एक मिशन, जिससे जुड़ा है 'मीनल का सपना'

भारत के मंगल ग्रह मिशन से जुड़ी एक सिस्टम इंजीनियर मीनल संपत एक बिना खिड़की वाले कमरे में लगातार दो साल तक देश की सबसे महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष परियोजना को पूरा करने में लगी रहीं. उन्होंने परियोजना को तेज़ी से पूरा करने के लिए एक दिन में 18-18 घंटे तक काम किया.

वह कहती हैं, "हमारे पास एक शानदार टीम थी और हमारे बीच एक आपसी समझ थी कि निर्धारित तारीख़ से पहले काम पूरा कर लेना है क्योंकि लाँच की तारीख़ पहले से निर्धारित थी और हम इस अवसर को खोना नहीं चाहते थे."

आखिर वह दिन पिछले साल के पाँच नवंबर को आ ही गया जब मंगल ग्रह मिशन ग्रीनविच समय के अनुसार नौ बजकर आठ मिनट पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित हुआ.

इसके साथ ही भारत दुनिया के उन कुछ चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जिनके पास इस तरह की मिशन पूरा करने की क्षमता है.

इससे पहले रूस, अमरीका, ब्रिटेन, जापान और चीन यह उपलब्धि हासिल कर चुका है. अभी तक पूरे हुए 40 अभियानों में आधे से कम ही सफल हो पाए हैं.

'औरतें सोचें कि मैं कर सकती हूं'

अगर भारत का मंगल मिशन मंगल ग्रह पर पहुंचता है तो यह सफल अभियान पूरा करने वाले कुछ देशों की सूची में शामिल हो जाएगा. अभी तक केवल अमरीका, रूस, और यूरोप यह कर पाए हैं.

मीनल के लिए इस परियोजना पर काम करना किसी सपने के सच होने की तरह है.

वह बताती हैं, "मैंने जब पहली बार टीवी पर लाँच का लाइव प्रसारण देखा तब मैं प्राइमरी स्कूल में थी. उसी वक़्त मेरे दिमाग़ में आया कि अगर मैं कुछ इस तरह का काम करती हूं तो कितना अच्छा रहेगा, और आज मैं यहां हूं."

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वे उन 500 वैज्ञानिकों में शामिल हैं जिन्होंने इस परियोजना पर काम किया है. इसकी घोषणा क़रीब 15 महीने पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी.

मीनस संपत और उनकी टीम ने अंतरिक्ष यान के लिए तीन उपकरण बनाएं जो यान के क्रियान्वयन में सहायक होंगे.

पहला उपकरण इंफ्रारेड कैमरा है जो उष्मा के स्रोतों की पहचान करता है और दूसरा उपकरण वातावरण में जीवन के संकेतक के रूप में मिथेन गैस का पता लगाएगा.

मीनल कहती हैं, "मैंने यान के लाँच से दो साल पहले शनिवार और रविवार की छुट्टियों को अलविदा कह दिया. हम कभी-कभी 18-18 घंटे कम कर रहे थे."

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी में काम कर रही मीनल कहती हैं कि काम के दौरान उन्हें कभी ये अहसास नहीं हुआ कि औरत होने की वजह से उनसे किसी तरह का भेदभाव हुआ हो.

वह हंसते हुए बताती हैं कि शायद इसका कारण यह हो कि काम की जगह साफ सुथरा कमरा होती है, जहां लोग काम के वक़्त पूरे सूट पहने होते हैं जिसकी वजह से पता ही नहीं चलता कि कौन मर्द है और कौन औरत.

हालांकि प्रोजेक्ट पर काम कर रहे 10 वैज्ञानिकों में वे इकलौती महिला हैं.

वो कहती हैं कि वो चाहती हैं कि आने वाले दिनों में इस तरह के कामों में औरतों की हिस्सेदारी बढ़नी चाहिए.

वो कहती हैं, "मैं चाहती हूं कि महिलाएं यह सोचे कि वह यह काम कर सकती हैं."

परिवार से दूर

सितंबर में यान ग्रह पर पहुंच जाएगा जिसके बाद अभी 'सुसुप्त' अवस्था में मौजूद उपकरण फिर से काम करने को तैयार हो जाएंगे जिसका अर्थ होगा मिशन से जुड़े लोगों ख़ासतौर पर वैज्ञानिकों को अधिक से अधिक वक़्त परिवार से दूर गुज़ारना होगा.

वो कहती हैं, "यह मुझे बीमार बेटे से दूर रहने पर मजबूर कर देता है, जब उसे मेरी ज़रूरत होती है, मुझे उसकी देखभाल करनी चाहिए, मैं बैंगलोर में किसी सिस्टम की मरम्मत कर रही होती हूं."

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हालांकि वह अपने आप को लेकर आश्वस्त है कि जो वह कर रही है सही है. वह जोर देकर कहती हैं कि "यह सब इस पर निर्भर करता है कि आप अपने जीवन के बारे में क्या सोचते हैं."

वह बताती हैं, "आप जो पाना चाहते हैं उसके लिए आपको सपने देखना होगा. ये केवल आप पर निर्भर है कि आप अपने जीवन के तौर तरीक़ो को कैसे तय करते हैं."

प्रेरणा के संदेश

वो एक संयुक्त परिवार का हिस्सा हैं जिसकी वजह से बहुत सारी ज़रूरतों के लिए उन्हें फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं होती. ज़्यादा वेतन उनके लिए बहुत मायने नहीं रखता और ये वजह नहीं होगी उनके विदेश जाने की.

क्या भारत को मंगल मिशन पर 7.3 करोड़ डॉलर जैसी रक़म ख़र्च करना चाहिए जब देश में इतने लोग ग़रीबी की हालत में रह रहे हों इस पर मीनल कहती है कि ये मिशन देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है.

वो कहती हैं, "ये किसी भूखे को भोजन मुहैया नहीं करवा सकता लेकिन उसे इस बात पर गर्व हो सकता है कि देखो हमारा मुल्क कहां है, ये लोगों की सोच के दायरे को बड़ा करता है."

और वो ये ध्यान दिलाना नहीं भूलती कि भारत के मंगल मिशन का बजट हॉलीवुड की एक औसत फ़िल्म से भी कम है.

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