क्या लोगों को रिझा पाए राहुल गांधी?

  • 28 जनवरी 2014
राहुल गांधी Image copyright Reuters

राहुल गांधी कहते हैं कि वह व्यवस्था में बदलाव लाने, महिला सशक्तिरण, लोकतंत्र को मज़बूत करने, युवाओं के लिए राजनीति के दरवाज़े खोलने और भारत को दुनिया में विनिर्माण का केन्द्र बनाने के लिए दृढ़संकल्प हैं.

एक दशक पहले राजनीति में क़दम रखने वाले नेहरू-गांधी परिवार से सबसे नए सदस्य राहुल के सोमवार रात को दिए गए पहले औपचारिक साक्षात्कार का यही लब्बो-लुबाब है.

भारत की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के नेता और उनकी पार्टी इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं दिखती कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे और 1984 के सिख विरोधी दंगों में कथित तौर पर शामिल नेताओं से कैसे निपटा जाए? जब ये दंगे हुए थे तो राहुल के पिता राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे.

'टाइम्स नाउ' चैनल पर प्रसारित 80 मिनट के साक्षात्कार पर टिप्पणी करते हुए पत्रकार टुंकू वरदराजन ने ट्वीट किया, "जो भी हो, यह राहुल गांधी का साहस है. भारतीय प्रधानमंत्री पद के कितने दावेदारों ने प्राइम टाइम पर साक्षात्कार देने की पेशकश की है?" (राहुल अगले आम चुनाव में पार्टी की तरफ से प्रचार की कमान संभालेंगे.)

साक्षात्कार

राहुल ने भारत के सबसे आक्रामक माने जाने वाले प्राइम टाइम एंकर अर्णब गोस्वामी को साक्षात्कार देने के लिए चुना.

मीडिया से कटे-कटे रहने वाले इस नेता का टीवी पर पहला औपचारिक साक्षात्कार प्रदर्शन के लिहाज से मिला-जुला रहा.

राहुल ने पूरे संयम और साफ़गोई के साथ अपनी बात रखी. हालांकि पार्टी में सुधार और देश के विकास के लिए अपना दृष्टिकोण पेश करते समय वह थोड़ा ज्ञान बांटते दिखे.

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में कांग्रेस के नाकाम रहने के सवालों पर वह प्रभावशाली जवाब नहीं दे पाए.

भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार चला रहे आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवालपर सीधी टिप्पणी करने से भी राहुल बचते नज़र आए.

कई लोगों को लगता है कि राहुल ने इस साक्षात्कार में कई घिसे पिटे जुमले इस्तेमाल किए जो उनके लिए नए समर्थक जुटाने में नाकाम साबित हो सकते हैं. मसलन "बेगुनाह लोगों की मौत भयावह बात है", "जो कोई भी भ्रष्ट है उसे सज़ा मिलनी चाहिए", और "महिलाएं इस देश की रीढ़ हैं". उनमें वाक् पटुता का अभाव दिखा और वह अपने ही शब्दों से फिरते नज़र आए.

विकास का एजेंडा

Image copyright Reuters

विकास के लिए उनका एजेंडा साधारण सा है.

उन्होंने सशक्तिकरण जैसे शब्दों को 22 बार इस्तेमाल किया. उन्होंने मौजूदा व्यवस्था, इसके टूटने और इसमें बदलाव की बात की और इस दौरान 70 बार व्यवस्था शब्द का उल्लेख किया.

राहुल ने महिलाओं और उनकी मुख्य भूमिका का पूरे साक्षात्कार के दौरान 17 बार उल्लेख किया. कई लोगों को यह बात भी बेतुकी लगी कि उन्होंने सात बार 'थर्ड पर्सन' के रूप में अपने बारे में बात की, यानी जैसे वह किसी और के बारे में बात कर रहे हों.

भारत की सभी समस्याओं के लिए उन्होंने ज़ाहिर तौर पर व्यवस्था को ज़िम्मेदार ठहराया.

उन्होंने कहा कि भारत की राजनीति में व्यवस्था से बाहर के लोगों के लिए कोई जगह नहीं है और इसे बदलने के लिए व्यवस्था में परिवर्तन ज़रूरी है.

लेकिन साथ ही राहुल ने कहा कि उन्होंने अपने परिजनों और प्रियजनों को 'व्यवस्था का शिकार होते' देखा है. यह साफ़ नहीं है कि उनकी दादी और पिता की हत्या के लिए किस तरह व्यवस्था को दोषी ठहराया जा सकता है.

उन्होंने कहा कि 2002 के दंगे भी इसी व्यवस्था के कारण हुए ''क्योंकि इस व्यवस्था में लोगों की आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं है". एक बार फिर यह साफ़ नहीं है कि वह क्यों ऐसा कह रहे हैं.

व्यवस्था का विद्रोही

Image copyright AFP

राहुल ने ख़ुद को व्यवस्था का विद्रोही बताकर कई लोगों को अंचभे में डाल दिया.

उन्होंने कहा कि उनके विरोधी उन्हें इसलिए निशाना बना रहे हैं क्योंकि वह जो कुछ कर रहे हैं वो इस व्यवस्था के लिए ख़तरनाक है. उन्होंने कहा कि वह हवा-हवाई बातें नहीं करते हैं और उनकी सोच गहरी और दीर्घकालिक है.

जानकारों का मानना है कि अपनी अप्रत्याशित और गैरपरंपरागत राजनीति से केजरीवाल पहले ही भारतीय राजनीति के सबसे बड़े विद्रोही बन चुके हैं और इसमें राहुल का प्रवेश देर से हुआ है.

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि राहुल ने राजनीति में अनुभवहीनता का भी परिचय दिया.

उन्होंने मोदी सरकार पर 2002 के गुजरात दंगों से निपटने के लिए ज़रूरी क़दम नहीं उठाने का आरोप लगाया लेकिन जब उनसे इस बारे में सबूत देने को कहा गया तो वह गड़बड़ा गए और यह भी भूल गए कि मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल एक मंत्री को दंगों में भूमिका के लिए जेल भेजा जा चुका है.

चुनाव में कांग्रेस की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर राहुल ने कहा कि उनकी पार्टी जीत दर्ज करेगी जबकि सभी जनमत सर्वेक्षण कांग्रेस की भारी हार का संकेत दे रहे हैं. फिर राहुल ने कहा कि वह एक गंभीर राजनेता हैं और कुर्सी पाने के लिए राजनीति नहीं करते हैं.

परिपक्व

तो क्या राहुल गांधी वास्तव में परिपक्व हो गए हैं?

'आउटलुक' पत्रिका के पूर्व संपादक विनोद मेहता ने कहा कि इस साक्षात्कार में राहुल एक गंभीर, स्पष्ट और आक्रामक व्यक्ति दिखे जो भारत में बदलाव के लिए गंभीर दिखता है.

लेकिन मेहता ने साथ ही कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों पर उनके पास कोई जवाब नहीं है. उन्होंने कहा कि राहुल अभी अपरिपक्व नेता हैं.

सिद्धार्थ वरदराजन जैसे विश्लेषक कहते हैं कि राहुल ने पार्टी के भविष्य को लेकर तो सुनहरी तस्वीर खींची लेकिन भ्रष्टाचार और 1984 के सिख विरोधी दंगों में पार्टी के नेताओं की कथित भूमिका के मामलों में वह फ्लॉप रहे.

वरदराजन ने कहा, "जब वह सवालों में उलझते हैं तो व्यवस्था और सशक्तिकरण की बात करने लगते हैं."

विश्लेषकों का कहना है कि राहुल बातें तो सही करते हैं लेकिन वह अपनी पार्टी की खानदानी विरासत के ग़ुलाम हैं.

तो क्या सोमवार की रात का यह 'ऐतिहासिक' साक्षात्कार पार्टी कार्यकर्ताओं में जान फूंक सकेगा और मतदाताओं को रिझा पाएगा. यह बात अगले कुछ महीनों में साफ़ हो जाएगी जब दुनिया से सबसे बड़े चुनाव में भारतीय मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार