'तेलंगाना बनने की प्रक्रिया सरल नहीं है'

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आंध्र प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही सीमांध्र के सभी विधायकों ने अध्यक्ष को घेर लिया. अध्यक्ष महोदय खुद भी सीमांध्र प्रदेश के हैं.

अध्यक्ष ने जानकारी दी कि मुख्यमंत्री ने यह सरकारी प्रस्ताव रखा है और इस पर वोटिंग कराना चाहते हैं. इस प्रस्ताव में कहा गया था कि सदन आंध्र प्रदेश पुनर्गठन बिल 2013 को नामंजूर करता है. इसमें यह भी सिफारिश की गई थी कि यह बिल संसद में पेश ना किया जाए.

तेलंगाना के विधायकों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि इस विधेयक पर निर्णय ध्वनिमत से होने वाला है. अध्यक्ष ने जब अचानक इसकी घोषणा की तो सीमांध्र विधायकों ने उन्हें घेर लिया.

नामंजूर होने के मायने

ध्वनि मत में चूंकि वोटों की गिनती नहीं होती इसलिए एक ही मिनट में वोटिंग की प्रक्रिया पूरी हो गई. बिल नामंज़ूर होने के बाद आंध्र प्रदेश विधानसभा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई.

यह तो सब जानते हैं कि सीमांध्र के मंत्री, लॉबी और जनता नहीं चाहती कि प्रदेश का विभाजन हो. सदन में इसी बात को पुरजोर तरीके से कहा गया.

कुछ सप्ताह पहले ही इसी मांग के साथ सीमांध्र के लोगों ने 70 दिनों के सीमांध्र बंद का आयोजन किया था.

सीमांध्र के आम लोग भले ही पृथक तेलंगाना के पक्ष में हों मगर यहां के राजनेता और कारोबारी आंध्र प्रदेश का विभाजन नहीं चाहते.

विभाजन का अधिकार

राज्य के विभाजन की प्रक्रिया में राज्य की कोई भूमिका नहीं होती है. संविधान के तहत भारत के नक्शे में किसी तरह का बदलाव लाने का हक़ संसद को है.

अब यह विधेयक राष्ट्रपति के पास जाएगा. राष्ट्रपति इसे गृहमंत्री को सौपेंगे फिर गृहमंत्री लोकसभा में पेश करेंगे.

लोकसभा में क्या होगा, ये देखने वाली बात है. संभव है कि लोकसभा में भाजपा आवाज़़ उठाए.

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Image caption आंध्र प्रदेश में पृथक तेलंगाना राज्य की माँग को लेकर कई सालों से आंदोलन चल रहा है

चूंकि सीमांध्र के लोग प्रदेश के विभाजन के विरुद्ध एकमत हैं. वे बिल्कुल नहीं चाहते कि प्रदेश का विभाजन हो. ऐसे में भाजपा कह सकती है कि सीमांध्र क्षेत्र की जनता के हितों का ख्याल करते हुए हमें अभी इंतजार करना चाहिए.

मुझे लगता है कि तेलंगाना बनने की प्रक्रिया सरल नहीं है. इसमें अभी काफी गड़बड़ी पेश आने वाली है.

आंध्र प्रदेश विधानसभा के 294 विधायकों में से 119 विधायक तेलंगाना क्षेत्र से हैं और 175 सीमांध्र क्षेत्र से हैं.

सीमांध्र विधायकों की संख्या ज़्यादा है इसलिए पहले से पता था कि अगर मतदान हुआ तो प्रस्ताव गिर जाएगा और वही हुआ.

अगर प्रस्ताव पर ध्वनिमत की जगह संख्या के आधार पर भी वोटिंग होती तब भी प्रस्ताव खारिज हो जाता.

(बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा से बातचीत पर आधारित)

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