वह पांच चीज़ें जिनमें चूक गए राहुल गांधी

  • 16 फरवरी 2014
राहुल गांधी फ़ोटो Image copyright Reuters

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की राह भारतीय राजनीति में कितनी आसान है और कितनी मुश्किल.

ऐसी कौन सी पांच चीज़ें थी जो राहुल को करनी चाहिए थीं, लेकिन वह नहीं कर पाए. कांग्रेस पर '24 अकबर रोड' किताब लिखने वाले रशीद किदवई कांग्रेस के विशेषज्ञ माने जाते हैं.

उन्हीं से जानिए ऐसी पांच चीज़ें जो राहुल गांधी को करनी चाहिए थीं लेकिन वह चूक गए.

सरकार में शामिल होते

राहुल की सरकार में शामिल होने और ज़िम्मेदारी लेने में नाकाबिलियत उनकी पहली बड़ी ग़लती है. राजनीति में एक सांसद से कानून निर्माता की भूमिका निभाने और लोगों की भलाई के लिए काम करने की उम्मीद की जाती है.

कांग्रेस और यूपीए नेता के रूप में, ख़ासतौर पर 2009-14 के दूसरे दौर में, उन्होंने यह स्वर्णिम मौका खो दिया हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें कम से कम आधा दर्जन बार मंत्रिमंडल में शामिल होने का न्यौता दिया.

राहुल प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री बन सकते थे और भारत सरकार के काम करने की दुर्लभ (और बेहद काम की) अंदरूनी जानकारी हासिल कर सकते थे. वह यह समझ सकते थे (और कहीं बेहतर ढंग से) कि "सिस्टम" की दिक्कत क्या है और महिला सशक्तिकरण, युवा अभिलाषाएं, दलितों, अल्पसंख्यकों के लिए बेहतर मौके क्यों अब भी एक सपना ही हैं.

Image copyright AFP

तब वह अंदर रहकर एक ऐसे सुधारवादी के रूप में उन नई राह खोलने वाले विधेयकों को ला सकते थे जिनकी कोशिश जयराम रमेश, नंदन नीलकेणी और दूसरे करते रहे हैं... ढांचागत विकास की ज़िम्मेदारी उनके पास होती तो मजबूती से और तेज़ी से फ़ैसले लिए जा सकते (जैसे कि माधवराव सिंधिया ने भारतीय रेलवे की सूरत बदली और राजेश पायलट ने दूरसंचार क्षेत्र के लिए ज़ोर लगाया).

अगर वह विदेश मंत्रालय में गए होते तो अन्य देशों के बीच भारत की स्थिति बेहतर हुई होती और संभवतः राहुल ने पाकिस्तान और अन्य सार्क देशों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने को गति दी होती. अफ़्रीका, मध्य पूर्व और दूसरे क्षेत्रों में राहुल के नेतृत्व करने का फ़ायदा मिलता. युवा गांधी ने नेहरूवादी विरासत के साथ कुछ न्याय किया होता.

राजीव गांधी का निःशस्त्रीकरण का अधूरा कार्यक्रम अब भी ऊंचे स्तर पर ध्यान देने की मांग कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राहुल का इस मुद्दे पर सशक्त प्रयास उन्हें नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार, जयललिता जैसे मंझे हुए नेताओं के मुकाबले में आगे खड़ा करता.

उत्तर प्रदेश में एक मुद्दा बनना

Image copyright Reuters

राहुल ने उत्तर प्रदेश में 2007 और 2012 के चुनावों में काफ़ी मेहनत की थी लेकिन उसका कोई फ़ायदा नहीं मिला. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अगर राहुल प्रशासन का "सचमुच का अनुभव" लेना चाहते थे तो उन्हें पहले उत्तर प्रदेश की समस्याओं को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए थी.

तर्क यह था कि अगर वह 20 करोड़ लोगों की समस्याओं को सुलझा सकते हैं (दुनिया में सिर्फ़ 5 देशों की जनसंख्या यूपी से ज़्यादा है) तो शायद वह एक अरब से ज़्यादा लोगों की समस्या सुलझाने में सक्षम होते.

यूपी में उनके कामकाज की शैली उन्हें नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे बहुत बेहतर प्रदर्शन करने वाले मुख्यमंत्रियों से मुकाबले में उल्लेखनीय बढ़त दे सकती थी और कांग्रेस को 80 लोकसभा सीटों वाले राज्य में से ठीक-ठाक हिस्सा हासिल करने लायक बना सकती थी.

वह आदमी केजरीवाल हो सकता था!

Image copyright AFP

यूपीए एक और दो के ज़्यादातर समय राहुल की एक बागी और बदलाव का कारण बनने की कोशिशें पूरे दिल से नहीं की गईं और दिखावटी लगीं.

अगर राहुल सचमुच कुछ करना चाहते तो वह कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करने का दबाव डालते, इस बेहद पुरानी पार्टी में संगठनात्मक चुनाव करवाते और असली आंतरिक पार्टी लोकतंत्र लाते.

राहुल और उनकी मां सोनिया की पार्टी पर पकड़ को देखते हुए किसी तरह का विरोध भी नहीं होता. इसके बजाय राहुल ने प्रतीकवाद का सहारा लिया (अध्यादेश को फाड़ा और आदर्श घोटाला रिपोर्ट पर गुस्सा जताया).

वह कांग्रेस के बोझ को कम कर सकते थे, स्वार्थी और आधारहीन लोगों को बाहर कर सकते थे. उन्होंने 2004 में महिला आरक्षण विधेयक और भ्रष्टचार के खिलाफ़ नई राह खोलने वाले दूसरे विधेयकों; जैसे कि व्हिसल ब्लोअर एक्ट, लोकपाल के लिए दबाव क्यों नहीं बनाया, जिनसे आम आदमी पार्टी और टीम अन्ना को पैर जमाने की जगह मिली.

कांग्रेस के अंदर संस्थाओं का गठन करते

Image copyright AP

राहुल कांग्रेस को नाटकीय ढंग से दुरुस्त कर सकते थे, आधुनिक बना सकते थे.

आज के वक़्त में पार्टी के पास अपने विश्वसनीय थिंक टैंक, नेतृत्व संस्था, आंतरिक चुनाव प्रबंधन समिति और तो और एक अच्छा पुस्तकालय तक नहीं है.

24, अकबर रोड से कोई बड़ा विचार सामने नहीं आता. कांग्रेस को इंफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी क्रांति का वास्तुकार माना जाता है.

लेकिन फिर भी पार्टी का ज़्यादातर काम ई-मेलों से नहीं कागज़ों पर होता है, भारतीय समाज की तरह ही.

24 अकबर रोड पर हाजिरी भी एक समस्या है. पार्टी मुख्यालय में "सब चलता है" वाला नज़रिया है.

ज़िम्मेदारी से न भागते

Image copyright AP

अगर राहुल ने इनमें से कुछ भी किया होता या सब किया होता तो वह 2014 के चुनावों में नरेंद्र मोदी को सीधी टक्कर दे सकते जो अब नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच नहीं लड़े जा रहे हैं. आने वाले लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी और एक प्रश्नचिन्ह के बीच लड़े जाने वाले हैं.

राहुल गांधी के लिए ज़िम्मेदारी से भागने या बचने का एक भाव है.

राहुल और कांग्रेस की तरफ़ से यह 2014 को दो व्यक्तियों के बीच चुनाव बनने से टालना एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है.

हाल ही में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुई एआईसीसी की बैठक में राहुल ने एक कुशल शतरंज खिलाड़ी की तरह सभी टुकड़ों को अपने चारों तरफ़ जमा लिया.

पार्टी की बैठक में वह डॉ मनमोहन सिंह के प्रति गुस्से को एक ओर करके अपने नेतृत्व के मुद्दे पर ध्यान खींचने में सफल रहे.

महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों से नाराज़ एआईसीसी प्रतिनिधियों को सोनिया गांधी के नुमाइंदे, मनमोहन सिंह, पर हमला करने का मौका ही नहीं मिल पाया.

Image copyright Getty

राहुल गांधी के सामने असली चुनौती साल 2014 का लोकसभा चुनाव या नरेंद्र मोदी से कड़ी प्रतियोगिता नहीं है.

वर्ष 2004 में जबसे राहुल राजनीति में आए हैं वह कांग्रेस में प्रभुत्व जमाने में नाकाम रहे हैं.

वह भले ही प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत उम्मीदवार के रूप में उभरे हों लेकिन राहुल की सोच और इच्छओं में इस पुरानी पार्टी की कार्यशैली का अभाव ही दिखा है.

कांग्रेस की नियुक्तियों, काम करने के ढंग और विचारधारा में उनकी छाप नहीं दिखी है.

अगर उन्होंने थोड़ी पड़ताल की होती और राजनीतिक फ़लसफ़े में सहायता मांगी होती तो मार्कस तूलिएस सिसेरो, दांते एलीगियरी और निकोलो मैकियाविली ने उन्हें इतिहास में 'शेर' और 'लोमड़ी' के संबंधों की जांच करने को कहा होता.

'शेर' और 'लोमड़ी

Image copyright AFP

सिसेरो, दांते और निकोलो मैकियाविली विशेष तौर पर शेर और लोमड़ी की तस्वीरों और कहानी का इस्तेमाल राजा (नेता) और उसकी अपने सलाहकारों/दरबारियों पर निर्भरता की व्याख्या करने के लिए किया था.

शेर राजा होता है जो अपनी प्रजा पर प्रभुत्व के साथ शासन करता है, जबकि लोमड़ी उसकी सलाहकार होती है और राजा और उसकी प्रजा के बीच मध्यस्थ का काम भी करता है और सलाहकार के रूप में उसके हित सर्वोच्च हैं.

सिसेरो की तरह मैकियाविली भी अपने 'प्रिंस' में बताते हैं कैसे शेर को पता नहीं होता कि उसे फंदों से कैसे बचना है, जबकि लोमड़ी खुद को भेड़ियों से नहीं बचा सकती. तो फंदों से बचने के लिए उसे लोमड़ी की तरह चालाक होना पड़ेगा और भेड़ियों को डराकर रखने के लिए उसे शेर की तरह मजबूत होना होगा. इसलिए एक समझदार शासक सिर्फ़ शेर की तरह बर्ताव नहीं कर सकता बल्कि उसे लोमड़ी पर निर्भर रहना पड़ता है.

आज की तारीख़ में कांग्रेस के पास ऐसे नेताओं की कमी नहीं जो चाहते हों कि राहुल-नीत कांग्रेस को हर चुनावी जीत हासिल हो लेकिन यह भी चाहते हैं कि पार्टी की सफ़ाई का उनका अभियान सफल न हो. राहुल-नीत कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यही विरोधाभास है.

चौथी पीढ़ी

Image copyright PTI

कहा जाता है कि विजेता तैमूर 'लंग' ने मशहूर इतिहासकार और समाजशास्त्री इब्न खुल्दुन से अपने वंश की किस्मत पर बात की. खुल्दुन ने कहा कि किसी वंश की ख्याति चार पुश्तों से ज़्यादा शायद ही टिकती है. पहली पीढ़ी जीत पर ध्यान केंद्रित करती है. दूसरी पीढ़ी प्रशासन पर. तीसरी पीढ़ी, जो विजय अभियानों या प्रशासनिक ज़रूरतों से मुक्त होती है, के पास अपने पूर्वज़ों के जमा धन को सांस्कृतिक कार्यों पर खर्च करने के सिवा कोई काम नहीं रह जाता.

अंततः चौथी पीढ़ी तक वह एक ऐसा वंश रह जाता है जिने अपना सारा पैसा और उसके साथ ही इंसानी ऊर्जा भी ख़र्च कर दी है. तो किसी भी शाही परिवार का पतन भी उसके उत्थान में ही छुपा होता है. खुल्दुन के अनुसार यह यह प्राकृतिक अवधारणा है और इससे बचा नहीं जा सकता.

अपने लोकतंत्र के आधुनिक इतिहास को देखें तो नेहरू-गांधी परिवार के उत्थान और पतन में दिखता है कि खुल्दुन की घोषणा कितनी गहरी थी. जवाहरलाल नेहरू इसके वास्तुकार थे, जबकि इंदिरा गांधी ने इसकी उपलब्धियों को बढ़ाया और 20वीं सदी की सबसे मजबूत शख्सियत बनकर उभरीं. संजय और बाद में राजीव गांधी ने बहुत से प्रयोग किए और उसकी भारी कीमत चुकाई. और अब अब चौथी पीढ़ी राहुल गांधी की इच्छाएं संभवतः अच्छी हैं लेकिन उनके लिए चीज़ें अब आसान बिल्कुल नहीं रह गई हैं.

(बीबीसी संवाददाता पवन सिंह अतुल से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार