उत्तर प्रदेश के 'रणक्षेत्र' में नरेंद्र मोदी

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भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के चुनावी अभियान पर इन दिनों जितनी बातें गुजरात में होती होंगी शायद उससे कम उत्तर प्रदेश में भी नहीं.

जब से भाजपा ने खुल कर मोदी की प्रधानमंत्री उम्मीदवारी पर सहमति जता दी है, तभी से इस प्रदेश में अटकलों का बाज़ार गर्म है. वजह भी एक नहीं अनेक हैं.

देश का प्रधानमंत्री देने में उत्तर प्रदेश का आज़ादी के बाद से ही लंबा योगदान रहा है.

'शंखनाद'

भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जब केंद्र में सरकार बनी तब अटल के अलावा भाजपा ने पूरे राज्य में सबसे ज्यादा सीटें जीतीं थीं.

उत्तर प्रदेश में देश की सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें हैं.

पार्टी में, इसीलिए, कुछ को लगता है कि मोदी को 26 सीटों वाले गुजरात के बजाय यूपी से शंखनाद करना चाहिए.

जब से भाजपा ने मोदी के क़रीबी अमित शाह को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया है तब से अटकलें और तेज़ होती चली गई हैं.

प्रदेश में कुछ बड़े भाजपा नेताओं का ये भी मत है कि यूपी से मोदी के खड़े होने में पड़ोसी बिहार की सीटों पर भी असर पड़ेगा.

यूपी से होकर जाता रास्ता

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Image caption राजनाथ सिंह मोदी की चुनावी रैलियों में भीड़ से खुश होंगे क्योंकि कहते है कि दिल्ली में सरकार बनाने का रास्ता यूपी से हो कर जाता है.

बात अगर प्रदेश में मोदी के असर की है, तो उनकी चुनावी रैलियों में भीड़ मज़े की देखी गई है.

ख़ुद भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह इस बात से ख़ुश होंगे क्योंकि कहते हैं कि दिल्ली में सरकार बनाने का रास्ता यूपी से हो कर जाता है.

हालांकि गोरखपुर और मेरठ में रैलियों में पहुंचे लोगों की तादाद बहुत थी, लेकिन इन सभी को वोटों में तब्दील करने की चुनौती अब भाजपा की है.

ख़ुद मोदी को भी इस बात का एहसास हो चला लगता है और इसीलिए वे प्रदेश पर ख़ासा ध्यान दे रहे हैं.

उन्होंने लगातार भाजपा को प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस का विकल्प बताया है और इन सभी पार्टी के नेताओं पर तीखी टिप्पणियां भी की हैं.

एक तरफ़ उन्होंने प्रदेश के लोगों को गुजरात में हुए 'विकास' के सपने दिखाए हैं और दूसरी तरफ़ भाजपा के शासन के तहत प्रदेश को सांप्रदायिक हिंसा से मुक्त करने के भी दावे किए हैं.

लड़े कहाँ से?

भाजपा जानकारों का मत है कि मोदी के उत्तर प्रदेश से लड़ने पर विभिन्न राय है.

कुछ का कहना है कि मोदी को अटल बिहारी के पूर्व चुनाव क्षेत्र लखनऊ से लड़ना चाहिए, जिससे उनके क़द्दावर होने का संकेत जा सके.

चिंता सिर्फ़ इस बात को लेकर है कि लखनऊ में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या काफ़ी है.

Image caption भाजपा की 'सेफ़ सीट' वाराणसी पर फिलहाल मुरली मनोहर जोशी विराजमान हैं

इसके अलावा इस चुनाव क्षेत्र में ब्राह्मण, कायस्थ और ठाकुर मतदाताओं की तादाद को भी नकारा नहीं जा सकता.

तो अगर दूसरी पार्टियों ने इन वर्णों के उम्मीदवार उतार दिए तो वोट कटने का ख़ासा डर रहेगा.

जिस दूसरी सीट के लिए मोदी का नाम लिया गया है वो है वाराणसी, जिसे भाजपा की 'सेफ़ सीट' भी कहा जाता है.

हालांकि वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी इस सीट पर फ़िलहाल विराजमान हैं.

लेकिन कुछ लोगों की राय है कि अगर मोदी वाराणसी से उतरे तो पूर्वी उतर प्रदेश समेत बिहार में भी भाजपा को बढ़त मिल सकती है.

इन सभी क़यासों के बीच भाजपा में एक ऐसा भी 'थिंक टैंक' बताया जाता है जिसे लगता है कि नरेंद्र मोदी के गुजरात छोड़ दूसरी जगह से लड़ने को गुजरात के भाजपा मतदाता शायद पचा न सकें.

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