पथरीबल मुठभेड़: 'अब ऊपर वाले की अदालत है'

  • 24 जनवरी 2014
ज़हूर अहमद,
Image caption ज़हूर अहमद समेत पांच लोगों को चरमपंथी बताकर सेना ने मार दिया था.

भारत प्रशासित कश्मीर के पथरीबल में 26 मार्च 2000 को पाँच लोग मारे गए थे. सेना का दावा था कि मारे गए लोग चरमपंथी थे जो 21 मार्च को छित्तिसिंघपोरा में हुए सिख समुदाय पर बर्बर हमले के लिए ज़िम्मेदार थे.

सेना ने पथरीबल फ़र्ज़ी मुठभेड़ कांड की फ़ाइल यह कहते हुए बंद कर दी है कि अभियुक्तों में से किसी के ख़िलाफ़ पुख़्ता सबूत नहीं मिले हैं.

बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने फ़र्जी मुठभेड़ में मारे गए एक युवक ज़हूर अहमद के रिश्तेदार से बात करके ताज़ा फ़ैसले पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी.

युवक के रिश्तेदार नज़ीर अहमद कहते हैं, "मुझे तेरह साल हो गया, पूरी दुनिया की मीडिया को पता है कि हमारे बच्चे पूरी तरह निर्दोष थे. फिर जब लोगों की प्रतिक्रिया हुई. जब लोग प्रदर्शन कर रहे थे तो जस्टिस पांडियन ने हमारे हक़ में फ़ैसला दिया. सीबीआई ने हमारे हक़ में फ़ैसला दिया है. अनंतनाग के एसपी और डीसी ने जांच की, उन्होंने हमारे हक़ में फ़ैसला दिया. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कनाडा ने अपने तरीक़े से पूरी जाँच करके हमारे हक़ में फ़ैसला दिया. कश्मीरी में एक मुहावरा है कि जो क़ातिल है, वही मुंसिफ़ है. क़ातिल आर्मी थी और आर्मी को ही मुंसिफ़(जज) बनाया है.''

नज़ीर अहमद ने आगे कहा, ''जबकि हिंदुस्तान की सरकार को हमारी सीबीआई पर भरोसा नहीं रहा, हमारे जस्टिस पांडियन पर भरोसा नहीं रहा, उनके एसपी पर, डीसी पर भरोसा नहीं रहा. फिर आर्मी वालों ने अपना कमीशन बनाया.''

उमर भी निराश

वो इस फ़ैसले पर सवाल उठाते हुए पूछते हैं, ''यह कौन सी आर्मी है? जिन्होंने क़त्ल किया और वहीं मुंसिफ़ बन गए. तो अब मैं क्या कहूंगा? हमारी बदक़िस्मती है. अब एक और अदालत है, इसके आगे, ऊपर वाले की अदालत, ऊपर वाले के हाथ में ही सब कुछ है.''

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर-अब्दुल्लाह ने भी निराशा जताई है.

सेना के फ़ैसले पर आसपास और लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में पूछने पर नज़ीर अहमद का कहना था, ''आप अगर यहाँ आएंगे तो देखेंगे कि हिंदुस्तान की जस्टिस और हिंदुस्तान की सेना से लोग निराश हो गए हैं. क्योंकि लोग कहते हैं कि लोगों की रक्षा के लिए है हिंदुस्तान की सेना, मगर यही हैं लोगों के क़ातिल और क़ातिल बनके भी यह कह दें कि हमने क़त्ल नहीं किया है. यह पूरी दुनिया की मीडिया को पता है कि उनको फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारा गया है. जबकि पूरी जाँच करने वाली एजेंसियों ने हमारे हक़ में फ़ैसला दिया है. निराशा ही है. मैं तो तेरह साल से निराश हूँ.''

इस फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारे गए पांच लोगों में से एक ज़हूर अहमद की मौत कैसे हुई इस बारे में जानकारी देते हुए उनके रिश्तेदार नज़ीर अहमद ने कहा, ''उस दिन वो हमारे दुकान पर हमारे ही घर पर था, हमारा भांजा है. हमारी बहन का एक ही लड़का था ज़हूर अहमद. उसकी उम्र लगभग 20-21 साल थी. उन्होंने गाड़ी गराज में रखी. वहाँ से बाहर गए. बाहर टॉस्क फ़ोर्स वाले आए थे. मैरून कलर की कार में उनको उठा लिया. हम ढूंढते रहे उनको एक-दो दिन उसके बाद हमें पता चला कि उसको ले जाकर एनकाउंटर किया गया. ऐसा कहा गया कि उसने ही सिखों का क़त्ल किया है.''

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