15 मुजरिमों की मौत की सज़ा उम्र क़ैद में बदली

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सुप्रीम कोर्ट ने 15 दोषियों की मौत की सज़ा को उम्र क़ैद में बदलने का आदेश दिया है. इनकी दया याचिकाओं के मामले राष्ट्रपति के सामने बहुत समय से लंबित पड़े हुए थे.

जिन दोषियों को इस आदेश से राहत मिलेगी उनमें चंदन तस्कर वीरप्पन के चार साथी शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाओं के निपटारे में हुई लंबी देरी उन्हें राहत दिए जाने का पर्याप्त आधार है. कोर्ट ने मानसिक रोग से ग्रस्त होने और जेल में दोषी को एकांत में रखने को भी राहत दिए जाने का आधार माना है.

सर्वोच्च न्यायलय के तीन जजों की पीठ की अध्यक्षता करते हुए मुख्य न्यायधीश पी सदाशिवम ने आदेश में कहा, "मामला निपटाने में देरी होना मौत की सज़ा को उम्र क़ैद में बदलने का आधार बन सकता है."

कोर्ट ने आदेश दिया है कि यदि मौत की सज़ा सुनाए गए मुजरिम की दया याचिका गवर्नर या राष्ट्रपति खारिज करते हैं तो उसके परिवार के सदस्यों को जानकारी देना अनिवार्य होगा और ऐसा होने के 14 दिन के भीतर फांसी देना भी ज़रूरी होगा.

ग़ौरतलब है कि वर्ष 2004 से 2012 तक भारत में किसी मुजरिम को फ़ांसी नहीं दी गई थी. लेकिन नवंबर 2012 में मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब और फिर फ़रवरी 2013 में संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु को फांसी दी गई थी.

माना जा रहा है कि इस फ़ैसले से राजीव गांधी के हत्यारों और देविंदर सिंह भुल्लर की सज़ा भी घट सकती है.

राहत

वीरप्पन के चारों साथियों को 1993 में कर्नाटक के पोलार में बारूंदी सुरंग के विस्फोट में 22 पुलिसकर्मियों और अन्य लोगों की मौत का दोषी पाए जाने के लिए फ़ांसी की सजा सुनाई गई थी. उन्हें इस फ़ैसले से राहत मिलेगी.

ताज़ा फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने ये भी आदेश दिया कि जिस भी व्यक्ति को मौत की सज़ा सुनाई जाती है, उसे सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना मामला लाने का अधिकार होगा. कई हत्याओं के दोषी या फिर आतंकवाद संबंधी मामलों के दोषियों को भी ये अधिकार होगा.

इस बीच वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, "ये पहली बार हुआ कि इतने सारे मृत्युदंडों को बदल दिया गया है. ये एक ऐतिहासिक दिन है."

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