किस राष्ट्रपति ने कितनों को दिया जीवन दान

फाँसी का फ़ंदा

कई वर्षों से मौत के साए में जी रहे देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की फाँसी पर सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक रोक लगा दी है. भुल्लर को तो सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल राहत मिल गई है लेकिन पिछले तीन दशकों में राष्ट्रपति के पास पहुँचीं 113 में से सिर्फ़ 31 दया याचिकाओं में ही दोषियों को जीवनदान मिल सका.

भुल्लर पर सितंबर 1993 में दिल्ली में विस्फोट करने और कांग्रेस नेता मनिंदरजीत सिंह बिट्टा की हत्या की कोशिश का आरोप था.

ट्रायल कोर्ट ने साल 2001 में उन्हें मौत की सज़ा सुनाई थी और दिसंबर 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस फ़ैसले पर मुहर लगा दी थी. इसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने 25 मई 2011 को भुल्लर की दया याचिका को नामंज़ूर कर दिया था.

लेकिन याजिका नामंज़ूर किए जाने के बाद भुल्लर ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. भुल्लर ने तर्क दिया कि साल 2003 की उनकी दया याचिका को राष्ट्रपति ने आठ बरस तक लटकाए रखा.

'दयावान प्रतिभा'

आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल को सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने कुल 22 दया याचिकाओं पर फ़ैसला लिया, जिनमें से उन्होंने सिर्फ़ तीन याचिकाएं नामंज़ूर कीं. बाकी सब में उन्होंने फ़ाँसी की सज़ा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया.

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Image caption प्रतिभा पाटिल ने कुल तीन दया याचिकाएं नामंज़ूर की थीं जिनमें राजीव के क़ातिलों और भुल्लर की याचिका शामिल थी

जिन तीन मामलों में प्रतिभा पाटिल ने दया याचिका नामंज़ूर की थी उनमें भुल्लर के अलावा महेंद्र नाथ दास, संथन, मुरुगन और अरिवू की दया याचिकाएँ शामिल थीं. मुरुगन, संथन और अरिवू पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के दोषी हैं.

इसी साल 15 जनवरी को एक ऐतिहासिक फ़ैसले में सु्प्रीम कोर्ट ने फाँसी की सज़ा पाए 15 लोगों की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया था. राजीव गांधी के क़त्ल के दोषियों को सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के दायरे से बाहर रखने के लिए केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी, जिस पर फ़ैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजीव गांधी हत्याकांड में शामिल दोषियों को फाँसी दी जानी चाहिए.

वहीं क़त्ल के आरोप में दोषी क़रार दिए गए महेंद्र नाथ दास ने राष्ट्रपति के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. मई 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने महेंद्र नाथ दास की फाँसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया था.

महेंद्र दास की याचिका भी राष्ट्रपति के समक्ष 12 साल तक लंबित रही. दास ने तर्क दिया था कि दया याचिका लंबित रहने के कारण उन्हें मानसिक पीड़ा से गुज़रना पड़ा.

साल 2002 से 2007 तक राष्ट्रपति रहे एपीजे अब्दुल कलाम ने सिर्फ़ दो याचिकाओं पर ही फ़ैसला किया, जिनमें से एक में उन्होंने फाँसी को आजीवन कारावास में बदल दिया जबकि बलात्कार और हत्या के अभियुक्त धनंजय चटर्जी की याचिका को उन्होंने नामंज़ूर कर दिया था. धनंजय चटर्जी को फ़ाँसी दी जा चुकी है.

'सख़्त प्रणब'

हालाांकि 25 जुलाई 2012 को भारत के राष्ट्रपति बने प्रणब मुखर्जी ने अभी तक कुल 15 दया याचिकाओं पर फ़ैसला किया है, जिनमें से उन्होंने सिर्फ़ एक ही मामले में फाँसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदला है.

मुंबई हमलों के दोषी अजमल आमिर क़साब और संसद पर हुए हमले में दोषी ठहराए गए अफ़ज़ल गुरु की याचिकाएं प्रणब मुखर्जी ने नामंज़ूर कर दी थीं जिसके बाद दोनों को ही फाँसी दी जा चुकी है.

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Image caption वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अब तक 15 दया याचिकाओं पर फ़ैसला किया है

प्रणब मुखर्जी ने सिर्फ अतबीर नाम के क़ैदी की दया याचिका मंज़ूर की. अतबीर को साल 2004 में निचली अदालत ने सौतेली माँ, बहन और भाई का क़त्ल करने के आरोप में फाँसी की सज़ा सुनाई थी.

हालांकि प्रणब ने जिन क़ैदियों की दया याचिकाएं नामंज़ूर की हैं उनमें से सिर्फ़ बीए उमेश, धर्मपाल और साईंबन्ना को छोड़कर बाकी सभी की सज़ा को सुप्रीम कोर्ट ने 15 जनवरी के अपने फ़ैसले में आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया है.

वेंकटरमण 'सबसे तेज़'

साल 1997 से 2002 तक राष्ट्रपति रहे केआर नारायणन ने सिर्फ़ एक ही दया याचिका पर फ़ैसला लिया. उन्होंने जीवी राव और एससी राव की फ़ाँसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया था जबकि 1992 से 1997 तक राष्ट्रपति रहे शंकर दयाल शर्मा ने कुल 12 दया याचिकाओं पर फ़ैसला किया जिनमें से सभी को उन्होंने नामंज़ूर कर दिया.

हालांकि 1987 से 1992 तक राष्ट्रपति रहे आर वेंकटरमण ने दया याचिकाओं पर सुनवाई के मामले में रिकॉर्ड बना दिया.

उन्होंने कुल 39 दया याचिकाओं पर फ़ैसला किया जिनमें से सिर्फ़ छह को ही मंज़ूर करते हुए फ़ाँसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदला.

साल 1982 से 1987 तक राष्ट्रपति रहे ज्ञानी जैल सिंह ने कुल 22 दया याचिकाओं पर फ़ैसला किया जिनमें से तीन को उन्होंने मंज़ूर किया.

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