क्या तलवार की धार पर चल रही है 'आप'?

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आम आदमी पार्टी की तरह सत्ता और शोहरत की मंज़िलें इतने कम समय में तय करने का उदाहरण भारतीय राजनीति में कम ही देखने को मिलता है.

विवादों में घिरे रहने और पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के दिल्ली पुलिस के ख़िलाफ़ धरने के बावजूद पार्टी के सदस्यता का अभियान गति पकड़ता जा रहा है.

पार्टी ने बृहस्पतिवार को गर्व के साथ ऐलान किया कि इसकी सदस्यता 50 लाख पहुंच गई है. संख्या तेज़ी से बढ़ने का एक और कारण है मुफ्त मेम्बरशिप अभियान, जो 26 जनवरी को ख़त्म हो रहा है.

ये सफलता काफी सराहनीय है क्योंकि पार्टी को बने हुए एक साल से थोड़ा ही अधिक समय हुआ है. लेकिन कुछ लोगों का तर्क ये है कि पार्टी की जो सबसे बड़ी उपलब्धि है, वही उसकी सब से बड़ी कमज़ोरी भी है.

कोई पड़ताल नहीं

पार्टी का सदस्य बनना काफी आसान है. और कोई भी इसका सदस्य बन सकता है.

पार्टी की ऑनलाइन साइट पर जाकर, या फिर तीन ख़ास लैंडलाइन नंबरों पर फोन करके या मोबाइल फ़ोन पर एसएमएस करके या देश भर में 'आप' के दफ्तरों के आगे लाइन लगा कर, जिसमें सुविधा हो पार्टी का सदस्य बना जा सकता है.

लेकिन इस बात का डर है कि अपराधियों से लेकर हर वो आदमी पार्टी का सदस्य बन सकता जो विवादास्पद है. 'आप' की विरोधी पार्टियां भी अपने लोगों को पार्टी में शामिल करा सकती हैं ताकि पार्टी के अंदर अराजकता फैला सकें. नई पार्टी के लिए ये सब चीज़ें एक गम्भीर समस्या पैदा कर सकती हैं.

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विपुल डे जो खुद पार्टी के एक कार्यकर्ता हैं और जो शुरू से पार्टी में हैं, स्वीकार करते हैं कि यह उनके लिए एक समस्या है.

वह यह भी मानते हैं कि सदस्यता की मुहिम आम आदमी के लिए है इसलिए हर कोई पार्टी से जुड़ सकता है. नए सदस्यों के डिटेल्स की छानबीन करने का उनके पास कोई विकल्प नहीं है.

वह कहते हैं, "हमें चार महीने बाद ही समझ में आएगा कि हमारे असली सदस्य कितने हैं. अभी जुड़ने वाले सदस्य अगर चार महीने तक बने रहे तो उन्हें असली सदस्य माना जाएगा और उन्हें सक्रिय सदस्य कहा जाएगा."

लेकिन निष्पक्षता से देखें तो भाजपा भी ऑनलाइन सदस्यता का अभियान चला रही है जिसकी छानबीन नहीं की जाती है. लेकिन भाजपा पुरानी पार्टी है और इसके स्तम्भ मज़बूत हैं और अनुभव काफी है. कांग्रेस का सदस्य बनना कठिन है क्योंकि उनके तरीके अलग हैं.

अनुशासन की कमी

'आप' सियासत में एक नयी पार्टी तो है ही साथ ही संस्था चलाने का इसके पास अनुभव भी नहीं है.

इस सिलसिले में पार्टी का दृष्टिकोण यह है कि 'आप' एक लहर है, एक आंदोलन है, जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है.

पार्टी के लगभग सभी कार्यकर्ता स्वयंसेवक हैं और अपनी नौकरियां त्याग कर मुफ्त में पार्टी के लिए काम कर रहे हैं.

विपुल डे कहते हैं वह और उनके साथी पार्टी बनने से पहले से ही अपनी नौकरियां छोड़ कर पार्टी के साथ जुड़ गए थे. सवाल ये है कि स्वयंसेवक कब तक पार्टी के लिए मुफ्त काम करते रहेंगे?

एक राजनीतिक दल चलाने के लिए वेतन पर काम करने वाले पेशेवर और अनुभवी लोगों की भी एक टीम होनी चाहिए जो 'आप' के पास नहीं है.

कई राजनीतिक प्रेक्षकों का ये तर्क है कि 'आप' के पास संगठनात्मक संरचना नहीं है. दूसरी तरफ पार्टी के नेता एक आवाज़ में नहीं बोलते हैं, जो चाहे कुछ भी बयान दे देता है.

पार्टी के एक विधानसभा के सदस्य पहले ही बग़ावत कर चुके हैं. पार्टी में अनुशासन की कमी साफ़ नज़र आती है.

तो हो सकता है कि पार्टी को बाहर के अपने प्रतिद्वंद्वियों से उतना ख़तरा न हो जितना उसे अपने आंतरिक विरोधाभासों से है.

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