राष्ट्रपति का हमशक्ल होने की इतनी बड़ी सजा!

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Image caption तालिबान ने बातचीत की कोशिशों का स्वागत किया है

बीते हफ़्ते जहां पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में तालिबान से बातचीत के लिए बनी सरकारी कमेटी और परवेज़ मुशर्रफ़ चर्चा में रहे, वहीं भारत में कांग्रेस उपाध्यक्ष का हालिया इंटरव्यू छाया रहा.

पाकिस्तान की बात करें तो कराची से छपने वाले 'जंग' ने अपने संपादकीय में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पांचवें स्टेट ऑफ द यूनियन भाषण का जिक्र किया है जिसमें उन्होंने कहा कि अल क़ायदा के केंद्रीय नेतृत्व को हरा दिया गया है, लेकिन ख़तरा अभी बना हुआ है.

बावजूद इसके ओबामा के मुताबिक समय आ गया है कि 9/11 के हमले के बाद बनी नीतियों की समीक्षा की जाए.

अख़बार कहता है कि अगर राष्ट्रपति बराक ओबामा पुरानी जंगों को ख़त्म कर नई जंगों में न उझलने का संकेत दे रहे हैं तो ये वक्त का तक़ाज़ा है क्योंकि पहली बात तो जंगों के कारण अमरीकी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है और दूसरा किसी लड़ाई को अनिश्चित समय तक जारी रखना किसी भी देश के संभव नहीं है भले ही वो कितना भी ताक़तवर क्यों न हो.

नवाए वक्त के पहले पन्ने पर पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो का ये बयान है- बातचीत का फ़ैसला हास्यास्पद, तालिबान से मुलाकात के लिए तालिबान को भेजा जा रहा है.

तालिबान चरमपंथियों से बातचीत के लिए बनाई गई चार सदस्यों वाली कमेटी पर बिलावल ने विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ बताएं कि बातचीत किन शर्तों पर हो रही हैं और कौन से तालिबान से हो रही हैं क्योंकि अब तक उनके 56 गुट सामने आ चुके हैं.

इसी ख़बर की बग़ल में कान पर मोबाइल फ़ोन लगाए बिलखती एक महिला की तस्वीर है जिसका कोई नज़दीकी रिश्तेदार कराची में बुधवार को हुए धमाकों में मारा गया.

दैनिक 'ख़बरें' का संपादकीय है कि तालिबान ने सरकार की तरफ से बातचीत की पेशकश का स्वागत तो किया है लेकिन कोई बातचीत तभी कामयाब होगी जब तालिबान हमले बंद करेगा. बातचीत को शांति के लिए एक और मौका बताते हुए कई अख़बारों ने इस पर संपादकीय लिखे.

'राष्ट्रपति का हमशक्ल'

दैनिक 'ख़बरें' में एक दिलचस्प ख़बर है- ईरानी अभिनेता को राष्ट्रपति का हमशक्ल होने की सजा.

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Image caption बशीरी की शक्ल अहमदीनेजाद से मिलती है

क़िस्सा है ईरानी अदाकार मुहम्मद बसीरी का जिनका कहना है कि महमूद अमहमदीनेजाद आठ साल तक जब तक ईरान के राष्ट्रपति रहे, उन्हें न तो काम मिला और जहां मिला हुआ था वहां से भी हटा दिया गया क्योंकि उनकी शक्ल अहमदीनेजाद से मिलती थी.

फ़िलहाल बसीरी के लिए अब शुक्र की बात ये है कि अहमदीनेजाद अब ईरान के राष्ट्रपति नहीं हैं. तो क्या बसीरी कभी अहमदीनेजाद का रोल करेंगे, वो कहते हैं, तभी करूंगा जब अहमदीनेजाद इसकी मंजूरी देंगे.

वहीं 'नवाए वक्त' ने अपने संपादकीय में लिखा है कि विदेश जाकर इलाज कराने की पूर्व सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ की याचिका को अदालत ने ख़ारिज करते हुए उनके ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी कर दिए हैं.

अख़बार के अनुसार अब मुशर्रफ को न्याय के कठघरे में आ जाना चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके.

अख़बार की टिप्पणी है कि दिल का मरीज 18 घंटे की यात्रा कर अमेरिका जाने के लिए तैयार है जबकि कुछ गज की दूरी पर मौजूद अदालत में जाने से इनकार करता है, यह रोग समझ से परे है.

नवाए वक्त के अनुसार मुशर्रफ़ को अदालत में पेश होने का साहस दिखाना चाहिए ताकि उनके ख़िलाफ़ मुकदमा किसी मंज़िल पर पहुंचाया जा सके.

भारतीय अख़बार

राहुल गांधी के एक हालिया इंटरव्यू पर 'सियासी तकदीर' ने अपने संपादकीय में लिखा है कि 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर राहुल गांधी ने ऐसा कुछ नहीं कहा है कि तिल का ताड़ बनाया जाए. राहुल ने न तो दंगों को कमतर पेश किया और न ही ये कहा कि इसमें कांग्रेस के लोग शामिल नहीं थे. तो फिर इस पर इतना शोर नहीं मचना चाहिए.

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Image caption चर्चा में राहुल गांधी का इंटरव्यू

अख़बार के मुताबिक़ वहीं दूसरी तरफ़ संघ परिवार गुजरात के दंगों को कम करके पेश करता है. रही बात राहुल के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की तो अख़बार के मुताबिक़ प्रदर्शन करने वाले कोई और नहीं बल्कि भाजपा के समर्थक अकाली दल के ही लोग हैं.

'फ़र्जी समर्थक'

'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' लिखता है कि बीजेपी के नेता नरेंद्र मोदी भले ही सोशल मीडिया में बहुत मशहूर हों लेकिन हाल में हुए सर्वे से पता चला है कि उनके ज़्यादातर समर्थक फ़र्ज़ी हैं.

अख़बार के मुताबिक़ एक आईटी कंपनी ने देश के नेताओं के ट्विटर फ़ॉलोवर्स को लेकर सर्व किया जिसके अनुसार मोदी फ़र्ज़ी ट्विटर समर्थकों के मामले में अव्वल हैं, जबकि इस फ़ेहरिस्त में बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह दूसरे और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह तीसरे नंबर पर हैं.

वहीं 'राष्ट्रीय सहारा' ने चुनाव सुधारों पर बल देते हुए लिखा है कि अब बहुत से ऐसे सदस्य संसद, विधानसभाओं और नागरिक परिषदों में पहुंच रहे हैं जो सदन की नैतिकता को ठेस पहुंचा रहे हैं.

लेकिन अख़बार के मुताबिक अच्छी बात ये हुई है कि अदालत ने आपराधिक मामलों में दोषी साबित लोगों को चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिया है और कई सांसदों की सदस्यता इसीलिए छिन गई है.

साथ ही अख़बार ने चुनावी सर्वे से जुड़ा सवाल भी अपने संपादकीय में उठाया है.

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