मुलायम को कितना भारी पड़ेगा मुज़फ़्फ़रनगर न जाना

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Image caption मुलायम सिंह के मुज़फ़्फ़रनगर न जाने पर उठे सवाल

पिछले साल हुए मुज़फ़्फ़रनगर दंगे और उनके पीड़ितों की दास्ताँ आहिस्ता-आहिस्ता इतिहास बन रही है.

लेकिन एक सवाल जो अब तक अनुत्तरित है वह यह है कि मुसलमानों के हितैषी माने जाने वाले 'मौलाना' मुलायम सिंह यादव दंगाग्रस्त क्षेत्रों में एक बार भी क्यों नहीं गए. शायद उनके वहाँ जाने से पीड़ितों को कुछ राहत मिलती और बदले में मुलायम को उनका साथ.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मुज़फ़्फ़रनगर जाने की बजाय मुलायम सिंह यादव ने अपने गाँव सैफई में बॉलीवुड के सितारों का रंगारंग कार्यक्रम आयोजित करवाया.

मुलायम सिंह यादव ने दंगा के पीछे एक ‘साज़िश’ की ओर इशारा करते हुए दंगा पीड़ितों को राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता कहा, दंगा पीड़ित नहीं.

उसके बाद ज़बरदस्त सर्दी में अखिलेश यादव सरकार ने राहत शिविरों को हटाने का आदेश दिया जिसकी भारी आलोचना भी हुई. लेकिन ऐसा लगा नहीं कि यादव परिवार को इस आलोचना से कोई बहुत फ़र्क़ पड़ा था.

मुलायम का 'डर'

इस सारी पृष्ठभूमि में एक सवाल जो बरबस ही लोग पूछ रहे हैं, वो ये कि मुज़फ़्फ़रनगर के मुसलामानों के दुख में साथ न देने के मुलायम सिंह यादव के रुख़ की क्या वजह हो सकती है?

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Image caption सैफ़ई महोत्सव को लेकर अखिलेश सरकार को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी

इस सवाल पर सुन्नी समुदाय के एक बड़े धार्मिक नेता मौलाना ख़ालिद रशीद फिरंगीमहली उत्तर प्रदेश के सरकारी बयान को दोहराते हैं. "नहीं, अखिलेश दो बार गए थे."

जब उनसे यह कहा गया कि मुसलमानों के हितैषी अखिलेश नहीं, मुलायम माने जाते रहे हैं तो वे दबे स्वर में बोले, "हां, यह तो है."

यदि मौलाना ख़ालिद रशीद की मानें तो अखिलेश यादव की सरकार ने दंगा-पीड़ित मुसलमानों को बहुत अधिक मुआवज़ा दिया है. उनकी बात से लगा कि वहां अब नाराज़गी नहीं है.

मौलाना के इस कथन से तो ऐसा लगता है कि मुलायम मुज़फ्फ़रनगर के लोगों के वोट के प्रति आश्वस्त हैं और इसीलिए उन्होंने मुज़फ़्फ़रनगर जाना ज़रूरी नहीं समझा.

लेकिन यहां यह कहना आवश्यक है कि मुज़फ़्फ़रनगर और उसके आस-पास के आठ ज़िलों में लगभग 33 प्रतिशत मुसलमान हैं और साल 2012 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र की 77 सीटों में 26 मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीती थीं.

लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष रहे प्रोफेसर एसके द्विवेदी मुलायम सिंह यादव के इस फ़ैसले की वजह एक डर को बताते हैं. वो कहते हैं कि मुलायम सिंह को भय था कि उनके ख़िलाफ़ वहाँ उग्र प्रदर्शन हो सकते थे इसलिए उन्होंने वहां जाना उचित नहीं समझा होगा.

चुनावी गणित

पश्चिम उत्तर प्रदेश में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अजित सिंह और मुलायम सिंह यादव, दोनों ने ही ख़ुद को उनकी राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी बताया है. हालांकि चौधरी चरण सिंह जाट और मुसलमानों के बीच सौहार्द को प्रमुखता देते थे तो वहीं मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम वोट को तरजीह दी.

लेकिन साल 2009 में अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटों की ख़ातिर मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया था.

Image caption अब भी कई पीड़ित अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं

मुलायम सिंह यादव को इस संबंध से कोई फ़ायदा तो नहीं हुआ लेकिन कयास लगाया जा रहा है कि इस बार मुलायम सिंह यादव पश्चिम उत्तर प्रदेश में हिंदू जाट वोटों की ख़ातिर मुस्लिम वोटों को दांव पर लगाने को तैयार हैं.

वे यह दिखाना चाहते हैं कि चरण सिंह की तरह उन्हें हिन्दू और मुसलमान, दोनों का समर्थन प्राप्त है. साथ ही उन्हें संभवतः यह उम्मीद भी है कि मुस्लिम वोटर उनको पूरी तरह नहीं नकारेंगे.

मुलायम को न सिर्फ़ नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की चिंता है बल्कि अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल का भी डर है. उन्हें इस बात का भी आभास है कि उनके पुत्र अखिलेश की सरकार की छवि नाज़ुक है और लोकसभा चुनाव में उनका यूपी से 35 सीट लाने का सपना तो पूरा होने से रहा.

फिर भी उनका प्रयास रहेगा कि किसी तरह से उनके दल को साल 2009 की तुलना में इस बार कुछ अधिक सीट मिलें ताकि केंद्र की राजनीति में वे कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें. उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मुलायम को कुछ खोकर कुछ पाने में कोई ऐतराज़ नहीं होगा.

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