दिल्ली पुलिस: राज्य सरकार को नियंत्रण देना कितना कठिन?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पहले दिल्ली पुलिस के तीन-चार कर्मचारियों पर कार्रवाई की मांग के साथ बैठे थे. लेकिन धरना के दूसरे दिन उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई अब दिल्ली पुलिस पर अधिकार से जुड़ी है.

दिल्ली के उपराज्यपाल ने जब दो अधिकारियों को छुट्टी पर भेजा और मुख्यमंत्री से बात की तब जाकर केजरीवाल ने धरना बंद करते हुए कहा कि अभी आंशिक कामयाबी मिली है और दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के अधीन किए जाने की मांग के साथ उनकी लड़ाई जारी रहेगी.

दिल्ली पुलिस फिलहाल गृह मंत्रालय के अधीन है.

दूसरे राज्यों पर पुलिस और प्रशासन की व्यवस्था राज्य सरकार के अधीन होती है. लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं होने के चलते दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन है.

कानून बदलना होगा

संविधान के 69वें संशोधन विधेयक के जरिए दिसंबर, 1991 में दिल्ली को आंशिक राज्य का दर्जा तो दिया गया था, लेकिन संविधान के सातवें अनुच्छेद की धारा 1, 2 और 18 के तहत राज्य सरकार को मिलने वाले प्रशासन, पुलिस और जमीन के अधिकार को केंद्र सरकार ने अपने ही ज़िम्मे रखा था.

वर्ष 2003 में दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने की कोशिश हुई. तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने संसद में संशोधन प्रस्ताव रखा. इस संशोधन प्रस्ताव में पुलिस और क़ानून व्यवस्था केंद्र सरकार के अधीन रखने की बात थी. लेकिन संसद का कार्यकाल समाप्त होने के कारण ये विधेयक अपने आप भी रद्द हो गया.

अभी मौजूदा स्थिति ये है कि अगर किसी मुद्दे पर पुलिस और प्रशासन की व्यवस्था में अफरा तफरी का माहौल बनता है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री बस कार्रवाई की मांग कर सकते हैं.

ऐसे में दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के अधीन तभी किया जा सकता है जब इससे संबंधित प्रस्ताव भारतीय संसद से पारित हो.

मौजूदा प्रावधानों के मुताबिक दिल्ली पुलिस स्थानीय विधायकों और दिल्ली सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं है. केजरीवाल से पहले भी राज्य की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित भी दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन किए जाने की मांग करती रही थीं.

करीब 1.7 करोड़ की आबादी के लोगों को संभालने और उनकी समस्याओं के निदान के लिए पुलिस व्यवस्था को राज्य सरकार के तहत किया जाना अधिक तर्कसंगत लगता है.

अरविंद केजरीवाल के प्रस्ताव के मुताबिक पुलिस को नई दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) और दिल्ली कैंट के इलाके को केंद्र में रखने का प्रस्ताव दिया है और बाकी के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को दिल्ली सरकार के अधीन. शीला दीक्षित ने भी केंद्र के सामने ऐसा ही प्रस्ताव रखा था.

बजट की समस्या

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लेकिन नई दिल्ली में तमाम वीआईपी लोग रहते हैं. उनकी सुरक्षा और देश की सुरक्षा का हवाला देते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय दिल्ली पुलिस को अपने अधिकार से मुक्त करने के पक्ष में नहीं हैं.

वैसे दिल्ली पुलिस के दो-दो पावर सेंटर होने से अलग तरह की मुश्किलें पैदा हो सकती हैं.

बहरहाल, दिल्ली पुलिस दुनिया की सबसे बड़ी मेट्रो पॉलिटिन पुलिस तंत्र है. जिसकी क्षमता 80 हज़ार पुलिस कर्मियों की है. दिल्ली के अंदर करीब 149 पुलिस स्टेशन मौजूद हैं. लेकिन यह सब गृह मंत्रालय के अधीन काम करते हैं.

ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या दिल्ली सरकार इतने बड़े पुलिस अमले को संभाल पाएगी?

इसके अलावा एक बड़ा मुद्दा दिल्ली पुलिस का सालाना बजट है. 2013-2014 के सालाना वित्तीय साल के दौरान केंद्र सरकार ने दिल्ली को 4,455.21 करोड़ रुपए का अनुदान दिया था. ऐसे में दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी राज्य सरकार के अधीन करना कोई आसान चुनौती नहीं होगी.

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