस्लामी प्रोजेक्ट्स की भी शुरुआत की. इनमें मिस्र की अक़मार मस्जिद, लुलुआ मस्जिद और जूयूशी मस्जिद शामिल हैं. इसके अलावा फ़ातिमी काल की कई मस्जिदों के पुनर्निर्माण का काम उन्होंने शुरू कराया.

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