हरीश रावत: 'राजनीति दिमाग से, दिल की बात दिल में'

हरीश रावत और विजय बहुगुणा

उत्तराखंड में पत्रकारिता के इन तेरह सालों में मैं अक्सर हरीश रावत से पूछती कि, “आखिर क्या वजह है कि आप मुख्यमंत्री नहीं बन पाते ?”

अपनी चौड़ी मुस्कान के साथ वो जवाब देते, “मैं कांग्रेस सेवादल का सच्चा सिपाही रहा हूं और वैसे भी पहाड़ का हूं. पहाड़ के लोगों में धैर्य होता है.”

ये कहते–कहते चेहरे पर उनका मलाल भी झलक जाता लेकिन कभी होंठो पर नहीं आता. कह सकते हैं कि हरीश रावत राजनीति दिमाग से करते हैं और दिल की बातें दिल में ही रखते हैं.

अब जब वो मुख्यमंत्री बन गए हैं, तो कुमाऊं में हरीश रावत के गांव मोहनरी में उनकी जयजयकार हो रही है.

लंबा इंतजार

किसी जमाने में ब्लॉक प्रमुख रहे रावत केंद्र में कैबिनेट रैंक का मंत्री हासिल करने के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने हैं. और ये कुर्सी हरीश रावत को 12 साल के इंतजार के बाद मिली है.

आखिरकार कांग्रेस आलाकमान को हरीश रावत का ख्याल आया और उन्हें तीन साल के लिए पांच लोकसभा सीटों और 70 विधानसभा सीटों वाले उत्तराखंड में सरकार चलाने भेजा गया है. इसके पहले हरीश रावत दो बार मुख्यमंत्री बनते-बनते दरवाजे से लौटा दिए गए.

2002 में पार्टी ने एक तरह से उन्हीं की अगुवाई में उत्तराखंड का चुनाव लड़ा था और उनका मुख्यमंत्री बनना तय था लेकिन ऐन वक्त पर न जाने एनडी तिवारी कैसे कुर्सी पर बैठा दिए गए.

हरीश रावत की उम्मीदों को झटका लगा उनके चाहने वालों को सदमा. हरीश को उबरने में वक्त लगा. तिवारी शासनकाल में कोई दिन ऐसा न होता था जब कयास न लगते हों कि तिवारी इस्तीफा दे रहे हैं.

Image caption हरीश रावत राजनीति के मंछे हुए खिलाड़ी हैं

हरीश रावत एक तरह से उस समय हाथ मलते रह गए थे, बाद में उन्हें केंद्र में जगह मिली. 2012 में बहुगुणा की शपथ लेने के समय तक हाई वोल्टेज ड्रामा हुआ.

रावत ने भी कुछ कड़े तेवर दिखाए. इस समय भी उनके हाथ से वो कुर्सी चली गई जिसके हकदार उनके चाहने वाले उन्हें मानते थे. हरीश ने लाख कोशिशें कर ली और एक बार फिर आलाकमान के आगे उन्हें झुकना पड़ा.

चर्चा तो ये भी चल पड़ी थी कि हरीश अब कांग्रेस के साथ ज्यादा दिन नहीं रहेंगे. लेकिन कांग्रेस सेवा दल के “सिपाही” का ये धैर्य देखते ही बनता था. कोई नहीं जानता कि हरीश रावत के दिल पर क्या गुजर रही थी.

खुर्राट खिलाड़ी

वो केंद्र में जमे रहे और सरकार में उनका ओहदा बढ़ा कर कैबिनेट मंत्री का कर दिया गया.

लेकिन बहुगुणा को चैन की सांस उन्होंने नहीं लेने दी. वाकयुद्ध चलते रहे, और बहुगुणा का ध्यान राज्य से ज्यादा असंतुष्ट विधायकों और हरीश कैंप या इस या उस कैंप के नेताओं की मानमनौव्वल और सरकार बचाने में ही लगा रहा.

रावत अपनी बिसात बिछा चुके थे. न चाहते हुए भी बहुगुणा उसमें फंस गए. रही सही कसर जल प्रलय और उसके बाद आपदा प्रबंधन ने पूरी कर दी.

रावत राजनीति के खुर्राट खिलाड़ी हैं. वो एक साथ कई लक्ष्य कई साधना जानते हैं.

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Image caption उत्तराखंड में पिछले साल विनाशकारी बाढ़ आई

उनके बारे में मशहूर भी है कि एक समय वो अपने गांव की किसी सभा में होंगे तो अगले ही पल हरिद्वार या दिल्ली में किसी कार्यक्रम में शामिल होंगे. इधर तो वो टीवी बहसों में भी भाग ले रहे थे और अपने तीखे कटाक्षों से बीजेपी वालों को घायल कर रहे थे.

अभूतपूर्व सक्रियता और मूवमेंट के अलावा इधर हरीश रावत में एक और परिवर्तन आया है. वो पहले से अधिक सक्रिय और सजग दिखते हैं. उनके बयान सधे हुए और उनके तर्क अकाट्य होने लगे हैं. उनके पास तथ्य और आंकड़े भी होते हैं और विरोधियों की कमजोरी का होमवर्क करके पहुंचते थे.

पुराने गीतों के शौकीन

हरिद्वार रावत का संसदीय क्षेत्र है. जहां से उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की थी. वो अल्मोड़ा से भी सांसद रह चुके हैं. हरीश का हरिद्वार में अच्छाखासा दबदबा है.

उत्तराखंड में अल्पसंख्यकों के सबसे चहेते नेता वही माने जाते हैं. उत्तराखंड में अल्पसंख्यक मसलों और वोटों को इतना किसी ने नहीं देखाभाला जितना हरीश रावत ने.

हरीश रावत की प्रकट विनम्रता भी उनकी खूबी है. उन्होंने विनम्र बने रहना ही पसंद किया और शालीनता से अपने विरोधियों को जवाब दिया. लेकिन इस मृदुभाषी व्यक्तित्व के पीछे एक तेज और कुटिल राजनीतिज्ञ का दिमाग काम करता है और इसमें शायद उनकी वकालत की पढ़ाई काम आती होगी.

लंबा वक्त भले लग जाए लेकिन हरीश रावत अपने राजनीतिक शत्रुओं को परास्त करने में हिचकते नहीं. एनडी तिवारी पांच साल अपनी जय जय करा कर भले ही चले गए लेकिन आज सभी मानते हैं कि हरीश रावत के साथ अन्याय हुआ था. हरीश, “ठीक है ठीक है कोई बात नहीं कोई बात नहीं” करते हुए अपना कद ऊंचा करने में सफल रहे.

अब उत्तराखंड जैसे छोटे लेकिन राजनीतिक रूप से जटिल और अफसरशाही की कथित उच्छृंखलाओं के लिए कुख्यात हो चुके उत्तराखंड के लिए संभव है उन्होंने अपने औजार पैने करने शुरू कर दिए होंगे.

निजी जीवन में उन्हें पढ़ने और पुराने फिल्मी गीत सुनने का शौक है और खाने में पहाड़ी व्यंजनों से लगाव. उनके तीन बेटे और दो बेटियां हैं.

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