भारतीय खेल संघों पर वंशवाद का दंश

  • 12 फरवरी 2014
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वंशवाद हमेशा से भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है. राजनीति, कला, संगीत या खेल – किसी भी क्षेत्र को देखें तो उसका संबंध परिवार या वंश से होगा और इसे भारतीय संस्कृति की ख़ूबी भी कहा जाता रहा है. राजा रजवाड़ों या परिवारों ने जनता के हित में काम भी किया और जनता या प्रजा बड़े अदब से इनका नाम लेती थी.

संगीत में ग्वालियर घराना और किराना घराना के वंशजों को पूजा जाता रहा है. राजनीति में भी पंडित मोती लाल नेहरू के बाद जवाहर लाल का नाम भी अदब से लिया जाता था.

कुछ इसी तरह से खेलों में था. भारतीय खेलों में पटियाला घराने का विशेष स्थान रहा है. होल्कर, बरोडा, रंजी, अलवर और टाटा परिवारों के नाम खेलों से जुड़े रहे हैं.

शक की नज़र

लेकिन समय के साथ इन परिवारों पर तत्कालीन सामाजिक बुराईयों का असर पड़ने लगा और आज स्थिति यह है कि वर्तमान वंशजों को शक की नज़र से देखा जाता है.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण है हाल में दो भाई – एन श्रीनिवासन और एन रामचंद्रन का खेलों के दो उच्च पदों पर आसीन होना.

पहले श्रीनिवासन ने विश्व क्रिकेट की कमान संभाली और फिर एक दिन बाद उनके छोटे भाई 65-वर्षीय रामचंद्रन को निर्विरोध भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष चुन लिया गया. लेकिन दोनों ही विवादों में घिरे हैं.

जस्टिस मुदगल समिति ने श्रीनिवासन के दामाद मेयप्पन को मैच फ़िक्सिंग के मामले में दोषी पाया है तो रामचंद्रन पर 2006 के एशियाई खेलों में स्क्वॉश मैचों में फ़िक्सिंग के आरोप हैं.

मीडिया में छपी ख़बरों के अनुसार उस समय एशियन स्क्वॉश फ़ेडरेशन के अध्यक्ष की हैसियत से उन्होंने प्रतियोगिता के ड्रॉ में दख़लअंदाज़ी कर के सौरव घोषाल को कांस्य पदक दिलवाने में मदद की और जबकि स्क्वॉश ओलंपिक स्पर्धा ही नहीं है.

उनका भारतीय ओलंपिक संघ का प्रेसिडेंट होना भी थोड़ा अटपटा लगता है.

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इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल)-6 में सट्टेबाज़ी और स्पॉट फ़िक्सिंग की जांच कर रही जस्टिस मुकुल मुदगल समिति की रिपोर्ट से बीसीसीआइ अध्यक्ष तथा चेन्नई सुपरकिंग्स (सीएसके) के मालिक एन श्रीनिवासन और उनके दामाद गुरुनाथ मेयप्पन पर शिकंजा कस गया है.

सट्टेबाज़ी का आरोप

समिति ने माना है कि सीएसके के अधिकारी मेयप्पन आइपीएल मैचों के दौरान सट्टेबाज़ी में लिप्त थे.

मुकुल मुदगल की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है. इसमें कहा गया है कि टीम के अधिकारी के रूप में मेयप्पन की भूमिका सट्टेबाज़ी तथा सूचना लीक करने के आरोप में साबित हुए हैं.

जांच समिति ने कहा कि फ़िक्सिंग के आरोपों की आगे जांच की आवश्यकता है. समिति के अन्य सदस्यों में अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल एन नागेश्वर राव और असम क्रिकेट संघ के सदस्य नीलय दत्ता शामिल हैं.

मेयप्पन के सिर्फ़ क्रिकेट प्रेमी होने के श्रीनिवासन का दावा ठुकराते हुए समिति ने रिपोर्ट में कहा है कि समिति की राय है कि रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री से स्पष्ट संकेत मिलता है कि मेयप्पन ही सीएसके का चेहरा और इस टीम के अधिकारी थे.

समिति ने माना है कि बीसीसीआई प्रमुख के पद पर श्रीनिवासन के रहने और आईपीएल फ्रेंचाइज़ी के मालिकाना हक़ पर हितों का टकराव एक गंभीर मामला है. अदालत द्वारा इस पर विचार किए जाने की ज़रूरत है.

जस्टिस मुदगल की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी ने कहा की "यह देखकर ख़ुशी हुई कि मुदगल समिति ने उस चीज़ की पुष्टि की है जो मैं कहता आया हूं. इससे जुड़े सभी लोगों पर आजीवन प्रतिबंध ज़रूरी है. मुझे लगता है कि क्रिकेट के भविष्य के बादशाह के रूप में श्रीनिवासन की जीत काफ़ी अल्प समय की रही.समय आ गया है कि क्रिकेट जगत जाग जाए और वैश्विक क्रिकेट को अपने क़ब्ज़े में लेने वाली इंडिया सीमेंट टीम को दफ़न कर दे."

उधर भले ही अंतरराष्‍ट्रीय ओलंपिक महासंघ ने भारत पर से प्रतिबंध हटा लिया हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय ओलंपिक संघ के नए अध्यक्ष का दामन पाक साफ़ नहीं है. रामचंद्रन के ख़िलाफ़ तीन केस अभी भी दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहे हैं.

उनके ऊपर इल्ज़ाम है कि उन्होंने 2011 में राष्‍ट्रीय खेल पुरस्कार लेने के लिए खेल मंत्रालय को ग़लत जानकारी दी. इसके ख़िलाफ़ दिल्ली हाईकोर्ट में दायर हुई याचिका की सुनवाई 21 फ़रवरी को है.

रामचंद्रन के ऊपर यह भी आरोप है कि उन्होंने दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भारतीय स्क्वॉश टीम के कैंप के लिए खेल मंत्रालय से मिलने वाली राशि से पैसा हड़पा है.

खेलों को बढ़ावा

Image caption ललित मोदी ने मुदगल समिति की रिपोर्ट पर ख़ुशी ज़ाहिर की

अगर भारतीय ओलंपिक संघ के इतिहास पर नज़र डाले तो पता चलेगा कि राजघरानों और बिज़नेस घरानों ने खेलों को बिना लालच के बढ़ावा दिया. 1927 में भारतीय ओलंपिक संघ की स्थापना में टाटा परिवार का बड़ा हाथ था.

संघ के पहले अध्यक्ष भी दोराब जी टाटा थे. उसके बाद भारत में चोटी के खिलाड़ी जैसे टी सी योहानन्न, सुरेश बाबू, जगराज सिंह और बहादुर सिंह इत्यादि ने टाटा की कपनियों में काम करते हुए परंपरा को ज़िंदा रखा जो आज भी टाटा फ़ुटबॉल और आर्चरी अकादमी के रूप में क़ायम है.

दोराब जी के बाद पटियाला के महाराजा भूपींदर सिंह ने 1928 में भारतीय ओलंपिक संघ की बागडोर संभाली. और जब 1938 में उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ा तो उनके बड़े बेटे यदविंदर सिंह को अध्यक्ष चुना गया. भूपींदर सिंह का खेलों से विशेष लगाव रहा. वह खुद अच्छे क्रिकेट खिलाड़ी थे और 1911 में उन्होंने बतौर कप्तान भारतीय क्रिकेट टीम का इंग्लैंड दौरे में नेतृत्व किया था. लाला अमरनाथ जैसे खिलाड़ी उसी पटियाला घराने की देन हैं.

पोलो को भारत में ज़िंदा रखने में अलवर घराने का योगदान कोई नहीं भुला सकता और यह कहना ग़लत ना होगा कि आज की भारतीय शूटिंग की नींव बीकानेर के महाराजा करनी सिंह ने ही रखी थी.

'कारनामें'

भले ही परिवारों का, राज रजवाड़ों का भारतीय समाज में अहम रोल रहा हो लेकिन ये विवादों में तो रहे ही हैं. जहां एक ओर पटियाला घराने ने खेलों को प्रोत्साहित किया वहीं उनके रंगीन मिजाज़ी के चर्चे भी कम नहीं हैं. शिमला के नज़दीक चहल में दुनिया का सबसे ऊँचा क्रिकेट मैदान उतना ही मशहूर है जितना शिमला का स्कैंडल पॉइंट.

मोती लाल नेहरू और जवाहर लाल के बाद इंदिरा गाँधी पर भी तरह तरह के इल्ज़ाम लगते रहे हैं और उनके बाद राजीव गाँधी और अब राहुल गाँधी का नाम उतने अदब से नहीं लिया जाता जितना मोती लाल या जवाहर लाल नेहरू का.

इस तरह महाराजा भूपींदर के बाद जब उनके छोटे बेटे भलेन्द्र सिंह को 1960 में भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष चुना गया तब तक तो ठीक था लेकिन बाद में उनका विरोध शुरू हुआ और फिर उनके बेटे रणधीर सिंह पर भी कम इल्ज़ाम नहीं लगे हैं.

ऐसा नहीं है कि इन परिवारों या राजा महाराजों पर आज ही सवाल उठ रहे हैं. पहले भी यह लोग विवादों में थे. लेकिन तीन या चार दशक पहले ना तो मोबाइल फ़ोन था ना ही इंटरनेट, ट्विटर और स्टिंग ऑपरेशन. इसलिए प्रजा ने इन लोगों के काम की बात तो की लेकिन 'कारनामों' पर पर्दा डाले रखा और आज जब वो पर्दा उठ रहा है तो सबको तकलीफ़ हो रही है.

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