क़ानून नहीं, कांग्रेस की खींचतान में फंसा तेलंगाना

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आंध्र प्रदेश विधानसभा में तेलंगाना मुद्दे पर जो मतदान हुआ है उसका कोई अर्थ नहीं है. इसमें किसी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन हुआ ही नहीं है.

राज्यों के विभाजन को लेकर संवैधानिक प्रावधान बिल्कुल स्पष्ट हैं. इसकी सारी शक्ति केंद्र सरकार या लोकसभा के पास हैं. राज्य विधानसभा के पास कोई शक्ति है ही नहीं.

और अगर आप यह सोचते हैं कि आंध्र प्रदेश विधानसभा तेलंगाना के पक्ष में कभी मतदान कर सकती है तो यह बिल्कुल ग़लत कयास है क्योंकि तेलंगाना के विधायकों की संख्या बहुत कम है और सीमांध्र के विधायकों की संख्या ज़्यादा है.

संविधान में बस यह कहा गया है कि जब आप राज्य का विभाजन करेंगे तो उसे राज्य विधानसभा में विचार के लिए भेज सकते हैं लेकिन उसमें मतदान की कोई बात नहीं है और उनकी राय का भी महत्व नहीं है.

इसलिए आंध्र विधानसभा का यह प्रस्ताव कि उन्हें विभाजन नहीं चाहिए, का कोई क़ानूनी महत्व नहीं है और कम से कम इसलिए तो राज्य विभाजन रुकना नहीं चाहिए.

कांग्रेस की मुश्किल

कांग्रेस की दिक़्क़त यह है कि कांग्रेस पार्टी का जो हाईकमान है वह हाईकमान रह नहीं गया है. सारे भारत में उनकी बातें सुनी ही नहीं जाती हैं.

दरअसल यह सोनिया गांधी की कांग्रेस है, इंदिरा गांधी की नहीं. जिस मुख्यमंत्री को उन्होंने नियुक्त किया था, वह उनके ही ख़िलाफ़ खड़ा हो गया.

इसलिए कांग्रेस अपने ही सुझाव पर अमल नहीं कर पा रही. अब वह भाजपा पर सहयोग पर निर्भर है. भाजपा समर्थन करे तो तेलंगाना विधेयक पास हो.

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हालांकि भाजपा जनसंघ के समय से ही तेलंगाना के समर्थन में है लेकिन भाजपा कांग्रेस की अंदरूनी मुश्किल से उसे बाहर निकालने में मदद कैसे कर सकती है.

क्योंकि भाजपा तेलंगाना का विरोध नहीं कर सकती, इसलिए कह रही है आप दूसरे इलाक़े (सीमांध्र) के लोगों की चिंताओ को दूर करिए फिर हम तेलंगाना का समर्थन करेंगे.

इसका मतलब यह है कि संसद के इस आख़िरी सत्र में तेलंगाना विधेयक का पास होना मुश्किल लग रहा है.

मुख्यमंत्री की चुनौती

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने दिल्ली में धरना तो अब दिया है लेकिन वह पिछले दो-तीन महीने से हैदराबाद से ही केंद्र सरकार को, कांग्रेस हाईकमान को चुनौती दे रहे थे. उनके ख़िलाफ़ बयान दे रहे थे.

लेकिन कांग्रेस ने कुछ नहीं किया उनके ख़िलाफ़. इसका मतलब यह है कि कांग्रेस हाईकमान अपने विद्रोही नेता के ख़िलाफ़ कोई क़दम उठाने में असमर्थ है.

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ऐसे में नहीं लगता कि कांग्रेस किरण कुमार रेड्डी को पार्टी से निकाल सकती है.

और मान लेते हैं कि अगर पार्टी उन्हें निकाल देती है तो यह उनके लिए अच्छा ही होगा. दरअसल वह तो चाहते ही हैं कि कांग्रेस हाईकमान उन्हें बाहर निकाल दे, मुख्यमंत्री पद से हटा दे- फिर वह सीमांध्र में बहुत बड़े हीरो बनकर उभरेंगे.

दरअसल दो-तीन महीने पहले जब उन्होंने बाग़ी तेवर दिखाने शुरू किए थे पार्टी को तभी उन्हें बाहर निकाल देना चाहिए था.

लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसे डर था कि रेड्डी के साथ बहुत से विधायक भी पार्टी से निकल जाएंगे. विधायक रेड्डी के साथ चले जाएंगे तो सरकार गिर जाएगी और कांग्रेस दोबारा सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाएगी.

ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाना होगा और कांग्रेस को सलाह दी गई गई थी कि राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य का विभाजन नहीं किया जा सकता. इसलिए कोई न कोई सरकार तो राज्य में होनी ही चाहिए.

स्पष्ट विभाजन

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कांग्रेस की मुश्किल यह है कि राज्य में सीमांध्र और तेलंगाना में विभाजन बहुत स्पष्ट है. पार्टी की दूसरी-तीसरी-चौथी पंक्ति के भी नेता इस मसले पर रेड्डी के ही साथ है. इसलिए वह रेड्डी को हटाकर सरकार बनाए नहीं रख सकती.

तेलंगाना के नेता उप मुख्यमंत्री दामोदर राज नरसिम्हा के साथ हैं. तेलंगाना के विधायकों की संख्या कम है और उन्हें लेकर कांग्रेस सरकार नहीं बना पाती. वैसे भी अब बहुत देर हो चुकी है, अब चुनावों का वक़्त आ गया है.

अगले चुनावों में कांग्रेस को आंध्र में भारी नुक़सान होने जा रहा है. वैसे आंध्र हमेशा से कांग्रेस का गढ़ रहा है. और तो और आपातकाल के बाद भी आंध्र से कांग्रेस को बहुत सी सीटें मिली थीं. ख़ुद इंदिरा गांधी 1978 में हैदराबाद के नज़दीक मेढक सीट से जीती थीं.

लेकिन आज ऐसी स्थिति है कि उन्हें 42 सीट में से दो-तीन सीट से ज़्यादा शायद ही मिल पाए और सीमांध्र में तो शायद कांग्रेस को एक भी सीट न मिले.

इन चुनावों में सीमांध्र में तेलुगुदेशम और जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के बीच ही मुक़ाबला है.

दोनों तरफ़ हार?

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अगर कांग्रेस आंध्र प्रदेश का बंटवारा कर देती है तो वह तेलंगाना क्षेत्र में नायक बनकर उभरेगी और टीआरएस के साथ मिलकर सारी सीट ले लेगी.

लेकिन सीमांध्र में उनके हाथ एक भी सीट नहीं लगेगी. फिर भी तेलंगाना राज्य उनके हाथ में होगा.

अब अगर आप बंटवारा नहीं करते हैं तो सीमांध्र में वैसे भी आपको शून्य ही हासिल होगा क्योंकि वहां लोग जान गए हैं कि आप राज्य का विभाजन करना चाहते थे.

और तेलंगाना में भी आपको ज़्यादा सीट नहीं मिलेंगी क्योंकि लोग कहेंगे कि आपने राज्य बनाया नहीं आप सिर्फ़ बोलते रहते हैं.

दूसरे शब्दों में कांग्रेस पार्टी के लिए आंध्र में दोनों तरफ़ हार ही है.

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