नीतीश का चुनावी इम्तिहान और तीसरे मोर्चे की ज़रूरत

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ऐसे वक़्त में जबकि आम चुनाव दो से ढ़ाई महीने के फ़ासले पर हैं, नए सियासी गठजोड़ों को लेकर शोरशराबा एक बार फिर से शुरू हो गया है.

आप इसे तीसरा मोर्चा कहें या संघीय मोर्चा या फिर पुरानी बोतल में नई शराब लेकिन कांग्रेस और भाजपा के बग़ैर केंद्र में किसी तरह के सियासी गठजोड़ को इतनी आसानी से ख़ारिज नहीं किया जा सकता है. ये एक मज़बूत विचार है.

अतीत में ये हो चुका है और भाजपा और कांग्रेस से निराश हुए लोग बड़ी तादाद में ऐसे किसी राजनीतिक गठजोड़ को फिर से समर्थन दे सकते हैं.

(नीतीश और लालू की जंग)

शर्त ये है कि भाजपा और कांग्रेस के बग़ैर बनने वाला ये गठबंधन संयुक्त हो, भरोसेमंद और निर्णायक हो.

लेकिन एक सच ये भी है कि आख़िरी वक़्त में आकार ले रहा ये गठबंधन बहुत भरोसा नहीं जगा पा रहा है और ऐसे भी संकेत मिल रहे हैं कि इस गठजोड़ के नेताओं में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक बेचैनी सी दिखाई देती है.

ये केवल वक़्त ही बताएगा कि क्या उन्होंने साथ आने में देरी कर दी. तीसरे मोर्चे या संघीय मोर्चे की एक परेशानी ये भी है कि इसकी पार्टियों की पहचान किसी एक नेता से जुड़ी हुई है और ये एक नेता वाले राजनीतिक दल कहे जाते हैं.

अगर जनता दल (सेकुलर) पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के इर्द गिर्द घूमती है तो समाजवादी पार्टी की पहचान मुलायम सिंह यादव से है.

भरोसेमंद विकल्प

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और जनता दल युनाइटेड के सर्वेसर्वा केवल और केवल नीतीश कुमार हैं. हालात ऐसे हैं कि मुलायम सिंह यादव और देवेगौड़ा को चुकी हुई राजनीतिक ताक़तों के तौर पर देखा जा रहा है और तीसरे मोर्चे का सारा दारोमदार जेडीयू सुप्रीमो और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हैं. हालांकि इन तीनों का ही सियासी कद बीते एक साल में घटा है.

(लालू यादव जरूरी हैं?)

और ख़ासकर साल 2014 के आम चुनावों को भाजपा और कांग्रेस के बीच द्विपक्षीय मुक़ाबले में बदलने की भाजपा की कोशिश के मद्देनज़र ये और ज़्यादा हुआ है.

इसके बाद इन दलों को यह एहसास हुआ कि अगर वे अपने मतदाताओं में यह भरोसा नहीं जगाएंगे कि वे भी तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों के भरोसेमंद विकल्प हैं, तो वे आगामी लोकसभा चुनावों में पूरी तरह से न सही बल्कि कुछ हद तक अपना जनाधार ज़रूर गंवा देंगे.

पिछले पखवाड़े जारी किए गए अलग अलग मतदान पूर्व सर्वेक्षणों को लेकर इन राजनीतिक पार्टियों की प्रतिक्रियाओं से उनकी राजनीतिक दुविधाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है.

गठजोड़ की अगुवाई

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एक ओर जहाँ इन चुनावी सर्वेक्षणों में सभी ने लगभग एकमत से नीतीश कुमार की लोकप्रियता 55 से 60 फ़ीसदी के बीच आंकी है वहीं एक भी सर्वेक्षण में उनकी पार्टी को बिहार की 40 लोकसभी सीटों में से एक तिहाई से ज़्यादा पर जीतते हुए नहीं दिखाया गया है.

ये अनुमान इस ओर इशारा करते हैं कि दिल्ली में सरकार गठन को लेकर उनकी किसी महत्वपू्र्ण भूमिका से मतदाता आश्वस्त नहीं हैं.

(नीतीश को शिंदे की चिट्ठी)

इस लिहाज़ से तीसरे मोर्चे का विचार लोगों के रुख़ को बदलने की दिशा में एक पहल की शुरुआत कही जा सकती है.

मतदाताओं के बीच इस बात की सुगबुगाहट है कि बिहार को केंद्र में मोदी के वोट करना चाहिए और राज्य में नीतीश के लिए. इसे 'ऊपर मोदी, नीचे नीतीश' के तौर पर देखा जा रहा है और शायद नीतीश के पास अब कोई विकल्प भी नहीं रह गया है.

उनके पास केवल एक उपाय है, वो ये कि वे ख़ुद को केंद्र में किसी सत्तारूढ़ गठजोड़ की अगुवाई के लिए एक गंभीर दावेदार के तौर पर पेश करें और ज़मीन से जुड़े नेता या बाहरी व्यक्ति में से किसी एक को चुनने के लिए मतदाताओं से कहें.

राष्ट्रीय जनता दल से कांग्रेस के गठजोड़ के औचित्य को सही ठहराते हुए राहुल गाँधी ने कहा था कि यह विचारों का तालमेल है न कि किसी व्यक्ति के साथ गठबंधन.

लालू की रणनीति

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इस पर नीतीश कुमार ने राहुल गाँधी को तीखा जवाब देते हुए कहा कि अगर कांग्रेस उनसे और लालू से समान दूरी बनाकर रखती तो उन्हें ज़्यादा ख़ुशी होती.

यह किसी से छुपा नहीं है कि नीतीश राम विलास पासवान के साथ गठबंधन चाहते थे.

('भाजपा की कोई लहर नहीं')

उन्हें लग रहा था कि वामपंथी पार्टियों, जेडीयू और राम विलास पासवान को साथ लेकर बना गठबंधन एक अपराजेय गठजोड़ होगा.

लेकिन पासवान और लालू के कांग्रेस खेमे में चले जाने से ये सुगबुगाहट शुरू हो गई थी कि नीतीश 'बग़ैर किसी दोस्त' के रह गए हैं और सियासी तौर पर किनारे हो गए हैं.

नीतीश को इस ज़ोर पकड़ती सुगबुगाहट को ख़ारिज करने के लिए जल्दी से कोई क़दम उठाना था.

उनकी पहल को कई लोगों ने बहुत ज़्यादा तवज्जो नहीं दी है. न तो ममता बनर्जी, न ही मायावती और ना ही जयललिता ने ही तीसरे मोर्चे की पहल पर सार्वजनिक तौर पर कोई दिलचस्पी ज़ाहिर की है.

लगभग अपराजेय सी इन तीनों महिलाओं को अपने राज्यों में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए किसी गठबंधन की ज़रूरत नहीं है.

गंभीर दावेदार

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अगले प्रधानमंत्री के लिए खुद को एक गंभीर दावेदार के तौर पर पेश करने के लिहाज से ये तीनों महिलाएँ महत्वाकांक्षी भी हैं.

यह मालूम देता है और ये लगभग तय भी है कि ममता, मायावती और जयललिता के पास अगली लोकसभा में जेडीयू से ज़्यादा सीटें होंगी. ठीक इसी तरह नवीन पटनायक को ओडिशा में बेहतर चुनावी प्रदर्शन के लिए किसी चुनाव पूर्व गठबंधन की कोई जल्दबाज़ी नहीं है.

(घावों पर मरहम या सियासी दांव?)

यहाँ तक कि चुनाव के बाद बन सकने वाला संभावित गठजोड़ भी तमाम तरह की अनिश्चितताओं के बोझ से लदा हुआ है, वामदलों को लेकर ममता का पुराना विरोध और मुलायम को लेकर मायावती का दुराग्रह, ऐसे कई मुद्दे हैं जिनका कोई जवाब नहीं है. इन सब के अलावा नीतीश को पार्टी के भीतर उठ रही विरोध की आवाज़ों से भी निपटना है.

मतदाताओं का एक तबका भी अलग अलग वजहों से उनसे नाराज़ चल रहा है.

बिहार की अगड़ी जातियों के पास भी नीतीश की आरक्षण नीति के कारण उनसे नाराज होने के लिए वजहें हैं क्योंकि पंचायतों में इससे अगड़ी जातियों का वर्चस्व टूट सा गया है.

यादव मतदाताओें के पास ये एक तरह से आख़िरी मौका है कि उनके अपने नेता लालू यादव राजनीतिक तौर पर प्रासंगिक बन रहें.

जेडीयू की चिंताएँ

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जेडीयू की चिंताएँ उसकी सांगठनिक कमज़ोरी और कार्यकर्ताओं, सांसदों और विधायकों के असंतोष की वजह से भी बढ़ रही हैं.

जनप्रतिनिधियों की नाराज़गी इस बात को लेकर है कि नीतीश ने विधायकों की क्षेत्र विकास निधि ख़त्म कर दी थी जिससे उनका काम और मुश्किल हो गया है.

लेकिन सबसे निर्णायक बात ये है कि नीतीश की लोकप्रियता न केवल बरकरार है बल्कि बढ़ी भी है.

(चुनाव से पहले तीसरा मोर्चा)

उन्होंने आठ सालों में वो काम किया है जो लालू प्रसाद यादव 15 सालों के शासन काल में करने में नाकाम रहे. यहाँ तक कि पिछले साल जून में भाजपा से अलग होने के बावजूद उनकी सरकार ने प्रशासन के हित में कड़े फ़ैसले किए हैं भले ही वे अलोकप्रिय क्यों न हों.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या मतदाताओं का कोई ऐसा भी तबका है जो अपनी जातीय पहचान और समुदाय के हितों से ऊपर उठकर निर्णय लेने के लिए तैयार है और क्या वह राष्ट्रीय मुद्दे अपने जेहन में रखकर आम चुनावों में मतदान करेगा.

'तीसरे मोर्चे' का विचार इसी संभावना से निपटने की कोशिश का नतीजा है. इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं.

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