इन चुनौतियां से कैसे निपटेंगे नरेंद्र मोदी

  • 6 फरवरी 2014
नरेंद्र मोदी Image copyright PTI

जनमत सर्वेक्षण अब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की स्पष्ट जीत की तरफ़ इशारा कर रहे हैं.

यहां जीत का ये मतलब नहीं है कि कोई पार्टी या गठबंधन सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 272 सीटों के आंकड़े को पा रहा है, और हाल के वर्षों में जिस तरह का खंडित जनादेश आम चुनावों में मिलता रहा है, उसे देखते हुए कोई पार्टी अपने दम पर 272 सीटें हासिल करने की उम्मीद भी नहीं रखती है.

बल्कि जीत का मतलब है कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों की हार और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के बीच 40 सीटों का अंतर.

मैं उन समस्याओं को समझना चाहता हूं जिनका सामना सत्ता में आने की स्थिति में मोदी और उनके मंत्रिमंडल को शुरुआती वर्षों में करना पड़ सकता है.

ये वही समस्याएं होंगी जिनसे मनमोहन सिंह एक दशक के अपने कार्यकाल में जूझते रहे और उन्हें कानूनों के माध्यम से सुलझाने की कोशिश करते रहे.

अर्थव्यवस्था

अर्थव्यवस्था के लिहाज़ के तीन बड़े मुद्दे हैं- आर्थिक विकास दर में गिरावट, वित्तीय घाटा और कारोबारियों के लिए मददगार साबित होने वाले कानूनों को पास करने में अक्षमता.

मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते अपने कार्यकाल के ज़्यादातर समय में आठ प्रतिशत या उससे अधिक की आर्थिक वृद्धि दर देश को दी है, लेकिन पिछले तीन सालों में ये वृद्धि दर घटकर लगभग आधी हो गई है.

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Image caption नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ रही है

वो कहते हैं कि ऐसा बाक़ी दुनिया में जारी आर्थिक हालात के कारण हो रहा है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था भी जुड़ी है. इसी अवधि में चीन की आर्थिक वृद्धि दर भी घटी है.

लेकिन भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आधार (लगभग 1500 डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष) चीन के सकल घरेलू उत्पाद आधार का सिर्फ़ एक चौथाई है. इसीलिए भारत की आर्थिक वृद्धि का आधा होना कहीं ज़्यादा कष्टकारी है.

घाटा

घाटे पर, कांग्रेस का कहना है कि भारत में ग़रीबी की मौजूदा स्थिति को देखते हुए सामाजिक क्षेत्र पर होने वाले बड़े ख़र्च से बचा नहीं जा सकता है.

अपने कार्यकाल के अंतिम वर्षों में अटल बिहारी वाजयेपी की सरकार ने वित्तीय और राजस्व घाटे को नियंत्रित करने के लिए एक कानून बनाया था, लेकिन कांग्रेस ने उस पर अमल नहीं किया.

मोदी संकेत दे चुके हैं कि सामाजिक क्षेत्र पर होने वाले ख़र्च को लेकर वो अलग राय रखते हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक इसे स्पष्ट तौर पर ख़ारिज नहीं किया है.

तीसरी समस्या है ऐसे कानून बनाने की जो अर्थव्यवस्था को फलने-फूलने के पूरे मौक़े दे, जिस पर मोदी बहुत ज़्यादा ज़ोर देते हैं.

वो साफ़ कहते हैं कि वो कारोबारियों के हितों वाली नीतियों के समर्थक हैं. लेकिन दिल्ली में समस्या ये रही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ऐसे क़ानूनों पर अपने सहयोगियों को भरोसा दिलाने में कामयाब नहीं रहे हैं.

एक मुद्दा ये भी है कि भाजपा ख़ुद सैद्धांतिक रूप से ऐसे कुछ सुधारों के ख़िलाफ़ है, जिसमें खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश भी शामिल है.

सामाजिक क्षेत्र

अर्थव्यवस्था को छोड़ दें तो भारत की समस्याएं ढांचागत ज़्यादा हैं. मिसाल के तौर पर स्वास्थ्य और शिक्षा को राष्ट्र की तरफ से होने वाले खर्चे में पर्याप्त हिस्सेदारी मिलती है, लेकिन इन क्षेत्रों में दिखने वाली उपलब्धियां बहुत कम हैं.

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Image caption आर्थिक गिरावट काफ़ी समय से सरकार के लिए सिर दर्द बनी हुई है

गुजरात समेत पूरे देश में इन क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं को जिस तरह से लागू किया जाता है, उसकी गुणवत्ता भी बहुत अच्छी नहीं है. गुजरात के अस्पतालों और स्कूलों की हालत भी देश के बाक़ी राज्यों के मुक़ाबले बेहतर नहीं कही जा सकती है.

किसी भी सरकार के लिए इस स्थिति को चंद वर्षों में ठीक करना संभव नहीं होगा.

विदेश नीति

विदेश नीति की जहां तक बात है तो मोदी को पाकिस्तान और चीन के बारे में अपना रुख़ नरम करना होगा. इस बारे में अब तक उनकी यही राय सामने आई है कि भारत अपने रुख़ को जितना सख़्त करेगा, पड़ोसियों से उतने ही बेहतर तरीके से निपट पाएगा.

अगर इसे सही मान भी लिया जाए तो संसाधनों का सवाल उठता है. भारत इस मोर्चे पर चीन से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता है.

बेशक वाजपेयी सरकार के दौरान भी भारत का रक्षा बजट पाकिस्तान से ज्यादा था लेकिन एनडीए सरकार में उन लोगों के हाथ बांध दिए गए थे जो सोचते थे कि भारत विरोधी चमरपंथियों को ट्रेनिंग देने और उन्हें सीमा के पास तैनात करने के लिए पाकिस्तान को सबक सिखाया जाना चाहिए.

ये ऐसी कुछ समस्याएं हैं, जिनका सामना मोदी को केंद्र में सत्ता संभालने की स्थिति में तुरंत करना होगा.

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