'चौंकाने वाली चाल' से कौन जीतेगा राजनीतिक जंग

  • 13 फरवरी 2014
अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी, राहुल गाँधी

पानीपत में जब 1526 में इब्राहिम लोदी की एक लाख सिपाहियों वाली विशाल फौज बाबर के दस हज़ार सैनिकों के सामने खड़ी हुई थी, तो उस युद्ध का नतीजा किस के पक्ष में जाएगा इसका अंदाज़ा सबको था.

बाबर की फ़ौज को रौंदने के लिए इब्राहिम लोदी की पहली क़तार में प्रहार कर रहे हाथी ही काफी थे. लेकिन जैसा कि हम जानते हैं, हुआ इसका उल्टा. कुछ ही घंटों में बाबर ने इब्राहिम लोदी की सेना को मात दे दी थी.

(सियासत पर दंगों के दाग़)

इतिहास इस बात का गवाह है कि बाबर के पक्ष में एक अनोखी बात थी और वो थी 'एलिमेंट ऑफ़ सरप्राइज' यानी वो चीज़ जो लीक से हटकर थी.

बाबर को पूरा विश्वास था कि उनके तोपों से निकले बारूदी गोलों का मुक़ाबला करना इब्राहिम लोदी की फौज के लिए असंभव होगा. बाबर का तोपखाना उसके जंगी असलहों में तुरुप का पत्ता था.

राजनीति का मंत्र

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बाबर की बारूदी ताकत के बारे में उनके दुश्मनों को जरा सा भी इल्म नहीं था. ये पूरी तरह से खुफिया थे और बाबर को पता था कि ये तोपें ही उनका सबसे बड़ा हथियार साबित होने वाली हैं और ये भी कि इब्राहिम लोदी की फौज ने इन तोपों को पहले कभी देखा भी नहीं था.

(तीसरे मोर्चे की जरूरत)

लेकिन राजनीति के कुरुक्षेत्र में बाबर की तर्ज पर इस तरह के तुरुप के पत्ते की जरूरत का ख्याल रखने वाले नेता ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते. ऐसा लगता है इस मंत्र को अब तक केवल अरविंद केजरीवाल ही समझ पाए हैं और इसे वो खूब भुना भी रहे हैं.

दिल्ली के चुनावी मैदान में अपने विरोधियों से रूबरू होने से पहले अरविंद केजरीवाल ने इस एलिमेंट ऑफ़ सरप्राइज वाली बात को पूरी तरह से अमली जामा पहनाया और अब आम चुनाव से पहले भी इस पर अमल कर रहे हैं. आज भी वो दो तीन हफ़्तों में कुछ ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं जो उनके विरोधयों को बुरी तरह से चौंका देता है.

मोदी के भाषण

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भारत के विशाल चुनावी अखाड़े में अब तमाम चीजें पुरानी लीक से बंधी हुई दिखाई देती हैं और ऐसे चीजें कम होती हैं, जो हमें चौंकाती हैं. अब तक जो नज़र आता है उसके मुताबिक सब कुछ उम्मीद के मुताबिक नज़र आता है. किसी भी नेता की रणनीति में 'एलिमेंट ऑफ़ सरप्राइज' वाली कोई बात नहीं दिखाई देती.

(मीडिया मोदी का समर्थक?)

अगर भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के अब तक के भाषणों या रैलियों पर निगाह डालें तो महसूस होता है कि वो पहले से लिखी हुई किसी पटकथा के मुताबिक़ चल रहे हैं. मोदी के भाषणो से बार-बार ये पैग़ाम मिलता है कि उन्होंने गुजरात में बहुत अच्छा प्रशासन चलाया है.

और प्रधानमंत्री बनने के बाद वो एक अच्छे प्रशासक साबित होंगे. अगर वो अपने भाषणों में या अपने कामकाज के तौर तरीके में नयापन लाएं तो मतदाताओं में जोश अधिक आ सकता है. उदाहरण के तौर पर पिछले दो महीनों में मोदी एक बार नयापन लाने में उस समय कामयाब रहे जब उन्होंने अपने बचपन में ट्रेनों के अंदर चाय बेचकर गुज़ारा करने की बात कही.

राहुल का इंटरव्यू

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ये एक प्रभावशाली संदेश था, आम जनता को अपनी तरफ लुभाने के लिए. अंग्रेजी मीडिया ने भी इस बात को अपने प्राइम टाइम में भरपूर जगह दी. इसे नरेंद्र मोदी आज भी भुनाने की कोशिश कर रहे हैं. अब इसका असर कम होता नज़र आता है क्योंकि इसमें अब चौंकाने वाली कोई बात नहीं रही.

(केजरीवाल की 'हिटलिस्ट')

इसी तरह कांग्रेस के चुनावी प्रचार के मुखिया राहुल गांधी भी अधिकतर स्क्रिप्ट के अनुसार चलने वाले दिखाई देते हैं. यूपीए सरकार की उपलब्धियों को हर रैली में दुहराते हैं और भ्रष्टाचार को शिकस्त देने की भी बात करते हैं. हालांकि वो भी कभी कभी लोगों को चौंकाने में सफल हुए हैं.

मिसाल के तौर पर जब उन्होंने एक अंग्रेजी टीवी चैनल पर 80 मिनट का इंटरव्यू दिया तो सबको ताज्जुब हुआ क्योंकि पिछले दस साल में उन्होंने इस तरह का इंटरव्यू नहीं दिया था. ये एक साहस भरा और मुश्किल फैसला था लेकिन उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया.

नई रूह की जरूरत

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आज की राजनीति में एलिमेंट ऑफ सरप्राइज़ या नयापन अहम भूमिका निभा सकता है. जब साल 1997 में ब्रिटेन में आम चुनाव का प्रचार शुरू हुआ तो टोनी ब्लेयर ने देश की राजनीति में एक नई ताज़गी लाने का बीड़ा उठाया जिसमें उन्हें बहुत कामयाबी मिली. वहाँ के मतदाता सत्तारूढ़ टोरी पार्टी के पुराने अंदाज़ की सियासत से थक चुके थे.

(राहुल के बयान पर भड़की भाजपा)

टोनी ब्लेयर की लेबर पार्टी भी जनता के सामने एक थकी हुई पार्टी थी. टोनी ब्लेयर जब इसके अध्यक्ष बने तो उन्होंने अपनी पार्टी में एक नई जान डाल दी. कामयाबी ने उनके कदम चूमे. लेकिन चुनावी विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का नयापन अकेले काफी नहीं होता है. इसके साथ साथ एक सुनियोजित रणनीति भी ज़रूरी है.

बाबर ने अकेले अपने तोपों पर भरोसा नहीं किया था. उसने एक ज़बरदस्त सैन्य रणनीति तैयार की और जिसे बेहतरीन तरीक़े से अमली जाम पहनाया गया था. टोनी ब्लेयर ने भी चुनाव में जो भारी जीत पाई थी उसका कारण केवल सियासत में ताज़गी नहीं था. उनके पास एक सोची समझी योजना थी.

उन्होंने टोरी पार्टी के मुद्दों को सोशलिस्ट कवर देकर उन्हें अपना लिया था और उसे एक नया मंत्र बना कर जनता के सामने पेश किया था. जनता ने उसे बहुत पसंद किया था. कांग्रेस पार्टी के अंदर बुज़ुर्ग नेताओं का ये विचार है कि पार्टी अब थक चुकी है. मणिशंकर अय्यर कहते हैं कि इस में नई रूह फूकने की ज़रुरत है.

फायदा 'आप' को!

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आम आदमी पार्टी कांग्रेस से कहीं छोटी है लेकिन उसकी नाक में दम करने में अब तक सफल रही है. भारतीय जनता पार्टी भी 'आप' से किस तरह से जूझे, ये ठीक से समझ नहीं पा रही है.

दोनों पार्टियों को अंदाज़ा नहीं था कि केजरीवाल सरकार बनाने से पहले दिल्ली की जनता के बीच जाएंगे. उन्हें ये भी अहसास नहीं था कि केजरीवाल दिल्ली पुलिस के खिलाफ सर्दियों वाली रात में सड़क पर धरना दे सकते है.

अब वो इस बात से भी हैरान हैं कि केजरीवाल भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल बिल आम जनता के बीच एक स्टेडियम में पारित कराने पर तुले हुए हैं. दोनों पार्टियों के पास केजरीवाल के काट के लिए नई रणनीति नहीं हुई तो बहुत संभव है कि इसका फायदा केवल 'आप' को होगा.

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