भारतीय महानगर: महज़ आकार बड़े या दिल भी

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दिल्ली में पिछले दिनों अफ़्रीक़ी देशों और फिर उत्तरपूर्व प्रदेशों विशेषकर मणिपुर के लोगों के साथ हुई अलग-अलग घटनाओं ने लोगों का ध्यान खींचा है. इसने अपने आप से अलग लगने वाले लोगों को लेकर हमारे पूर्वाग्रहों और मन में उनकी रूढ़ छवियों के कारण कथित घृणापूर्ण और हिंसक रवैये पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है.

क्या यह सबकुछ नस्लवादी है? क्या इसे किसी नस्लवाद विरोधी क़ानून के सहारे ख़त्म किया जा सकेगा? या फिर यह हमारे मन की भीतरी परतों में कहीं छिपी हुई गहरी सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समस्या है जिसका समाधान मात्र दंडात्मक या वैधानिक तरीक़ों से संभव नहीं?

यह प्रश्न भी उठता है किदिल्लीजैसे शहरों के निवासियों की आत्मछवि क्या है? यह लखनऊ या पटना या मऊ से किस तरह अलग है?

क़स्बे, शहर और महानगर की श्रेणियों में जब हम आबादियों को बांटते हैं तो उनमें किस तरह के गुणों का अंतर मानते हैं?

(तस्वीरेंः दिल्ली का मिनी अफ्रीका)

गुमनामी बाँटते महानगर

दिल्ली या मुंबई ख़ुद को महानगर कहते हैं तो क्या वह मात्र आकार की विशालता का मामला है? या ऐसे नगरों में रहने वालों के शहरी अनुभव ‘छोटे’ शहरों के बाशिंदों से क़त्तई अलग हैं?

महानगर मात्र मेट्रोपॉलिटन हैं या कॉस्मोपॉलिटन भी? क्या यह पुरानी स्थानीयताओं का एक दूसरे में विलय है या विलोपीकरण है जिससे एक वृहत्तर नागरिक संवेदना का सृजन हो सके?

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क्या यह अलग-अलग प्रकार की सांस्कृतिक चेतनाओं का सहअस्तित्व है या तत्वतः उससे भिन्न जीवन शैली है?

महानगर के बारे में एक बात कही जाती है कि यह हमें गुमनामी देता है. इससे एक चैन मिलता है क्योंकि हम सामुदायिक निगाहबंदी से बच जाते हैं.

हम व्यक्ति के रूप में आज़ादी हासिल करते हैं जो ग्रामीण जीवन हमें नहीं देता. लड़कियों या दलितों के संदर्भ में यह बात भारतीय परिवेश में अधिक प्रासंगिक जान पड़ती है. लेकिन यह एकांत दूसरी ओर अकेलेपन के अहसास में भी बदल जाता है और हमें छीलता रहता है.

कॉस्मोपॉलिटन अनुभव के मायने क्या हैं? क्या यह ब्रह्मांडीय चेतना है जो देश, क्षेत्र से परे है? या यह एक ऐसा अवकाश है जो हमें मौक़ा देता है कि हम नितांत भिन्न जीवन शैलियों और विचारों की साझेदारी कर सकें?

अपनेपन की तलाश

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क्या यह अनिवार्यतः एक आधुनिक अनुभव है? या भ्रमणशीलता के मनुष्य मात्र का गुण होने के कारण यह मानवीय स्थिति का अनिवार्य भाग है? क्योंकि लोग हमेशा एक से दूसरी जगह आते-जाते रहते हैं और अपने मूल स्थान से हज़ारों मील दूर जाकर बस जाते रहे हैं, यह कोई आधुनिकता का ही परिणाम नहीं है.

क्या यह कहा जा सकता है कि प्राचीन नालंदा कहीं अधिक कॉस्मोपॉलिटन थी? या वाराणसी भी? अगर बनारस जाएं तो वह आज भी अखिल भारतीय अनुभव के अलावा एक वैश्विक अनुभव प्रदान करता है, खान पान की जगहें हों या कुछ और, अलग-अलग भाषाओं में, देशी और विदेशी, साइनबोर्ड आपको मिल जाएँगे और ये भाषाएं कान में भी पड़ेंगी.

जहां ग्रामीण और क़स्बाई जीवन अत्यधिक परिचय और एक-दूसरे में अतिशय रुचि के कारण व्यक्तिगत-जीवन के लिए असह्य हो उठता है, वहीं महानगर में एक-दूसरे से विरक्ति या उदासीनता अलगाव पैदा करती है. इसका आसान जवाब है महानगर में अपनी ग्रामीण या क़स्बाई सांस्कृतिक एकजुटता को नए सिरे से गठित करना.

इसलिए दिल्ली में आपको ‘गुजराती समाज’, ‘तमिल संगम’ या ‘देवघरिया समाज’ जैसे संगठन ही नहीं मिलेंगे, हैदराबाद में ‘ब्रह्मर्षि समाज’ की बैठक का न्योता आपके ‘ब्लड’ का पता करते हुए आप तक पहुँच ही जाएगा.

अपने लोगों की तलाश भाषा, धर्म और जाति फिर उपजाति के स्तर तक चलती रहती है. इसके कारण सार्वदेशिक पहचान संघटित करने की चुनौती की कठिनाई से पीछा छुड़ा लेना मुमकिन हो जाता है.

पहचान, लोकतंत्र और क्षेत्रीयता

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‘कॉस्मोपॉलिटन’ नज़रिया भिन्नता के प्रति निरपेक्षता या उदासीनता का नहीं है. सकारात्मक अर्थ में एक तरफ़ यह ‘दूसरे’ को अपनी शक्ल में गढ़ने के लोभ पर नियंत्रण की मांग है, वहीं सक्रिय अर्थ में अपने आप को दूसरे की मौजूदगी में फिर से पहचानने का निमंत्रण भी है. इसमें एक अरक्षा की आशंका है लेकिन नई पहचान की ओर साहसिक यात्रा का रोमांच भी है.

दिल्ली जैसे महानगर अनेक सांस्कृतिक द्वीपों के जोड़ से बनते हैं. ओखला और शाहपुर जाट के बीच क्या चीज़ साझा है, यह सोचना पड़ता है.

महानगरीय चेतना या कॉस्मोपॉलिटन संवेदना के निर्माण या विकास में शिक्षा संस्थानों की, ख़ासकर विश्वविद्यालयों की भूमिका हो सकती है. जेएनयू के अंदर घुसते ही ऊपर से आपको इस नई संवेदना का स्पर्श मिलता है लेकिन कहीं भीतर एक सख़्त परत पुराने मिजाज़ की भी मिल जाती है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में जाति के आधार पर छात्रों को संगठित करना बुरा नहीं माना जाता. ऐसा मानें भी क्यों जब यहाँ के प्रशासन में और शिक्षकों के स्तर पर भी आपको जातीय, क्षेत्रीय आग्रह सक्रिय दिखाई पड़ते हैं.

लोकतंत्र में जनता को गोलबंद करने का श्रेष्ठ आधार विचार माना गया है. लेकिन वहाँ तक पहुँच पाने में अक्षम दलों को गोलबंदी के लिए सरल उपाय खोजने पड़ते हैं.

लोकतंत्र के विचार को प्रभावी होने के लिए एकदेशिकता काफ़ी नहीं, सार्वदेशिकता और अन्तर्राष्ट्रीयतावादी चेतना के बिना वह अर्थपूर्ण नहीं हो सकती.

मलाला, मोदी और आईना

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यह आज समझना तो और भी आवश्यक है कि लोकतंत्र की सफलता राष्ट्रवाद के संकुचित दायरे में नहीं. मानवाधिकार के सिद्धांत ने कई क्षेत्रों में राष्ट्र की सीमाओं को अप्रासंगिक कर दिया है.

आज संभव नहीं कि मलाला यूसुफ़ज़ई को गोली मार दी जाए और अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसे एक संस्कृति विशेष का अधिकार मानकर चुप देखता रहे. वैसे ही जैसे नरेंद्र मोदी को साल 2002 के चलते अब तक अमरीका का वीज़ा नहीं मिल पाया है.

भिन्नता कौतूहल का कारण बनती है और डर का भी. वह नए या अलग में दिलचस्पी जगा सकती है और नफ़रत भी.

वह झरोखे खोल सकती है तो अपनी दीवारों को और ऊँचा कर ख़ुद को तंग चहारदीवारी में क़ैद करने को भी कह सकती है. किसी समाज ने इनमें से चुनाव कर लिया हो और आख़िरी तौर पर एक सार्वभौम सार्वदेशिक या कॉस्मोपॉलिटन समाज का निर्माण हो गया हो, ऐसा देखा नहीं गया.

यह एक अंतहीन, निरंतर शिक्षण की प्रक्रिया है, लगातार ख़ुद से सवाल पूछते रहने की और संवाद की बाधाओं पर पार पाने की. दिल्ली में जो हुआ वह बहुत बुरा था पर वह अपने आप से निराश हो जाने और आत्मभर्त्सना का कारण नहीं बन जाना चाहिए.

दिल्ली एक ऐसा आईना है जिसमें बंगाल, महाराष्ट्र, आसाम, मणिपुर, नागालैंड, हर प्रदेश को अपनी सूरत नज़र आएगी. अगर ऐसा हुआ तो मानना चाहिए कि हम बच सकते हैं.

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