देश में ही अप्रवासीः ईंट-सीमेंट से सील किस्मत

  • 25 जनवरी 2014
अप्रवासी मज़दूर Image copyright B JAYASHREE

भारत में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो अपने ही देश में अप्रवासी जैसे हो गए हैं. और इन लोगों के पास जीवन की बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है.

चेन्नई की एक कंस्ट्रक्शन साइट (वह जगह जहां निर्माण कार्य चल रहा हो) में ईंटों, पत्थरों और मशीनों के शोर के बीच मद्धम रोशनी वाला एक कमरा है. इसमें कोई दर्जन भर दूसरे बच्चों के साथ बैठी 10 साल की नंदिनी हिचकते हुए स्लेट पर कुछ लिख रही है.

नंदिनी चार अलग-अलग कंस्ट्रक्शन कंपनियों की साइट के नाम बताती हैं- जो पिछले कुछ सालों से उनका घर है. अगर आप उसके गृह ज़िले के बारे में पूछते हैं तो वह उसे याद नहीं. उसकी दुनिया कंस्ट्रक्शन साइट्स के अंदर ही है.

नंदिनी उन हज़ारों बच्चों में से है जो अपने मां-बाप के काम की तलाश में दूसरे राज्य में आने के चलते अपने घरों से दूर हो गए हैं. सामान्यतः इनके पास कोई स्थायी पता या सामाजिक सुरक्षा नहीं होती.

एक एनजीओ एड-एट-एक्शन की मदद से कंस्ट्रक्शन साइट में एक कामचलाऊ स्कूल चलाया जाता है ताकि बच्चों को कुछ शिक्षा मिल सके. लेकिन ज़्यादातर कंस्ट्रक्शन साइट्स में अप्रवासी बच्चों को ऐसी सुविधा या तो बहुत कम मिलती है या बिल्कुल नहीं.

कोई फ़ायदा नहीं मिलता

इस अस्थायी स्कूल में शिक्षिका सुब्बलक्ष्मी बताती हैं कि नंदिनी ओडिशा से है. उसके गांव से कुछ और लोगों के साथ उसका परिवार भी रोज़गार की तलाश में गांव से बाहर निकल आया.

सुब्बलक्ष्मी कहती हैं, "हम पूरी कोशिश करते हैं कि कुछ शिक्षा उनकी मातृभाषा में दी जाए. हालांकि हम हिंदी, तमिल और तेलुगू तो सिखा सकते हैं लेकिन ओडिया नहीं. इसलिए हम इनमें से उन्हें अपनी पसंद की कोई भी भाषा सीखने देते हैं."

नंदिनी और आस-पास के बच्चे अब तमिल में लिखना सीख रहे हैं. हालांकि अप्रवासी बच्चों के लिए कुछ भी न मिलने के बजाय यह मिलना बेहतर ही है.

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समाज विज्ञानियों का कहना है कि अंतर-राज्यीय स्थानांतरण पिछले कुछ सालों में देश के सामने उठे मुद्दों में सबसे जटिल है. इस समस्या की गंभीरता को दिखाने वाला कोई ठोस आंकड़ा भी नहीं है. अनुमान है कि उत्तर भारत से तमिलनाडु आने वाले प्रवासी मज़दूरों की संख्या 50 लाख तक हो सकती है.

समाज विज्ञानी डॉक्टर बर्नार्ड डि-सामी 'अरुणोदय अप्रवासी अभियान' के सह-संयोजक हैं. वह कहते हैं, "कोई संख्या नहीं, कोई पहचान नहीं, कोई अधिकार नहीं – यह चलन बहुत नाटकीय ढंग से बढ़ा है."

वे कहते हैं, "स्थानांतरण का तरीका बहुत तेज़ी से बदल रहा है और मौजूदा क़ानूनी प्रावधान इस समस्या से निपटने के लिए नाकाफ़ी हैं."

ओडिशा की ही मूल निवासी अमारा भी ग़रीबी की वजह से अपने पति और दो बच्चों के साथ चेन्नई आ गईं. वह अपने घर के बारे में बताती हैं, "वहां कोई बस नहीं है, कोई सुविधा नहीं है. एक दोस्त ने हमें यहां के बारे में बताया और अब मैं यहां करीब 200 रुपये रोज़ तक कमा लेती हूं."

यह उस रकम की आधी है, जो उन्हें बहुमंजिला अपार्टमेंट कॉम्पलेक्स में काम के एवज में, आधिकारिक रूप से मिलनी चाहिए. उनके पास कोई पहचान पत्र नहीं है और इसलिए उन्हें किसी भी सरकारी योजना का कोई फ़ायदा नहीं मिल पाता.

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Image caption देश में अप्रवासी मज़दूरों के सही-सही आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं.

फिर भी घर से बेहतर

जब कोई परिवार एक जगह से दूसरी जगह जाता है तो बच्चे भी साथ ही जाते हैं. यूनेस्को की साल 2013 की एक रिपोर्ट के अनुसार अप्रवासियों में 15% बच्चे होते हैं. तमिलनाडु स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग ने अप्रवासी बच्चों को संक्रमण से बचाने और शिक्षा देने की कोशिश की है.

लेकिन सुब्बलक्ष्मी कहती हैं, "स्कूल शिक्षा विभाग की कोशिशें नाकाफ़ी हैं. वह बच्चों को नियमित स्कूलों में दाखिला दिलवाने की कोशिश करते भी हैं, लेकिन परिजन बच्चों को कंस्ट्रक्शन साइट से दूर नहीं भेजना चाहते."

वे कहती हैं, "क्योंकि यह कर्मचारी हर कुछ महीने में काम के लिए जगह-जगह जाते रहते हैं इसलिए बच्चों को असली शिक्षा नहीं मिल पाती. हम यहां जो करते हैं वह सबसे अच्छा अस्थायी प्रबंध है."

एनजीओ एड-एट-एक्शन द्वारा चेन्नई में निर्माण क्षेत्र और ईंट-भट्टा मज़दूरों के बीच किए गए एक हालिया शोध में पता चला कि 60% लड़कियां और 40% लड़के कभी स्कूल नहीं गए हैं.

करीब 70% अप्रवासी मज़दूर उड़ीसा के हैं और बहुत गरीबी में जी रहे हैं.

शोध में इन अप्रवासी परिवारों की स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच के बारे में बताया गया है कि 12% से ज़्यादा अप्रवासी बच्चों को पल्स पोलियो की खुराक नहीं मिली है और गर्भवती महिलाओं की एक बार भी स्वास्थ्य जांच नहीं हुई है.

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यह स्थिति इस तथ्य के बावजूद है कि देश में सबसे बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं देने वाले राज्यों में से तमिलनाडु एक है.

नंदिनी की बहन की 16 साल की उम्र में शादी हो गई थी और अब वह एक कंस्ट्रक्शन साइट में अपने पति के साथ रहती हैं.

ज़्यादातर बच्चे भी आखिरकार मज़दूर ही बनते हैं. इसके बावजूद नंदिनी अपने घर के मुकाबले यहां ख़ुश है. वह कहती है, "यहां हमारे पास एक टीवी है, वहां घर में हमारे पास कुछ नहीं था."

देश में ग़रीबी ने परिवारों को अपने समाज से दूर कर दिया है, अपनी जड़ों से उखाड़ दिया है. इसलिए बच्चों को ज़रा भी याद नहीं रह पाता कि वह हैं कहां के. ऐसा लगता है कि अप्रवासी मज़दूरों की किस्मत को ईंट और गारे से सील कर दिया गया है.

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