क्या मोबाइल है सारे फ़साद की जड़?

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खाप पंचायतों के मुताबिक़ लड़कियों का सबसे बड़ा दुश्मन है उनका मोबाइल फ़ोन. उनका मानना है कि मोबाइल लड़कियों के घरों से भागने की वजह हैं और इसी वजह से बलात्कार बढ़ रहे हैं. उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार की कई खाप पंचायतों ने नौजवान लड़कियों के मोबाइल रखने और उसके इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है.

इस बारे में हमने बागपत (उत्तर प्रदेश) की असारा खाप पंचायत के नेता मोहकम पहलवान से बात की, जो भारतीय सेना में रहे हैं और कई बार राष्ट्रीय स्तर पर पहलवानी में पदक जीत चुके हैं.

मोहकम लड़कियों के मोबाइल रखने के कट्टर विरोधी हैं और पंचायत बुलाकर उन्होंने लड़कियों के मोबाइल रखने पर पाबंदी का ऐलान किया था. दंगा करने के आरोप में उन्हें 52 दिन जेल में बिताने पड़े थे.

इसके साथ ही हमने घर छोड़कर अंतरजातीय विवाह करने वाली झज्जर (हरियाणा) की एक युवती रीना से भी बात की. मोबाइल रखने के कारण वह अपने घर वालों और ख़ासकर अपने भाइयों की प्रताड़ना झेल चुकी हैं.

(जाटों के गांव में लड़कियों को पढ़ाने का खाप का फरमान)

घर का रूढ़िवादी माहौल देखकर उन्होंने घर छोड़ा और समाज के दबाव के बावजूद अपना जीवनसाथी चुना. उनके मुताबिक़ उनके भाइयों ने उनका अपहरण करने की कोशिश भी की. वह अपने घर से अलग रहती हैं और एक स्कूल में पढ़ाती हैं. फिर भी उन्हें धमकियां मिलनी बंद नहीं हुई हैं.

लड़कियों के मोबाइल रखने और उसके इस्तेमाल को लेकर दोनों के विचार हमें एक-दूसरे से उलट मिले.

लड़कियों के मोबाइल रखने पर आख़िर पाबंदी क्यों?

मोहकम– जो शादीशुदा लड़कियां हैं वो मोबाइल रख सकती हैं. अगर कुंवारी लड़की फ़ोन रखेगी, तो दुनियाभर की खुराफ़ात बढ़ती है. अगर आप अख़बार देखें तो जितना भी अपराध बढ़ रहा है, वह फ़ोन ही की करामात है. बिन ब्याही लड़की को मोबाइल फ़ोन नहीं रखना चाहिए. अगर उसे फ़ोन पर किसी से बात करनी भी है- मामा से बात करनी है या भाई से करनी है- तो घर का जो मोबाइल है, उससे घर वालों के सामने करनी चाहिए. अलग से फ़ोन रखने पर तो क्राइम ही बढ़ेगा.

रीना- मोबाइल रखने से लड़कियां खुल जाती हैं. वे अपने सर्कल में बात कर पाती हैं, जिसमें वे लड़कों से भी बात करती हैं और उनको (खाप नेताओं को) लगता है कि वे लड़कों से बात करेंगी तो बिगड़ जाएंगी.

क्या आपको लगता है कि एक लोकतांत्रिक देश में लड़कियों पर ऐसी पाबंदी जायज़ है?

मोहकम - आज़ादी के रहते हुए ही तो हम परेशानियों का सामना कर रहे हैं. देख नहीं रहे आप रोज़ अख़बार में चाहे कहीं भी हो, रोज़ 10 जगह बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं. इनमें ज़्यादातर बिन ब्याही लड़कियों के मामले आ रहे हैं. 10-10 साल की बच्चियों से बलात्कार के मामले देखने में आ रहे हैं. घोर अत्याचार हो रहा है... समाज में हर आदमी फ़ोन का ग़लत इस्तेमाल करता है. अपने को कोई कितना भी बड़ा धर्मात्मा मानता हो, कम ही लोग होंगे, जो फ़ोन का सही इस्तेमाल कर रहे हैं.

(छवि सुधारने के लिए खाप पंचायतें लाएंगी वेबसाइट)

रीना – एक आज़ाद देश में लड़कियों पर ऐसी पाबंदी लगाना बिल्कुल नाजायज़ है. मोबाइल आज एक ज़रूरत बन चुका है और जितनी इसकी ज़रूरत लड़कों को है, उतनी ही लड़कियों को भी है क्योंकि लड़कियां बाहर आती-जाती हैं, तो मोबाइल उनकी सुरक्षा करता है. अगर उन्हें कोई काम निपटाना होता है, तो उसको भी मोबाइल से निपटाया जाता है. तो वह ज़रूरत की चीज़ है.

क्या मोबाइल फ़ोन रखने को लेकर आप पर पाबंदी लगी थी?

रीना - मेरे ऊपर मोबाइल रखने पर पाबंदी लगी हैं. मुझे मोबाइल छिपाकर रखना पड़ा था. मेरे भाइयों को मेरा इस पर बात करना पसंद नहीं था. इसके बाद मैंने अपना फ़ोन अपनी मम्मी की संदूक़ में एक डिब्बे में छिपाकर रखा. मम्मी को पता चल जाता, तो कोई बात नहीं थी, वो तो रख लेतीं, मगर अगर मेरे भाइयों को पता चल जाता, तो वे गुस्सा करते और मुझसे मारपीट तक करते.

ऐसे में जब मुझे बात करनी होती थी, तो मैं घर का दरवाज़ा बंद करके सहेलियों से बात करती थी. अपने मोबाइल पर गेम या इंटरनेट चलाना है, तो वह भी छिपकर करती थी. जैसे ही भाई घर में आते थे, तो मैं फ़ोन को स्विच ऑफ़ कर देती थी. घर छोड़कर आने के बाद एक बार घर गई मिलने के लिए और अपना मोबाइल लेकर गई, तो भी मुझे उसे छिपाकर रखना पड़ा.

लड़कियां जब घरों से भाग जाती हैं तो क्या इसके पीछे कारण मोबाइल फ़ोन है?

मोहकम - मेरे गांव की 20 लड़कियां भाग चुकी हैं- 20. इनमें कुंवारी और शादीशुदा दोनों ही हैं. मेरे गांव में जब से बवाल हुआ, तब से मैंने पंचायत का सिलसिला शुरू किया था और जब से पंचायत हुई, तब से सिर्फ़ एक ही ऐसा केस हुआ. बाक़ी कोई केस तब से अभी तक नहीं हुआ.

(खाप पंचायत की आंखों देखी, कानों देखी)

असल में फ़ोन हाथ में होने पर ये एक दूसरे के संपर्क में आते हैं. बस वहां मिलना और वहां मिलना. फ़ोन एक फ़साद तो है ही. हमारे गांव की तो हालत यह है कि जितनी भी लड़कियां भाग रही हैं, गांव के लोगों ने लड़की वालों का साथ दिया और लड़कों का साथ नहीं दिया. यहां तक कि हमारे गांव की लड़की हमारे गांव में ही रखी. इससे बुरा और क्या फ़साद होगा. लोकतांत्रिक देश में हम मानते हैं कि सब कुछ है, लेकिन अगर एक समाज ऐसी लड़की को उसी गांव में रखेगा, तो इसका लोगों पर कितना बुरा असर होगा.

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रीना – लड़कियों के भागने के पीछे मोबाइल बिल्कुल ज़िम्मेदार नहीं है. उसके पीछे जो घरों की स्थितियां हैं, घर में लड़कियों का जो नीचे का दर्जा है, वह ज़िम्मेदार है. घरों में लड़कियों को एक चीज़ से और इज़्ज़त की चीज़ से ज़्यादा कुछ नहीं समझा जाता. वे चाहते हैं कि लड़कियां सिर्फ़ घर में काम करती रहें. वो अपने मन की बात कभी नहीं कह पातीं. वो खेलना चाहती हैं तो खेल नहीं पातीं. पढ़ना चाहती हैं तो पढ़ नहीं पातीं. अपना मनपसंद करियर नहीं चुन सकतीं, मनपसंद जीवनसाथी नहीं चुन पातीं, इसीलिए वो घर छोड़कर चली जाती हैं, या तो मनपसंद साथी के साथ या यूं ही घर छोड़कर.

कुछ लड़कियां अपना मोबाइल फ़ोन दुकान पर रखती हैं. घर से निकलकर वो दुकान से उसे लेकर बात करती हैं और बाद में उसी को वापस करके घर चली जाती हैं.

मोहकम - अगर किसी घर पर पाबंदी है, तो यह जो एसटीडी वगैरह हैं, उनसे वे जुड़ी हुई रहती हैं. वे अपने फ़ोन रास्ते में रख देती हैं और फिर घर चली जाती हैं. मगर मेरे गांव की पंचायत से पहले हालत इतनी ख़राब थी कि चाचा भतीजी को भगा रहा था, भाई बहन को भगा रहा था. लोकतांत्रिक देश में ऐसे लोग कलंकित कर रहे थे.

क्या मोबाइल लोगों को अपराध के लिए उकसा रहा है, वह सभी फ़सादों की जड़ है?

मोहकम - मेरी नज़र में तो है. इस हिंदुस्तान में ऐसे राक्षस पैदा हो रहे हैं कि जिसकी कोई थाह ही नहीं है. यह सिर्फ़ फ़ोन के ही तो कारण है. आपको बताऊं हमारे एक गांव कसेरवा की वारदात. लड़की की शादी कर दी कसेरवा गांव में और एक फ़ोन उसे दे दिया और एक फ़ोन खुद रख लिया. इसके बाद पिता रोज़ अपनी बेटी से गंदी बातें करता था. किसी ने उसे इंटरनेट पर डाल दिया.

(खाप महापंचायतः कन्या भ्रूण हत्या पर हत्या का मामला चले)

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रीना - नहीं सर, इसके पीछे मोबाइल ज़िम्मेदार नहीं है. इसके पीछे ज़िम्मेदार हमारे समाज की पितृसत्तात्मक सोच है. उसके कारण लगातार लड़कियों की संख्या कम हो रही है. वो उनको बिल्कुल ग़ैरज़रूरी मान रहे हैं. यदि उन्हें लड़की चाहिए, तो घर चलाने के लिए वंश चलाने के लिए और बेटा देने के लिए चाहिए. जो लड़कों को संस्कार नहीं दिए जाते, सिर्फ़ लड़कियों पर बाउंडेशन लगाई जाती हैं, वो लोग ज़िम्मेदार हैं.

पंचायत लड़कों के मोबाइल रखने पर पाबंदी क्यों नहीं लगाती? सिर्फ़ लड़कियों पर क्यों?

मोहकम - हमने लड़कों पर भी पाबंदी लगाई थी. हमने गांव में ऐलान कर दिया था कि कोई भी 17 साल से नीचे का लड़का फ़ोन नहीं रखेगा. हमारे गांव की 50 हज़ार की आबादी है, उसने इसका पुरज़ोर समर्थन किया पर हमारे गांव में जो धर्म के ठेकेदार बने हुए हैं उन्होंने यह नहीं होने दिया. प्रधान कह रहे हैं कि यह काम ठीक नहीं है. जबकि पूरा समाज कह रहा है कि जो मोहकम कह रहे हैं, वह सही है. इसकी वजह से काफ़ी बवाल हुआ और इस पंचायत के कारण ही हम 52 दिन जेल में रहे.

लड़के पढ़ रहे हैं, लड़की पढ़ रही है, वे मोबाइल का सही इस्तेमाल नहीं कर रहे. अब लड़के-लड़कियां कहते हैं कि मोबाइल एक कंप्यूटर भी है. हम कहते हैं कि उसे आप कंप्यूटर की तरह और पढ़ाई के लिए तो इस्तेमाल नहीं कर रहे. उसे आप मिसयूज़ कर रहे हैं.

रीना - आज तक इन खाप वालों का एक भी फ़रमान लड़कों के ख़िलाफ़ नहीं आया कि लड़कों के मोबाइल फ़ोन रखने और बाइकों पर पाबंदी लगे. इनकी सोच है कि लड़कों से इनकी इज़्ज़त पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता. इन्हें लगता है कि जो इज़्ज़त खराब होती है, वह लड़कियों के जींस पहनने और मोबाइल के इस्तेमाल करने से और लड़कियों के सिर न ढकने की वजह से होती है.

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