'पाताल में संसद, रसातल में संसदीय मूल्य'

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विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की संसद में बीते गुरुवार जो अप्रत्याशित घटनाक्रम देखने को मिला, वह वास्तव में भारतीय संसद का पतन काल है.

पिछले कुछ दशकों में संसद में हुई कई दुखद घटनाओं और परेशान करने वाले प्रसंगों और हफ़्तों तक ठप रहने वाले संसद के सत्रों के बावजूद कभी भी इतना शर्मनाक और इतना चौंकाने वाला वाकया संसद में नहीं हुआ था.

दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश के एक सांसद, जो केंद्र में सत्ताधारी गठबंधन की धुरी कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं, मिर्च स्प्रे संसद में ले आए और इसके इस्तेमाल को 'आत्मरक्षा में उठाया क़दम' बताकर अपने काम का बचाव किया.

आंध्र प्रदेश के ही एक विपक्षी सांसद ने कथित रूप से चाकू लहराया. हालांकि वे आरोपों को नकार रहे हैं लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अध्यक्ष का माइक छीनने की कोशिश हुई.

इस घटनाक्रम में कई सांसदों की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें हड़बड़ी में बुलाई गई एंबुलेंसों से अस्पताल पहुंचाया गया, जबकि सुरक्षाबलों की गाड़ियाँ संसद को घेरे रहीं. सभी दलों के सदस्यों ने इस घटनाक्रम को भारतीय लोकतंत्र पर एक 'काला धब्बा' बताया है.

भले ही सांसद इस घटनाक्रम की आलोचना में कितने ही गंभीर क्यों न हों लेकिन यह कहीं न कहीं पाखंड भी है. ऐसे में संसदीय मूल्यों का पतन अपरिहार्य हो चला है.

लेकिन सवाल यह है कि ऐसा क्या हुआ कि संसदीय मूल्य अचानक पाताल में पहुँच गए? दरअसल यह तेलंगाना के गठन की मांग को लेकर होने वाली राजनीति की उपज थी.

उम्मीद बेमानी

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Image caption मिर्ची स्प्रे के कारण कई सांसदों को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा.

बीते बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष के छह अड़ियल सांसदों को पार्टी से निलंबित किए जाने से पहले इनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई. निलंबन ने इन सासंदों को संसद में और भी उपद्रवी बना दिया. गुरुवार को संसद में हिंसा के बाद लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने आंध्र प्रदेश के 17 सांसदों को सदन की सदस्यता से निलंबित कर दिया.

व्यावहारिक रूप से क्रियाहीन हो चुकी संसद में सुधार की उम्मीद करना ही बेमानी है. इसका कारण यह है कि मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी और अन्य क्षेत्रीय पार्टियां उपद्रवी सांसदों को संसद से बाहर फेंकने के लिए मार्शलों के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ हैं.

गुरुवार को सदन में मिर्ची स्प्रे के इस्तेमाल और एक सदस्य के पास चाकू होने के शक के बाद जब संसद की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सँभाल रहे अधिकारियों ने कहा कि उनके पास सांसदों की सुरक्षा जाँच करने की अनुमति होनी चाहिए तो दोनों सदनों के तमाम सदस्यों ने साफ़ इनकार कर दिया.

संसद का सवाल

एक वो भी दौर था जब भारत की संसदीय परंपरा नए आज़ाद हो रहे तीसरी दुनिया के अन्य देशों के लिए अनुकरणीय उदाहरण थी. उस दौर की तुलना में भारतीय संसद कहाँ पहुँच गई है?

यह 'राष्ट्रीय बहस की सबसे बड़ी परिषद' की तरह सुचारू रूप से काम करती थी जिसमें भारी बहुमत वाली नेहरू सरकार बेहद छोटे विपक्ष के विचारों का पूरा सम्मान करती थी. नेहरू स्वयं संसद की सर्वोच्चता का बखान करते थे. यह दुख की बात है कि संसदीय मूल्यों के इस पतन की शुरुआत उनकी बेटी इंदिरा गांधी की सरकार के समय में ही हुई.

इसके दो कारण हैं. पहला यह कि अपने नेतृत्व के शुरुआती दौर में इंदिरा गांधी अनुभवहीन थीं और भाषण देने में पारंगत नहीं थीं. ऐसे में सांसदों के कुछ गुट उनके प्रति तुच्छ व्यवहार करते थे और उन्हें 'गूंगी गुड़िया' तक पुकारा जाता था.

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दूसरा कारण रहा उनके सहयोगियों का भ्रष्टाचार, जिस पर उनकी सरकार ने पर्दा डाल रखा था. इसी ने संसद में विपक्ष के विरोध और हंगामे की शुरुआत की. आज किसी को भी तुलमोहन राम का नाम याद नहीं होगा.

पिछली कतार के इस कांग्रेसी नेता का बड़े नेताओं ने पांडिचेरी में धन बनाने में ख़ूब इस्तेमाल किया था, जबकि पांडिचेरी से उनका कोई संबंध भी नहीं था. संसद का कोई सत्र पहली बार तुलमोहन राम के मुद्दे पर ही बर्बाद हुआ था.

इंदिरा के धुर विरोदी और बाद में प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई ने एक बार सदन में ही धरना देने की चेतावनी दी थी. इंदिरा के पास उन्हें समझौते के लिए राज़ी कर लेने की कला थी.

दुख की बात यह है कि वर्तमान शासकों या आने वाले वक़्त के शासकों के लिए यह बात नहीं कही जा सकती है. ऐसे में संसदीय व्यवहार में सार्थक सुधारों की उम्मीद बेहद कम है.

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